रविवार, १४ डिसेंबर, २०२५

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण Kanhergad Fort Information in Hindi

 कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण

Kanhergad Fort Information in Hindi

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


स्थान :

महाराष्ट्र राज्य के संभाजीनगर (औरंगाबाद) जिले और जलगांव जिले की सीमा पर स्थित गौताळा ऑट्रम घाट अभयारण्य में, सातमाळा–अजिंठा पर्वत श्रृंखला की ऊँचाई पर कण्हेरगड किला स्थित है।

ऊँचाई :

यह किला समुद्र तल से लगभग 660 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

• इस किले की चढ़ाई थोड़ी कठिन है और पैदल ट्रेक करना पड़ता है। शुरुआती चरण में चढ़ाई कुछ कठिन होती है, लेकिन सह्याद्री प्रतिष्ठान, चालीसगांव द्वारा बनाए गए पत्थर की सीढ़ियों के कारण अब यह मार्ग काफी सुगम हो गया है।

कण्हेरगड कैसे पहुँचे :

• मुंबई–नाशिक मार्ग से भुसावल होते हुए मनमाड, उसके बाद चालीसगांव पहुँचें। वहाँ से बस या निजी वाहन द्वारा पाटणादेवी अभयारण्य जाएँ और वहाँ से कण्हेरगड पहुँचा जा सकता है।

• नाशिक से वणी–दिंडोरी मार्ग द्वारा कळवण पहुँचें, वहाँ से कण्हेरीवाड़ी गाँव आएँ और फिर पैदल रास्ते से कण्हेरगड पर पहुँचा जा सकता है।

कण्हेरगड व आसपास देखने योग्य स्थान :

• कण्हेरीवाड़ी तथा चालीसगांव की ओर से पाटणादेवी क्षेत्र में आने पर, दोनों रास्ते एक ही स्थान पर खिंड (दर्रा) में मिलते हैं। वहाँ से कण्हेरगड पर जाने का मार्ग है।

प्राचीन हेमाडपंथी मंदिर :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


पाटणादेवी अभयारण्य की ओर जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ने पर एक प्राचीन मंदिर दिखाई देता है, जो घने जंगल में स्थित है। यह एक प्राचीन शिव मंदिर है और यादव कालीन माना जाता है।

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


इस मंदिर की वास्तुकला हेमाडपंथी शैली की है और यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। यह लगभग 6 फीट ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। मंदिर की लंबाई लगभग 75 फीट, ऊँचाई 18 फीट और चौड़ाई 36 फीट है।

मंदिर के बाहर भव्य सभा मंडप है, जिसमें नंदी महाराज विराजमान हैं। गर्भगृह में सुंदर शिवलिंग है और आकर्षक नक्काशीदार स्तंभ देखने को मिलते हैं। मंदिर के बाहरी भाग में भी अनेक मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। सुंदर नक्काशी और कलात्मक डिज़ाइन तत्कालीन शिल्पकला की पहचान कराते हैं।

समाधि :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


मंदिर के पास से किले की ओर जाते समय, सह्याद्री प्रतिष्ठान चालीसगांव के कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए सूचना फलक मार्ग को आसान बनाते हैं। इसी रास्ते पर आगे चलने पर एक समाधि दिखाई देती है, जिस पर छत्र (छत्री) बनाई गई है।

कातळ (चट्टान) जैन गुफाएँ :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


समाधि छत्री से थोड़ा आगे बढ़ने पर एक ऊँचा चट्टानी पहाड़ दिखाई देता है। इस पहाड़ पर चढ़ने के बाद कुछ दूरी पर चट्टान को काटकर बनाई गई एक सुंदर गुफा देखने को मिलती है। इसमें अत्यंत सुंदर और कलात्मक जैन लेणियाँ (गुफाएँ) खुदी हुई हैं। इन्हें नागार्जुन लेणियाँ भी कहा जाता है।

गुफा के बाहर दो स्तंभ हैं और उनके आगे गुफा का द्वार है। द्वारपट्टी पर जैन तीर्थंकरों की जानकारी अंकित दिखाई देती है। गुफा के अंदर प्रवेश करने पर सामने भगवान महावीर की तपस्यारत सुंदर मूर्ति शिल्पाकृति के रूप में दिखाई देती है। आसपास कई तीर्थंकरों की गुफाएँ देखने को मिलती हैं। इसके अलावा सेविकाओं और गंधर्वों की गुफाएँ भी यहाँ उत्कीर्ण हैं।

एक ओर दीवार से सटी हुई गोमटेश्वर भगवान की खड़ी मूर्ति भी देखने को मिलती है, जो गुफा के बाईं ओर स्थित है।

• पानी के टांके :

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वहाँ से पास ही पहाड़ में काले कठोर पत्थर (कात्याळ) को काटकर बनाए गए पानी के टांके दिखाई देते हैं। इनमें भरे पानी में भीषण गर्मी में भी सुखद ठंडक रहती है।

• सीता न्हाणी :

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जैन गुफाएँ देखने के बाद वहीं से एक पगडंडी से चलते हुए पहाड़ की एक ओर जाने पर कात्याळ पत्थर में खोदी गई और भी गुफाएँ दिखाई देती हैं। इस स्थान को सीता न्हाणी कहा जाता है। ये एक प्रकार की गुफाएँ हैं तथा इनकी रचना ऐसी है कि यहाँ ठहरा भी जा सकता है।

• शृंगारिक ब्राह्मण हिंदू गुफाएँ :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi

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सीता गुफाएँ देखने के बाद किले से उतरते समय किले की एक ओर से पहाड़ को घेरते हुए दो पहाड़ों के बीच स्थित एक घाटी की ओर जाने पर चट्टान में खोदा हुआ एक पानी का टांका दिखाई देता है। समय के साथ उपेक्षा होने के कारण उसमें का पानी अस्वच्छ दिखाई देता है।

वहाँ से आगे दो पहाड़ों के बीच की घाटी के पास पगडंडी से ऊपर चढ़ने पर अंग्रेज़ी “L” आकार का एक बरामदा दिखाई देता है। यहाँ बाहर की ओर सुंदर स्तंभ दिखाई देते हैं, जिन पर मनमोहक नक्काशी की गई है। ऐसे कुल चार स्तंभ हैं। एक सुंदर सभामंडप भी देखने को मिलता है। गुफाओं के द्वार पर सुंदर नक्काशी का काम किया गया है। ये ब्राह्मण गुफाएँ ईस्वी सन की 11वीं शताब्दी में खोदी गई प्रतीत होती हैं।

वर्तमान में यहाँ भीतर कोई मूर्तियाँ मौजूद नहीं हैं। यह भाग किले की विपरीत दिशा में होने के कारण यहाँ पर्यटकों और ट्रेकर्स की अधिक आवाजाही नहीं होती।

• कात्याळ सीढ़ी मार्ग :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


जैन गुफाएँ देखने के बाद उनके पास लगाए गए दिशासूचक मार्ग से आगे बढ़ने पर रेलिंग वाला कात्याळ पत्थर का सीढ़ी मार्ग मिलता है। इस मार्ग से ऊपर चढ़ना पड़ता है। यह लगभग बीस फुट ऊँची कात्याळ चट्टान चढ़ना कठिन है, परंतु सह्याद्री प्रतिष्ठान द्वारा बनाई गई रेलिंग और तराशी गई सीढ़ियों के कारण यह मार्ग कुछ आसान हो गया है।

इस मार्ग से सीता गुफाओं और जैन गुफाओं के ऊपर के भाग में जाया जा सकता है।

• निढे :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


कात्याळ मार्ग से ऊपर चढ़ने के बाद ऊपर की ओर प्राकृतिक रूप से बना निढे दिखाई देता है। यह स्थान अत्यंत दर्शनीय है। यहाँ बैठकर विश्राम करते हुए दूर-दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाएँ तथा घाटी का सुंदर हरा-भरा प्राकृतिक दृश्य देखा जा सकता है।

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


• कात्याळ गुफाएँ :

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निढे देखने के बाद उसके आगे की ओर पास की घाटी में थोड़ा नीचे उतरने पर दो-तीन कात्याळ गुफाएँ मिलती हैं। यहाँ रहने की व्यवस्था हो सकती है।

• कात्याळ सीढ़ी मार्ग :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


निढे देखने के बाद आगे के सीढ़ी मार्ग से किले पर जाया जा सकता है। इस मार्ग से किले की निचली माची पर पहुँचा जाता है।

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


• मार्ग में एक भग्न द्वार देखने को मिलता है।

• किले का शिखर काफी विस्तृत है। नीचे से भले ही यह पहाड़ छोटा लगता हो, पर ऊपर से यह बहुत विस्तृत है।

• वाड़ा व इमारतों के अवशेष :

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किले के ऊपर वाड़ों और इमारतों के अवशेष दिखाई देते हैं, जो किलेदार और शिबंदी के मावलों के निवास के लिए बनाए गए थे।

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


• पानी के टांके :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


किले के ऊपर कई पानी के टांके दिखाई देते हैं। जगह-जगह बने इन टांकों के कारण मध्ययुग में किले पर रहने वाली शिबंदी की पानी की आवश्यकता पूरी होती थी।

• तालाब :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


किले के ऊपरी भाग में एक छोटा सा तालाब भी दिखाई देता है। यह एक जलाशय है और किले की बाईं ओर स्थित है।

• पानी का टांका :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


वहाँ से आगे एक और पानी का टांका दिखाई देता है।

• शिवलिंग :

पानी का टांका देखने के तुरंत बाद वहीं एक शिवलिंग दिखाई देता है।

• पत्थर की टोपी जैसा शिखर :

किले के ऊपरी भाग में टोपी जैसी आकृति वाला एक पत्थर का खंड दिखाई देता है।

• किले की प्राचीर :

समय के साथ किले की काफी दुर्दशा हो चुकी है, जिसके कारण किले की प्राचीर भी काफी हद तक क्षतिग्रस्त अवस्था में है।

• उत्तर बुर्ज :

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


किले के उत्तर दिशा में एक बुर्ज दिखाई देता है। वहाँ एक निशान काठी भी देखने को मिलती है।

• खाँच (दरार):

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


गढ़ का विस्तार पूर्व और पश्चिम दिशा में है। इस गढ़ के एक ओर धोडप किले के समान एक गहरी खाँच है। इस स्थान पर खाँच में उतरने के लिए रस्सी लगाई गई है। उसकी सहायता से नीचे उतरकर आगे बढ़ने पर एक सुंदर तासिव कड़ा देखने को मिलता है। यह कड़ा मानवनिर्मित प्रतीत होता है।

• गढ़ के शिखर पर स्थित छिद्र:

गढ़ के शिखर पर काले कात्याळ (कठोर चट्टान) में खोदे गए छिद्र देखने को मिलते हैं। ये छिद्र अस्थायी निवास (शरण) के लिए बनाए गए प्रतीत होते हैं।

• गढ़ का दरवाज़ा:

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


पर्वत के ऊपरी भाग में पहुँचने के बाद, बालकिले का चक्कर लगाकर बालकिला दाईं ओर और खाई बाईं ओर रखते हुए आगे चलने पर बालकिले के पिछले हिस्से में एक दरवाज़ा मिलता है। कमानाकार संरचना और घुमावदार मोड़ वाला यह दरवाज़ा गढ़ की शोभा बढ़ाता है। इसके बुर्जों की रचना से इसकी मजबूती स्पष्ट होती है। दरवाज़े के भीतर पहरेदारों के लिए देवड़ियाँ बनाई गई हैं। साथ ही, घुमावदार मोड़ वाला यह दरवाज़ा और पास में अच्छी अवस्था में स्थित बुर्ज देखकर यहाँ तक चलकर आने का परिश्रम सार्थक लगता है। लेकिन इस मार्ग से गढ़ के ऊपरी भाग में जाने के लिए कोई सरल रास्ता उपलब्ध नहीं है।

• हनुमान मंदिर:

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


गढ़ के बुर्जों के पास स्थित कड़े पर चढ़कर ऊपर आने पर सुंदर शेंदरी रंग में रंगी हुई हनुमान जी की मूर्ति दिखाई देती है।

इस मार्ग से गढ़ के बालकिले पर जाना कठिन है। इसके बजाय नीचे स्थित मार्ग से सीढ़ीनुमा रास्ता चढ़कर गढ़ के ऊपरी भाग में पहुँचा जा सकता है। एक ओर कड़ा और दूसरी ओर गहरी खाई वाला यह कात्याळ मार्ग देखने योग्य है।

कण्हेरगड किले की ऐतिहासिक जानकारी:

• कण्हेरगड का निर्माण ईस्वी सन् की 8वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। संभवतः यह किला यादव वंश के शासनकाल में निर्मित हुआ।

जनार्दन स्वामी के चरित्र में उल्लेख मिलता है कि ईस्वी सन् 1228 (शक 1150) में आषाढ़ अमावस्या के दिन सूर्यग्रहण के अवसर पर पाटणादेवी मंदिर सभी लोगों के लिए खोला गया था।

• यह किला स्वराज्य में कब सम्मिलित हुआ, इस बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन सूरत की दूसरी लूट के बाद लौटते समय मराठों ने इसी क्षेत्र में मुगलों से संघर्ष किया और मैदानी युद्ध में मुगलों को पराजित कर मराठों की शक्ति का परिचय दिया।

• इस किले पर मराठा किलेदार रामजी पांगेरा थे। रामजी ने स्वराज्य की अनेक अभियानों में भाग लिया और गढ़ की रक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुए।

• ईस्वी सन् 1671 में इस किले को मुगल सरदार दिलेरखान और बहादुर खान ने घेर लिया। मराठों ने गुरिल्ला युद्ध पद्धति से उन्हें परेशान किया।

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


• कण्हेरगड के पादस्थ क्षेत्र में रामजी पांगेरा के नेतृत्व में भोर के समय मुगलों के साथ भीषण संघर्ष हुआ। इसमें 400 मावले सहभागी थे। दिलेरखान ने सात वर्षों बाद मुरारबाजी देशपांडे जैसे युद्ध करने वाले मराठा वीर को पुनः देखा। इस युद्ध में मराठों ने 1200 मुगलों को मार गिराया।

• इसका उल्लेख बखरकारों द्वारा किया गया है –

“टिपरी जैसी शिंगियाची दणाणते।”

• दिलेरखान ने रामजी को सरदारकी और जागीर का प्रलोभन दिया, लेकिन उसने उसे अस्वीकार कर अपने साथियों सहित वीरगति को स्वीकार किया।

• उस समय किले पर केवल 800 मावले थे। अंततः किला मुगलों के अधिकार में चला गया। किलेदार और शिबंदी के 400 मावलों ने 1200 मुगलों को मार गिराया, लेकिन मुगलों की सेना अत्यंत विशाल होने के कारण पीछे हटना पड़ा।

कण्हेरगड किले का ऐतिहासिक विवरण  Kanhergad Fort Information in Hindi


• ईस्वी सन् 1752 में मराठों ने पुनः इस किले को जीत लिया।

• औरंगज़ेब बादशाह इसी क्षेत्र से स्वराज्य पर चढ़ाई करने आया था, जिसे आगे चलकर मराठी भूमि में ही पराजय का सामना करना पड़ा।

• आगे चलकर यह किला पेशवाकाल में पेशवाओं के अधीन रहा।

• ईस्वी सन् 1789–90 में इस किले पर रहने वाले कोली लोगों ने विद्रोह किया, लेकिन उसे दबा दिया गया।

• ईस्वी सन् 1818 में पेशवाकाल के अंत के बाद यह किला अंग्रेजों के अधीन चला गया।

• इस क्षेत्र में महान गणितज्ञ भास्कराचार्य हुए, जिन्होंने शून्य की खोज की।

इस प्रकार कण्हेरगड किले की ऐतिहासिक जानकारी है।

गुरुवार, ११ डिसेंबर, २०२५

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary Chandrapur, Maharashtra

 

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary

Chandrapur, Maharashtra

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


• Location :

In the Vidarbha region of Maharashtra state, in Chandrapur district, at the originating area of the Andhari river, you will find the Tadoba Wildlife Sanctuary.

• Sanctuary Area :

• Tadoba–Andhari Sanctuary is divided into two zones.

• Tadoba–Andhari Core Zone Area : 625.40 sq. km

• Tadoba–Andhari Buffer Zone Area : 1100 sq. km

• Total Area : 1725.40 sq. km

Travel Routes to Visit the Sanctuary :

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


• From Nagpur International Airport, the Tadoba–Andhari Tiger Reserve is 140 km away.

• From Chandrapur, Tadoba Sanctuary is 45 km by bus.

• From Chimur, Tadoba Sanctuary is 32 km away.

• Chandrapur, being a district headquarters, is well connected to the rest of the country by road and rail.

Local Information about Tadoba Sanctuary :

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


• Plant Life :

Tadoba Sanctuary falls in the Vidarbha region of Maharashtra.

Due to the hot climate, South Tropical Dry Deciduous Forests are found here.

Major trees found here include —

Mahua, Dhauda, Apta, Behada, Khair, Bibba, Shisham, Tendu leaves, Teak (Sagwan), Ain, Bamboo.

These trees shed their leaves during the Shishir season (the transition period between winter and summer).

Evergreen trees like Mango, Jamun, and Arjun are also found here.

The Crocodile Bark Tree, which looks like crocodile scales, is also seen here.

Likewise, the Ghost Tree, which appears like a phantom at night, is also found in this region.

In newly afforested areas, certain portions are intentionally kept open, known as fire zones, to prevent the spread of forest fires.

The forest department obtains bamboo, timber, medicinal plants, and tendu leaves from this forest.

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


• Water Management :

Andhari River :

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


This is the lifeline of the sanctuary.

It is said that earlier, the forest here was so dense that even sunlight could not reach the ground.

Due to the darkness everywhere, the river came to be known as the Andhari River.

Tadoba :

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


Tadoba is the main lake here and holds a large amount of water throughout the year.

The sanctuary derives its name Tadoba from this lake.

Many small and large water bodies are also found here such as —

Waghdoha, Mohacha Khadda, Ambe Doh, Jamun Zhora, Sambar Doh, Vasant Bandh, Katezari, Umari Phata, Kala Amba, Telyatad, etc.

These water bodies fulfill the drinking water needs of the wild animals.

To avoid water scarcity in summer, the forest department has installed solar-powered pumps with borewells, creating artificial water sources for animals.



• Animal Life :

The Big Five animals found here are —

Tiger, Leopard, Sloth Bear, Wild Dogs (Dholes), and Indian Gaur.

Other animals include —

Blackbuck, Deer, Wild Boar, Porcupine, Barking Deer, Civet Cat, Wolf, Mongoose, Monitor Lizard, Chital, Nilgai, and Mouse Deer.

• Tiger :



The most important animal of this sanctuary is the tiger, known as the Royal Bengal Tiger.

• Male Tiger Territory : 40–45 sq. km

• Tigress Territory : 11–12 sq. km

If one tiger or tigress enters another's territory, conflict occurs.

Tigers mark their territory by —

• Scratching tree trunks and rocks with their claws

• Spraying urine

In the summer season, tigers can often be seen resting inside water bodies.

Tiger population is monitored using camera traps and sensors installed with the help of the American Wildlife Conservation Society.

Each tiger has a unique stripe pattern on its body, which is used for identification.

No two tigers have identical stripes.

The famous documentary “Tiger Sisters of Telia” was filmed near the Telia Lake area.

• Indian Gaur :

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


Due to abundant grass and water, large herds of Indian Gaur are seen here.

They are muscular, dark-colored, and have sharp, strong horns.

• Deer :



Beautiful blackbucks and spotted deer (chital) are found in large numbers here.

These are the main prey of tigers.

After killing a deer, the tiger eats the flesh and leaves behind the skull and bones, which are rich in calcium.

Porcupines chew on these bones, forming an important link in the food chain.

• Wild Dogs (Dholes) :

Packs of wild dogs are commonly seen here.

They hunt deer and wild boar.

• Leopard :

Leopards are mostly active at night, making them harder to spot.

• Sloth Bear :

Sloth bears eat fruits, honey, and small animals found in the forest.

• Crocodile :

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


After the tiger, crocodile is the most notable reptile found in lakes and marshy areas of this sanctuary.

• Bird Life :



Over 300 species of local and migratory birds are seen during safaris in the Tadoba–Andhari Tiger Reserve.

Major birds include —

Egrets, Hornbills, Junglefowl, Storks, Kingfishers, Peacocks, Coucals, Cormorants,

and many seasonal migratory species.

• Why is it called Tadoba?

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


The Gond tribal community lives in this region.

According to legend, a brave tribal youth named Taru once lived here.

He protected his people from wild animals,

fought tigers fearlessly,

collected tendu leaves and forest herbs,

and performed many courageous acts.

One day, he died while fighting a tiger.

His last rites were performed near the lake.

Later, the tribals built a temple in his memory at the same spot and began worshipping him.

The lake and the forest were named Tadoba after Taru.

Even today, in the month of Paush, tribals gather here to celebrate a grand fair and festival.

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


Insects :

• In this sanctuary, you can see many small and large types of insects. Almost 175 species of butterflies are found here.

• Shikara Insect:

During summer, shikara insects breed here. Their lifespan is very short. Once they are fully developed, they start making a particular sound. At that time, water starts dripping from their body. After this process ends, they die. Their loud calling creates a fearful atmosphere in the forest. Many birds like to feed on them.

• Grass:

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


Many species of grass are found in this area. Their number is more than 60.

Reptiles :

Here, crocodiles, snakes, monitor lizards, etc., in total 54 types of reptiles are found.

Arrangement for Visiting Tadoba Andhari Tiger Reserve :

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


• To visit the sanctuary, there are 14 gates in the buffer zone and 6 gates in the core zone, making a total of 20 gates.

From these gates, one has to take permission passes to enter the forest.

Only 20% area is allowed for tourism.

The main core area is not open for entry.

Historical Information about Tadoba Andhari Tiger Reserve :

• In 1955, Tadoba was declared a National Park.

• In 1985, Tadoba and Andhari forest were merged and recognized as the Tadoba–Andhari Tiger Reserve.

• In 2014, tribal villages like Jamni and Pandharpol were relocated outside the sanctuary area.

• Currently, the Forest Department provides tourism facilities here.

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


Rules and Conditions for Visiting the Sanctuary :

• Carrying any plastic items or paper inside the sanctuary is prohibited.

• Visitors must switch off and deposit their mobile phones before entering. Taking selfies is strictly prohibited.

• An entry fee is charged for the safari. Entry is allowed only after showing the ticket.

• Two types of vehicles—Gypsy and Canter—are permitted for safari.

• Getting down from the vehicle during safari is not allowed.

• Do not make noise on seeing animals or do anything that disturbs them.

• For drinking water, a glass bottle is provided at the entrance. Plastic bottles are banned.

• Smoking and drinking alcohol inside the sanctuary area is strictly prohibited.

• A guide and driver from the forest department accompany the safari.

• Cameras and binoculars are allowed, but additional charges apply.

• They can be purchased or rented from the shops near the gates.

• Near Moharli Gate and other gates, there are many restaurants and lodges where food and accommodation are available.

Tadoba – Andhari National Park & Wildlife Sanctuary  Chandrapur, Maharashtra


This is the complete information about Tadoba Andhari Tiger Reserve.

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपूर महाराष्ट्र Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra

 ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपूर महाराष्ट्र

Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपूर महाराष्ट्र  Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra


• स्थान :

 महाराष्ट्र राज्यातील विदर्भ विभागात चंद्रपूर जिल्ह्यात असणारे अंधारी नदीच्या उगम भागात आपणास ताडोबा अभयारण्य पहायला मिळते.

• अभयारण्याचे क्षेत्रफळ :

• ताडोबा अंधारी अभयारण्याचे दोन भाग पडतात.

• ताडोबा अंधारी कोअर झोन क्षेत्रफळ : ६२५.४० चौ. किलोमीटर.

• ताडोबा अंधारी बफर झोन क्षेत्रफळ : ११०० चौ. किलोमीटर

• ऐकून क्षेत्रफळ : १७२५.४० चौ. किलोमीटर.

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपूर महाराष्ट्र  Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra


अभयारण्य पहायला जाण्यासाठी प्रवासी मार्ग :

• नागपूर या आंतरराष्ट्रीय विमानतळापासून १४० किलोमीटर अंतरावर ताडोबा अंधारी व्याघ्र प्रकल्प आहे.

• चंद्रपूर येथून बसने ४५ किलोमीटर अंतरावर ताडोबा अभयारण्य आहे.

• चिमूर येथून ३२ किलोमीटर अंतरावर ताडोबा अभयारण्य आहे.

• चंद्रपूर हे ठिकाण जिल्हा ठिकाण असून ते रेल्वे व रस्त्याने देशातील इतर ठिकाणांना जोडलेले आहे.

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपूर महाराष्ट्र  Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra


ताडोबा अभयारण्याची स्थानीक माहिती :

• वनस्पती जीवन :

महाराष्ट्र राज्यातील विदर्भ विभागात ताडोबा अभयारण्य येते. येथील वातावरण उष्ण असल्याने. येथील वृक्षांमध्ये दक्षिण उष्ण कटिबंधीय पानझडी अरण्ये प्रकारातील वृक्ष येथे आढळतात. विशेषत ‘ मोह, धावडा, आपटा, बेहडा, खैर, बिब्बा , शिसम, तेंदूपत्ता, सागवान, ऐन, बांबू या वनस्पती विशेषत आढळून येतात. या झाडांची ठराविक ऋतूत म्हणजे शिशिरात ( हिवाळा व उन्हाळा यांचा संक्रमण काळ ) या काळात पानगळ होते. तसेच आंबा, जांभूळ, अर्जुन हे देखील वृक्ष आढळतात. जे सदाहरित असतात. तसेच मगरीच्या अंगावर खवल्या सारखे दिसणारे झाड म्हणजे क्रोकोडाईल ट्री देखिल इथे पहायला मिळते. त्याचप्रमाणे रात्रीचे भूता प्रमाणे भास होणारे घोस्ट ट्री देखिल इथे पहायला मिळतो. नवीन वनीकरण करताना अधून मधून मोकळी जागा ठेवलेली आहे. जी फायर झोन म्हणून ओळखली जाते. जंगलाला आग लागल्यास ती सर्वत्र पसरू नये. म्हणून काळजी घेतल्याचे दिसते. या जंगलातून आपणास बांबू, इमारत लाकूड, औषधे व तेंदूपत्ते यासारखे उत्पन्न वन विभागाकडून घेतले जाते.

• जलव्यवस्थापन :

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपूर महाराष्ट्र  Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra


अंधारी नदी :

या अभयारण्याची मुख्य जीवनदायीनी आहे. पूर्वी या ठिकाणी घनदाट अरण्य होते. की सूर्याची किरणे दिवसाही जमिनीस स्पर्श करीत नसत. सर्वत्र अंधार असे म्हणून या नदीस अंधारी नदी असे नाव पडले. अशी अख्यायिका ऐकिवात आहे.

ताडोबा :

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपूर महाराष्ट्र  Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra


 ताडोबा येथील मुख्य तलाव असून या तलावात मोठ्या प्रमाणात पाणी असते. या तलावा वरूनच या अभयारण्यास ताडोबा हे नाव पडले.

• तसेच येथे वाघडोह, मोहाचा खड्डा, आंबे डोह, जामून झोरा, सांबर डोह, वसंत बांध, काटेझरी, उमरीचा फाटा, काळा आंबा तेल्याताड असे अनेक लहान मोठे पाणवठे पहायला मिळतात. या पाणवठ्याद्वारे येथील जंगली प्राण्यांची पिण्याच्या पाण्याची गरज भागवली जाते. तसेच उन्हाळ्यात पाणवठे आठल्यावर पाण्याचे दुर्भिक्ष्य जाणवू नये म्हणून वन विभागाने जागोजागी कृत्रिम पाणवठे बोअर वेल मारून त्यावर सौर ऊर्जेचे पंप बसवून निर्माण केले आहेत. जे उन्हाळ्यात प्राण्यांना पिण्याच्या पाण्याची सोय करतात.



• प्राणी जीवन :

• वाघ, बिबट्या, अस्वल, जंगली कुत्रे म्हणजेच ढोले, आणि गवा येथील बिग फाईव्ह म्हणून ओळखले जातात. तसेच काळवीट, हरणे, रानडुक्कर, साळिंदर, भेकर ,उदमांजर, लांडगे, मुंगूस, घोरपड, चितळ, नीलगाय व पिसुरी हरणे देखील येथे पाहायला मिळतात.



• वाघ :

या अभयारण्यातील महत्वाचा प्राणी आहे. रॉयल बंगाली टायगर म्हणून ओळखला जातो. दरवर्षी वाघांची जनगणना केली जाते. प्रत्येक वाघाचे क्षेत्र ठरलेले असते. वाघाचे क्षेत्र हे ४० ते ४५ चौ. कि. मी. तर वाघिणीचे क्षेत्र हे ११ ते १२ कि. मी. असते. एक वाघ दुसऱ्या वाघाच्या तसेच एक वाघीण दुसऱ्या वाघिणीच्या क्षेत्रात गेल्यास त्यांमध्ये झगडा होतो. प्रत्येक क्षेत्रात झाडावर तसेच दगडावर वाघ, वाघीण आपल्या पंजाचे ठसे नखांनी ओरबाडून निशाने तयार करते. तसेच मूत्रविसर्जन करुन खुणा करते. उन्हाळ्यात पाणवठ्यात मस्त लोळताना आपणास वाघांचे दर्शन घडते. पाणवठे, सुरक्षित जंगल व पोटभर अन्न यामुळे येथील वाघांची संख्या वाढताना दिसून येते. वाघांची गणती करण्यासाठी येथे खास अमेरिकन वाईल्ड लाईफ कोंझरवेशन सोसायटी या संस्थेच्या मदतीने सेन्सर्स व कॅमेरे बसवले. याच्या मदतीने वाघांची गणती केली जाते. वाघांचे ठसे, अंगावरील पट्टे, याद्वारे त्यांची शिरगणती केली जाते. दोन वाघांच्या पाठीवरील पट्यात साम्य नसते. येथील तेल्या ताड या तलावापरिसरात टायगर सिस्टर्स ऑफ तेलिया ही डॉक्युमेंट्री फिल्म बनवली आहे.

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• रानगवे :

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पाणवठे व भरपूर वन गवत यामुळे येथे जंगली म्हैस म्हणजेच गव्यांचे कळप पहायला मिळतात. धिप्पाड, काळसर रंग टोकदार शिंगे असणारा वजनदार गवा येथील अरण्यात पहायला मिळतो.

• हरणे :



सुंदर काळवीट व पिवळसर रंगाची सुंदर ठिपके असलेली हरणे यांची संख्या बहुसंख्य आहे. जे वाघांचे खाद्य आहेत. एखादे हरिण शिकार केल्यावर वाघ त्याचा मासल भाग खाऊन शिंगे व हाडे टाकून देतो. त्या शिंगांत कॅल्शियम मोठ्या प्रमाणात असते. ते कुरतडून खाण्याचे काम जंगली साळिंदर करते. हा एक प्रकारे अन्न साखळीचाच भाग आहे.

• जंगली कुत्रे :

ताडोबा अंधारी व्याघ्र प्रकल्पात आपणास जंगली कुत्र्यांचे कळप आढळतात. जे हरणे, डुक्कर यांची शिकार करून खातात.

• बिबट्याचा संचार येथे विशेषत रात्रीच्या अंधारात असतो. त्यामुळे ते दृष्टीस कमी पडतात.

• अस्वल :

अरण्यात अस्वल असून येथील झाडांवरील फळे, मध व लहान प्राणी यांची शिकार करण्यात ती पटाईत असतात.

• मगर :

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वाघानंतर मगर हा विशेषत येथील तलावात व पाणथळ जागी आढळणारा प्राणी आहे.

• पक्षी जीवन :



ताडोबा अंधारी व्याघ्र प्रकल्पात सफर करताना आपल्याला निरनिराळे स्थानिक व स्थलांतरित असे ३०० च्या वर पक्षी आपणास पाहायला मिळतात. बगळे, धनेश, रानकोंबड्या, करकोचे, खंड्या, मोर, भारद्वाज, मच्छीमार करणारा डोमकावळा तसेच विशिष्ट ऋतूत आढळणारे निरनिराळे पक्षी येथे आढळतात.

• ताडोबा हे नाव का पडले?

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पूर्वी पासून या परिसरात गोंड ही आदिवासी जमात येथे राहते. अनेक गोंड राजे शिकार करण्यासाठी या जंगलात येत असत. एक अख्यायिका अशी आहे की येथे पूर्वी तारू नावाचा एक आदिवासी युवक येथे होऊन गेला. तो अत्यंत धाडशी होता. तो जंगली प्राण्यापासून आपल्या लोकांचं रक्षण करण्यास सदैव तत्पर असे. वाघाच्या डोळ्यात डोळा देऊन तो झुंज करी. अरण्यात धाडशी कामे करी. जसे तेंडुपत्ते गोळा करणे, वनौषधी गोळा करणे, प्राण्यांची शिकार करणे, एके दिवशी वाघाशी सामना करताना तो मरण पावला. तेव्हा येथील तळ्याकाठी त्याचे अंतिम संस्कार करण्यात आले. तेथे आदिवासींनी पुढे देऊळ बांधले. व ते त्याची पूजा करू लागले. त्याच्या नावावरून येथील तलावास व अरण्यास ताडोबा हे नाव पडले. आजही दर पौष महिन्यात आदिवासी येथे यात्रा भरवतात. अन् उत्सव साजरा करतात.

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किडे कीटक :

• या अभयारण्यात आपणास अनेक लहान मोठ्या जातीचे किडे कीटक पाहायला मिळतात. जवळ जवळ १७५ प्रकारच्या फुलपाखरांच्या प्रजाती पाहायला मिळतात.

• शिकारा किडा :

उन्हाळ्याच्या काळात येथे शिकारा किड्यांची पैदास होते. ज्यांचे आयुष्य काही काळ असते. त्यांची संपूर्ण वाढ झाल्यावर ते एक प्रकारे आवाज करू लागतात. त्यावेळी त्यांच्या शरीरातून पाणी गळू लागते. ते संपले की ते मरून जातात. त्यांच्या ओरडण्याने अरण्यात एक भयसूचक वातावरण निर्माण होते. अनेक पक्षांचं ते आवडत खाद्य आहे.

• गवत : या ठिकाणी अनेक गवताच्या प्रजाती पहायला मिळतात. जवळपास त्यांची संख्या ६० पेक्षा जास्त आहे.

• सरीसृप :

येथे मगर, साप, घोरपड असे वेगवेगळे ऐकूण ५४ प्रकारचे सरीसृप आढळतात.

• ताडोबा अंधारी व्याघ्र प्रकल्प पाहण्यासाठी व्यवस्था :

• अभयारण्य पहायला जाताना आपल्याला बफर झोनला १४ गेट तर कोअर झोनला ६ गेट असे ऐकूण २० गेट आहेत. येथून परवानगी पास घेऊन अरण्यात प्रवास करण्यासाठी परवानगी मिळते. फक्त २०% क्षेत्र निरीक्षण करण्यासाठी मुभा असते. गाभा क्षेत्रात आपण प्रवेश करू शकत नाही.

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ताडोबा अंधारी व्याघ्र प्रकल्पा विषयी ऐतिहासिक माहिती :

• इसवी सन १९५५ सालामध्ये ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान म्हणून मान्यता दिली.

• इसवी सन १९८५ साली ताडोबा अंधारी अरण्ये एकत्र करून ताडोबा - अंधारी व्याघ्र प्रकल्प अभयारण्य म्हणून मान्यता दिली.

• इसवी सन २०१४ साली येथील जामनी, पांढरपोळ सारख्या आदिवासी गावांचे स्थलांतर अभयारण्य क्षेत्राबाहेर केले.

• सध्या इथे वनविभागामार्फत पर्यटन सुविधा दिली जाते.

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अभयारण्य पहायला जाण्यासाठी नियम व अटी :

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• अभयारण्य पहायला जाताना कोणत्याही प्लॅस्टिक वस्तू, कागद नेण्यास मनाई आहे.

• जाताना आपला मोबाईल फोन बंद करून जमा करावा लागतो. सेल्फी घेण्यास सक्त मनाई आहे.

• सफरीसाठी प्रवेश चार्ज घेतला जातो. ते तिकीट दाखवूनच आतमध्ये प्रवेश मिळतो.

• या ठिकाणी सफरीसाठी जिप्सी व कॅन्टर या दोन प्रकाराच्या गाड्यांना परवानगी आहे.

• सफर करताना वाहनातून खाली उतरू नये.

• प्राणी पाहून कोणताही आवाज करू नये. किंवा त्यांना त्रास होईल असे कृत्य करण्यास मनाई आहे.

• अभयारण्य परिसरात जाताना पिण्याच्या पाण्यासाठी काचेची बाटली विकत दिली जाते. प्लॅस्टिक बाटलीस बंदी आहे.

• अभयारण्य परिसरात धूम्रपान, मद्यपान करण्यास सक्त मनाई आहे.

• सफर करताना वन विभागाकडून एक गाईड व ड्राइव्हर दिला जातो. ते आपणास अरण्य सफर करण्यास मदत करतात.

• कॅमेरा, दुर्बीण नेण्यास परवानगी आहे. पण चार्जेस घेतले जातात.

• गेट जवळील दुकानातून आपण ते विकत अथवा भाड्याने घेऊ शकतो.

• मोहार्ली गेट तसेच इतर काही गेट पासून परिसरात अनेक उपहारगृहे, लॉज आहेत. तिथे आपल्या खाण्याची व जेवणाची, रहाण्याची व्यवस्था सोय होऊ शकते.

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• अशी आहे ताडोबा अंधारी व्याघ्र अभयारण्याची माहिती

Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur


ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य

चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


• स्थान :

महाराष्ट्र राज्य के विदर्भ विभाग में चंद्रपुर जिले में स्थित अंधारी नदी के उद्गम क्षेत्र में आपको ताडोबा अभयारण्य देखने को मिलता है।

• अभयारण्य का क्षेत्रफल :

• ताडोबा–अंधारी अभयारण्य के दो मुख्य भाग हैं।

• ताडोबा–अंधारी कोर ज़ोन क्षेत्रफल : 625.40 चौ. किलोमीटर

• ताडोबा–अंधारी बफर ज़ोन क्षेत्रफल : 1100 चौ. किलोमीटर

• कुल क्षेत्रफल : 1725.40 चौ. किलोमीटर

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


अभयारण्य पहुँचने के लिए यात्री मार्ग :

• नागपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से 140 किलोमीटर की दूरी पर ताडोबा–अंधारी व्याघ्र परियोजना है।

• चंद्रपुर से बस द्वारा 45 किलोमीटर दूरी पर ताडोबा अभयारण्य स्थित है।

• चिमूर से 32 किलोमीटर दूरी पर ताडोबा अभयारण्य है।

• चंद्रपुर जिला मुख्यालय होने के कारण यह स्थान रेल व सड़क मार्ग से देश के अन्य शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


ताडोबा अभयारण्य की स्थानीय जानकारी :

• वनस्पति जीवन :

ताडोबा अभयारण्य महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में आता है।

यहाँ का वातावरण गर्म और शुष्क होने के कारण यहाँ दक्षिण उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती जंगल (Tropical Dry Deciduous Forest) पाए जाते हैं।

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


यहाँ मुख्य रूप से निम्नलिखित वृक्ष पाए जाते हैं —

मोह, धावड़ा, आपटा, बेहड़ा, खैर, बिब्बा, शीशम, तेंदूपत्ता, सागवान, ऐन, बाँस।

इन वृक्षों में शिशिर ऋतु (सर्दी व गर्मी के बीच का समय) में पत्तों का झड़ना होता है।

इसके अलावा यहाँ आम, जामुन, अर्जुन जैसे सदाबहार वृक्ष भी पाए जाते हैं।

यहाँ मगरमच्छ की चमड़ी जैसी आकृति वाला क्रोकोडाइल ट्री (Crocodile Bark Tree) तथा रात में भूत जैसे दिखने वाला घोस्ट ट्री भी देखने को मिलता है।

नवनिर्मित वनीकरण में काफी जगह खाली छोड़ी गई है, जिसे फायर लाइन / फायर ज़ोन कहते हैं।

इसका उद्देश्य जंगल में आग लगने पर उसे फैलने से रोकना है।

यहाँ के जंगल से वन विभाग बाँस, इमारती लकड़ी, औषधियाँ और तेंदूपत्ते जैसे उत्पाद प्राप्त करता है।



• जल व्यवस्था :

अंधारी नदी :

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


यह इस अभयारण्य की मुख्य जीवनदायिनी नदी है।

कहानी के अनुसार पहले यहाँ इतना घना जंगल था कि सूर्य की रोशनी भी ज़मीन तक नहीं पहुँचती थी।

हर तरफ अंधेरा होने के कारण इस नदी का नाम अंधारी नदी पड़ा।

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ताडोबा :

ताडोबा यहाँ का मुख्य व बड़ा तालाब है।

इस तालाब में सालभर पर्याप्त पानी रहता है।

इसी तालाब के आधार पर पूरे अभयारण्य का नाम ताडोबा रखा गया।

इस क्षेत्र में इसके अलावा भी कई छोटे–बड़े जलस्रोत मिलते हैं :

वाघडोह, मोहाचा खड्डा, आंबे डोह, जामुन झोरा, सांबर डोह, वसंत बांध, काटेजरी, उमरी फाटा, काला आंबा, तेल्याताड इत्यादि।

इन जलस्रोतों से जंगल के सभी जंगली जानवरों की पानी की आवश्यकता पूरी होती है।

गर्मी में पानी सूखने की समस्या न हो इसलिए वन विभाग ने कई जगह सोलर पंप व बोअरवेल आधारित कृत्रिम जलस्रोत भी बनाए हैं।

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• प्राणी जीवन :

यहाँ के मुख्य बिग फाइव इस प्रकार हैं —

वाघ (बाघ), बिबट्या (तेंदुआ), अस्वल (भालू), जंगली कुत्रे (ढोले), गवा (जंगली भैंस)।

इसके अलावा यहाँ ये जीव भी पाए जाते हैं —

काला हिरण, चीतल, रानडुक्कर (जंगली सूअर), साळिंदर (साही), भेकर, उदमांजर (सिवेट), लांडगा (भेड़िया), मुंगूस, घोरपड (मॉनिटर लिज़र्ड), नीलगाय तथा पिसुरी हिरण।

• वाघ (बाघ) :

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


ताडोबा का सबसे महत्वपूर्ण व आकर्षक प्राणी बाघ है।

इसे रॉयल बंगाल टाइगर कहा जाता है।

• नर बाघ का क्षेत्र : 40–45 चौ. कि.मी.

• बाघिन का क्षेत्र : 11–12 चौ. कि.मी.

एक बाघ या बाघिन दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश करे तो संघर्ष होता है।

बाघ अपने क्षेत्र को चिह्नित करने के लिए —

• पेड़ों व पत्थरों पर पंजों से खुरचाव

• मूत्रविसर्जन के माध्यम से निशान छोड़ते हैं।

गर्मियों में बाघ अक्सर जलस्रोतों में आराम करते दिखते हैं।

बाघों की गिनती अमेरिकन वाइल्डलाइफ कंजरवेशन सोसायटी की मदद से लगे कैमरा ट्रैप और सेंसर द्वारा की जाती है।

दो बाघों के शरीर पर पट्टों का पैटर्न कभी भी समान नहीं होता, इसी से उनकी पहचान की जाती है।

ताडोबा के तेल्या तलाव क्षेत्र में प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री

“टाइगर सिस्टर्स ऑफ़ तेलिया” शूट की गई है।

• रानगवे (जंगली भैंस) :

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यहाँ प्रचुर पानी व घास के कारण जंगली भैंसों (गवा) के बड़े–बड़े झुंड मिलते हैं।

ये भारी–भरकम, काले, मजबूत व नुकीले सींगों वाले होते हैं।

• हरणे (हिरण) :



यहाँ सुंदर काले हिरण तथा पीले रंग पर सफेद डॉट वाले चीतल बड़ी संख्या में मिलते हैं।

ये बाघ का मुख्य भोजन हैं।

बाघ हिरण का मांस खाता है और हड्डियाँ छोड़ देता है, जिनमें कैल्शियम अधिक होता है।

उन्हें साळिंदर (साही) कुतरकर खाता है — यह भोजन श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण भाग है।

• जंगली कुत्रे (ढोले) :

यहाँ ढोलों के समूह बड़ी संख्या में देखे जाते हैं जो हिरण और जंगली सूअर का शिकार करते हैं।

• बिबट्या (तेंदुआ) :

तेंदुआ अधिकतर रात में सक्रिय रहता है, इसलिए इसका दर्शन कम होता है।

• अस्वल (भालू) :

यह जंगल में पाए जाने वाला महत्वपूर्ण प्राणी है।

यह पेड़ों पर मौजूद फल, मधु तथा छोटे जीव खाता है।

• मगर :

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


बाघ के बाद यहाँ तालाबों व दलदली क्षेत्रों में मगरमच्छ विशेष रूप से पाए जाते हैं।

• पक्षी जीवन :



ताडोबा सफारी के दौरान 300 से अधिक स्थानीय और प्रवासी पक्षी देखे जा सकते हैं।

इनमें प्रमुख हैं —

बगुले, धनेश, रानकोंबड़ी (जंगलफाउल), करकोचा, खंड्या (किंगफिशर), मोर, भारद्वाज, मछलीमार डोमकावला,

साथ ही कई ऋतु आधारित प्रवासी पक्षी भी यहाँ दिखाई देते हैं।

ताडोबा नाम क्यों पड़ा?

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


यहाँ गोंड आदिवासी समुदाय निवास करता है।

कहा जाता है कि यहाँ पहले तारू नाम का एक अत्यंत बहादुर आदिवासी युवक रहता था।

वह जंगली जानवरों से अपने गाँव की रक्षा करता था।

वह वाघ (बाघ) की आँखों में आँखें डालकर मुकाबला करता था, तेंदूपत्ते व वन औषधियाँ लाता था तथा कई खतरनाक काम करता था।

एक दिन वाघ से संघर्ष करते हुए उसकी मृत्यु हो गई।

उसके अंतिम संस्कार तालाब के किनारे किए गए।

बाद में आदिवासियों ने वहाँ मंदिर बनाया और उसकी पूजा करने लगे।

इसी युवक "तारू" से इस स्थान का नाम ताडोबा पड़ा।

आज भी पौष महीने में आदिवासी यहाँ विशेष यात्रा व उत्सव मनाते हैं।

कीड़े-मकौड़े :

• इस अभयारण्य में आपको अनेक छोटे-बड़े प्रकार के कीड़े-मकौड़े देखने को मिलते हैं। लगभग 175 प्रकार की तितलियों की प्रजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं।

• शिकारा कीड़ा :

गर्मी के मौसम में यहाँ शिकारा कीड़ों की पैदाइश होती है। इनका जीवनकाल बहुत कम होता है। पूरी तरह विकसित होने पर ये एक प्रकार की आवाज निकालने लगते हैं। उस समय इनके शरीर से पानी टपकने लगता है। उनकी यह प्रक्रिया पूरी होते ही वे मर जाते हैं। इनके जोर-जोर से आवाज करने से जंगल में एक भय-सूचक वातावरण बन जाता है। कई पक्षियों का यह प्रिय भोजन है।

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• घास :

इस स्थान पर विभिन्न प्रकार की घास की प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं। इनकी संख्या लगभग 60 से अधिक है।

सरीसृप :

यहाँ मगर, सांप, घड़ियाल/घोरपड़ जैसे विभिन्न कुल मिलाकर 54 प्रकार के सरीसृप पाए जाते हैं।

ताडोबा अंधारी बाघ परियोजना देखने की व्यवस्था :



• अभयारण्य देखने के लिए बफ़र ज़ोन में 14 गेट तथा कोर ज़ोन में 6 गेट, कुल मिलाकर 20 गेट हैं।

इन गेटों से परमिट पास लेकर ही जंगल में प्रवेश मिलता है।

केवल 20% क्षेत्र निरीक्षण हेतु खुला रहता है।

गर्भ क्षेत्र (कोर इंटर्नल ज़ोन) में प्रवेश की अनुमति नहीं है।

ताडोबा अंधारी बाघ परियोजना का इतिहास :

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


• सन् 1955 में ताडोबा को राष्ट्रीय उद्यान के रूप में मान्यता दी गई।

• सन् 1985 में ताडोबा और अंधारी वन को मिलाकर ताडोबा–अंधारी बाघ परियोजना घोषित किया गया।

• सन् 2014 में यहाँ के जामनी, पांढरपोळ जैसे आदिवासी गाँवों को अभयारण्य क्षेत्र से बाहर स्थानांतरित किया गया।

• वर्तमान में यहाँ वन विभाग द्वारा पर्यटन सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

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अभयारण्य देखने के लिए नियम व शर्तें :

• अभयारण्य में प्रवेश करते समय किसी भी प्रकार की प्लास्टिक वस्तु या कागज़ ले जाना मना है।

• प्रवेश के समय अपना मोबाइल फोन बंद करके जमा करना पड़ता है। सेल्फी लेने पर सख्त पाबंदी है।

• सफारी के लिए प्रवेश शुल्क लिया जाता है। टिकट दिखाकर ही प्रवेश मिलता है।

• सफारी के लिए जीप (Gypsy) और कैंटर इन दो प्रकार के वाहनों को अनुमति है।

• सफारी के दौरान वाहन से नीचे उतरना मना है।

• जानवरों को देखकर कोई आवाज न करें और न ही उन्हें परेशान करने वाली कोई हरकत करें।

• पीने के पानी के लिए प्रवेश द्वार पर काँच की बोतल दी जाती है। प्लास्टिक बोतलें प्रतिबंधित हैं।

• अभयारण्य परिसर में धूम्रपान और मद्यपान सख्ती से निषिद्ध है।

• वन विभाग की ओर से एक गाइड और ड्राइवर साथ में दिए जाते हैं।

• कैमरा, दूरबीन ले जाने की अनुमति है, लेकिन इसके लिए अतिरिक्त शुल्क लिया जाता है।

• गेट के पास स्थित दुकानों से इन्हें खरीदा या किराए पर लिया जा सकता है।

• मोहार्ली गेट सहित कई गेटों के पास भोजन, नाश्ता व रहने की व्यवस्था के लिए होटल और लॉज उपलब्ध हैं।

ताडोबा – अंधारी राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  चंद्रपुर, महाराष्ट्र (Tadoba Andhari National Park & Tiger Reserve)


यही है ताडोबा-अंधारी व्याघ्र अभयारण्य की विस्तृत जानकारी। Tadoba andhari rastriy udyan abhyarany chndrapur maharashtra 




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