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शनिवार, १० जानेवारी, २०२६

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)

 वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


“अजेय दुर्ग जंजीरा, वसई का किला भी बेहोशी की हालत में लड़ता रहा, अंततः मोहरा इरेला गिर पड़ा। महाराष्ट्र देशाभिमानी, परदेशियों की नांगी को तोड़ने वाला। पर स्वभाव से भावनाशील, अंत में चरणों में समर्पित हुआ।”

📍 स्थान :

महाराष्ट्र राज्य के पालघर जिले में वसई गाँव के पास, समुद्र से सटा हुआ एक किला स्थित है, जिसे वसई का किला कहा जाता है।

  किले का नाम :

सेंट सेबेस्टियन किला, वसई

🛣️ किले तक पहुँचने के मार्ग :

🌊 समुद्री मार्ग :

वसई का किला अरब सागर के तट पर स्थित एक भुईकोट किला है। यह उल्हास नदी की खाड़ी के क्षेत्र में, भारत के महाराष्ट्र राज्य में स्थित है।

इस कारण यहाँ समुद्री मार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है।

मुंबई, सूरत तथा अन्य भारतीय बंदरगाहों से समुद्री मार्ग द्वारा इस किले तक पहुँचा जा सकता है।

🚗 स्थल मार्ग :

मुंबई से ठाणे, वहाँ से ससूनघर – सातीवली – विरार – वसई होते हुए वसई किले तक पहुँचा जा सकता है।

(लगभग दूरी : 50 किलोमीटर)

सूरत – वापी – पालघर मार्ग से भी वसई पहुँचा जा सकता है।

मुंबई, ठाणे और सूरत जैसे बड़े शहर रेल, सड़क और हवाई मार्ग द्वारा अन्य देशांतर्गत व अंतरराष्ट्रीय स्थानों से जुड़े हुए हैं।

नाला सोपारा वसई के निकट स्थित है।

👀 वसई किले में देखने योग्य स्थान :

वसई गाँव से किले की ओर जाते समय यह क्षेत्र तीन ओर से पानी और दलदली भूमि से घिरा हुआ दिखाई देता है तथा एक ओर से सड़क द्वारा वसई गाँव से जुड़ा हुआ है।

🚪 प्रवेश द्वार :

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


वसई गाँव से जब हम किले की ओर बढ़ते हैं, तब सबसे पहले एक प्रवेश द्वार दिखाई देता है।

यह बालेकिले का प्रवेश द्वार है, जिसे सेंट सेबेस्टियन कहा जाता है।

समय के साथ इस द्वार का काफी हिस्सा नष्ट हो चुका है, लेकिन इसकी मेहराबदार चौखट आज भी सुरक्षित है।

द्वार के एक ओर ईसाई धर्म का प्रतीक होली क्रॉस अंकित दिखाई देता है।

इसके स्तंभ पुर्तगाली पाश्चात्य स्थापत्य शैली को दर्शाते हैं।

इस द्वार के ऊपर कभी सेंट सेबेस्टियन की मूर्ति स्थापित थी, जो समय के साथ नष्ट हो गई प्रतीत होती है।

द्वार के अंदर की ओर शत्रु को रोकने के लिए अडन्य (लकड़ी की अड़चन) लगाने की व्यवस्था तथा पहरेदारों के विश्राम हेतु बनी हुई देवड़ियाँ आज भी दिखाई देती हैं।

दूसरा प्रवेश द्वार :

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


पहला द्वार देखने के बाद आगे बढ़ने पर जब आधा मोड़ लिया जाता है, तो तुरंत दूसरा द्वार दिखाई देता है। किले की सुरक्षा की दृष्टि से इस प्रकार की रचना की गई थी। इस द्वार के ऊपरी भाग में कुछ जंग्याएँ (छिद्र) बनी हुई हैं, जिनसे किले पर आक्रमण होने की स्थिति में शत्रुओं पर बंदूक से गोलीबारी, जलते हुए आग के गोले तथा खौलता हुआ तेल डाला जा सकता था। ऐसी रक्षात्मक व्यवस्था यहाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

बालेकिले के पीछे का बुर्ज :

दूसरे प्रवेश द्वार से भीतर जाने पर एक बुर्ज दिखाई देता है। इस बुर्ज पर पुर्तगाली भाषा में एक शिलालेख खुदा हुआ है। उस पर उल्लेख है कि यह किला पुर्तगाली गवर्नर के आदेश से गार्जिया डिश द्वारा बनवाया गया था। वर्तमान समय में इस बुर्ज पर बड़ी मात्रा में घास, पेड़ और झाड़ियाँ उगी हुई दिखाई देती हैं।

चर्च (गिरजाघर) :

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किले पर पुर्तगाली काल के अनेक चर्च देखने को मिलते हैं। इनमें से कुछ चर्च जर्जर अवस्था में हैं। चर्च के सामने अर्धवृत्ताकार मेहराबदार द्वार होता है। उसके बाद प्रार्थना स्थल और भीतर की ओर होली क्रॉस तथा पादरी के उपदेश देने की जगह होती है। वहाँ अर्धवृत्ताकार सुंदर मेहराबदार रचना दिखाई देती है, जिस पर छत बनी हुई है।

चर्च की ऊँचाई को देखकर यह इमारत तीन से चार मंज़िला प्रतीत होती है। ऊपरी भाग में गवाक्ष (खिड़कियाँ) बनी हुई हैं, जिससे प्रकाश अंदर आने की व्यवस्था की गई थी। इन गवाक्षों में रंग-बिरंगे काँच लगाए गए थे, जिनसे प्रकाश छनकर चर्च के अंदर उजाला फैलाता था।

घंटा मीनार :

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प्रत्येक चर्च के पास तीन से चार मंज़िला घंटा मीनार पाई जाती है। इन मीनारों में बड़ी घंटियाँ लगाई जाती थीं। समय के साथ यहाँ कई चर्च बनाए गए और प्रत्येक चर्च के साथ घंटा मीनार भी बनाई गई। अब ये विशाल घंटियाँ यहाँ नहीं हैं, लेकिन आज भी इन मीनारों में खड़े होकर आवाज़ देने पर प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

वर्तुलाकार सीढ़ियाँ :

चर्च की इमारतें दो या तीन मंज़िला होती थीं। ऊपरी भाग में जाने के लिए गोलाकार (चक्राकार) सीढ़ियाँ बनाई गई थीं। ये सीढ़ियाँ आज भी इतिहास की साक्षी बनी हुई हैं।

विस्तृत मैदान :

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बालेकिले के अंदर एक विशाल मैदान दिखाई देता है। यहाँ सैनिकों का अभ्यास और कसरत होती थी। लगभग दो से ढाई हजार सैनिक यहाँ रहते थे, और घोड़ों को भी यहीं बाँधा जाता था।

अस्पताल :

वसई किले में चर्च के पास ऊँची दीवारों वाली एक इमारत दिखाई देती है, जो उस समय का अस्पताल था। पुर्तगाली काल में यहाँ घायल सैनिकों, रोगियों तथा अन्य कर्मचारियों का इलाज किया जाता था। इस इमारत में कई खिड़कियाँ और कक्ष हैं, तथा ऊँचाई से यह भवन दो से तीन मंज़िला प्रतीत होता है।

सैनिक बैरक :

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बालेकिले से सटे हुए सैनिकों के रहने के लिए बैरक बने हुए थे, जहाँ सैनिक विश्राम किया करते थे।

चौकोर कुआँ :

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यहाँ पुर्तगाली काल का एक चौकोर संरचना वाला कुआँ है, जो उस समय पानी की आवश्यकता को पूरा करता था। वर्तमान में उस पर झाड़ियाँ उग आई हैं और इसका पानी पीने योग्य नहीं है।

गोल कुआँ :

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मैदान के बीच में एक गोल कुआँ भी दिखाई देता है, लेकिन यह किस काल का है, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।

कारखाने की चिमनी (धुराड़ा) :

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किले में एक चिमनी दिखाई देती है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ कभी गुड़ या चीनी का कारखाना था। जब मराठों से यह किला अंग्रेजों के हाथ में गया, तब कर्नल लिटलवुड नामक एक ब्रिटिश अधिकारी यहाँ रहता था। उसने किले के आसपास और भीतर की दलदली भूमि में गन्ने की खेती करवाई और गुड़ तथा चीनी बनाने के लिए एक घाना या कारखाना बनवाया।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कारखाने के निर्माण के लिए उसने किले की तटबंदी और अन्य हिस्सों के पत्थर भी बेच दिए थे।

• प्राचीर (तटबंदी) और सीढ़ियाँ :

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किले के कुछ हिस्सों की प्राचीर आज भी अच्छी स्थिति में दिखाई देती है। प्राचीर के कुछ भागों का पुनर्निर्माण किया गया प्रतीत होता है। इसकी मोटाई इतनी अधिक है कि उस पर से एक छोटी चार पहिया गाड़ी भी आसानी से गुजर सकती है। जगह-जगह कई बुर्ज दिखाई देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस किले में कुल दस बुर्ज हैं। इनके नाम हैं – कावलिरो बुर्ज, सेंट सेबेस्टियन, सेंट गोसेलो, एलिफंटा, रैस मागो, सेंट पॉल, माद्रद दीय, नोसा सिनेरा दोरेमेदिया, सेंट पेद्रू तथा दसवाँ सेंट सेबेस्टियन। प्रत्येक बुर्ज पर जंग्याएँ और फांजियाँ बनाई गई थीं।

• पुर्तगाली कालीन कारागार (तुरुंग) :

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


वसई किले का निरीक्षण करते समय टाउन हॉल के पास एक निर्माण दिखाई देता है। वर्तमान में केवल ऊँची दीवारें और उनके भीतर बने दरवाजे शेष हैं। बिना छत वाला यह स्थान पुर्तगाली काल में कैदियों को रखने के लिए बनाया गया कारागार था। बाद में ब्रिटिश काल में इस स्थान का स्वरूप बदल दिया गया। यह परिवर्तन दीवारों में बनी खिड़कियों और दरवाजों की बदली हुई बनावट से स्पष्ट होता है।

पुर्तगाली काल में यहाँ अपराधियों और युद्धबंदियों को रखा जाता था। इस इमारत के बाहर की ओर पुर्तगाली भाषा में एक शिलालेख दिखाई देता है, जिसमें सन 1640 में निर्माण किए जाने का उल्लेख है।

• पुर्तगाली कालीन टाउन हॉल :

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वसई किले में स्थित पुर्तगाली कालीन वास्तु अवशेषों में टाउन हॉल की इमारत रोमन शैली में निर्मित दिखाई देती है। इस स्थान पर सत्कार, विदाई और स्वागत समारोह जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। यह एक शासकीय मुख्यालय की इमारत थी, जहाँ से दस्तावेज़ी कार्य और पत्र-व्यवहार संचालित होता था।

यहाँ की दीवारों पर पाश्चात्य शैली की नक्काशी तथा ईसाई प्रतीक भी उकेरे हुए दिखाई देते हैं।

• प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय :

कारागार परिसर में स्थित एक इमारत संग्रहालय के रूप में उपयोग में थी, जिसे प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूज़ियम कहा जाता था।

• ईसाई मठ (क्रिश्चियन चर्च मठ) :

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


ईसाई धर्म का उपदेश देने वाले पादरी और बिशपों के निवास, धार्मिक अध्ययन तथा ईसाई धर्म के विचारों के प्रसार हेतु यहाँ एक मठ की स्थापना की गई थी। इस स्थान पर एक बपतिस्मा (बाप्तिस्मा) मंदिर है, जिसकी इमारत आज भी अच्छी स्थिति में देखी जा सकती है।

यहाँ धर्मांतरण कर अन्य धर्मों के लोगों को ईसाई धर्म में प्रवेश दिया जाता था। इस परिसर में एक घंटाघर तथा एक विशाल चर्च भी है, जिसका नाम संत जोसेफ ख्रिस्त मंदिर है।

• बाज़ारपेठ :

वसई किले के भीतर पुर्तगाली काल में एक बड़ी बाज़ारपेठ थी, जहाँ से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार होता था। मुख्य रूप से बाँस, काली मिर्च, मसाले, चीनी का व्यापार होता था और कभी-कभी दासों का बाज़ार भी लगाया जाता था।

• वज्रेश्वरी देवी मंदिर :

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


किले के भीतर कुछ हिंदू मंदिर भी देखने को मिलते हैं। जब मराठा पेशवाकालीन सरदार चिमाजी अप्पा इस किले को जीतने आए थे, तब उन्होंने वज्रेश्वरी देवी से मन्नत मांगी थी कि किला जीतने पर मंदिर का निर्माण करेंगे। किला जीतने के बाद उन्होंने वज्रेश्वरी देवी का मंदिर बनवाया।

• नागेश्वर मंदिर :

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


किले के परिसर में एक और मंदिर स्थित है, जो भगवान शिव का मंदिर है।

• हनुमान / मारुति मंदिर :

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जब मराठों ने यह किला अपने अधिकार में लिया, तब यहाँ वीरता और शक्ति की उपासना के प्रतीक स्वरूप मारुति (हनुमान) मंदिर का निर्माण किया गया।

• संत गोंसालवियास ख्रिस्त मंदिर :

वसई किले में आज भी अच्छी स्थिति में स्थित ईसाई चर्च संत गोंसालवियास चर्च है। वर्तमान समय में भी यहाँ ईसाई धर्म के पवित्र उत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं।

• दर्या दरवाज़ा :

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


किले के अंतिम सिरे पर समुद्री खाड़ी से सटे हुए लगातार दो ऊँचे और भव्य दरवाज़े स्थित हैं। इस स्थान से समुद्र की ओर जाया जा सकता है। ये दोनों दरवाज़े आज भी मजबूत अवस्था में खड़े होकर अपने वैभव की साक्ष देते हैं। इनमें से दर्या दरवाज़े के पल्ले आज भी अच्छी स्थिति में हैं। उन पर लोहे की चादर और बड़े-बड़े कीलें जड़ी हुई दिखाई देती हैं। इनकी मोटाई देखकर उस समय के वैभव और सामर्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है।

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


• बाओबाब वृक्ष :

दर्या दरवाज़े के बाहर की ओर पुर्तगाली शासन काल का एक विशाल वृक्ष दिखाई देता है। यह विशाल वृक्ष बाओबाब है।

• उपेक्षा के कारण बढ़ी वनस्पति :

किले की ओर लंबे समय से हुए उपेक्षा के कारण आज यहाँ अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ और पेड़-पौधे समय के साथ बढ़ते हुए दिखाई देते हैं।

वसई किले का ऐतिहासिक विवरण :

ईस्वी सन की 13वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र पर मौर्य शासकों का नियंत्रण था।

भंडारी वेंगाळे नामक सरदार ने इस स्थान के अंतरराष्ट्रीय महत्व को समझते हुए ई.स. 1414 में यहाँ एक गढ़ी के रूप में भुईकोट किले का निर्माण करवाया।

ई.स. 1420 से 1530 के बीच गुजरात के मुस्लिम शासक बहादुरशाह का यहाँ शासन रहा।

ई.स. 1533 में सेंट सेबेस्टियन ने इस किले को अपने अधिकार में लिया।

ई.स. 1534 के बाद, पुर्तगाली शासकों ने यहाँ अनेक चर्च, टाउन हॉल, सैनिक निवास, अन्य आवासीय इमारतें तथा किले की तटबंदी का निर्माण किया।

ई.स. 1536 में गैरीसन चर्च का निर्माण किया गया।

ई.स. 1540 में अस्पताल बनाया गया।

ई.स. 1606 में कोर्ट ऑफ आर्म्स की इमारत का निर्माण हुआ।

ई.स. 1739 में पेशवाकाल के दौरान मराठा सरदार चिमाजी अप्पा ने मराठों के विरुद्ध गतिविधियाँ करने वाले पुर्तगालियों के खिलाफ अभियान चलाया और वसई किले पर आक्रमण किया। इस युद्ध में अनेक मराठा वीर शहीद हुए, अंततः किला मराठों के हाथों में आ गया।

वसई का किला (Vasai Fort Information in Hindi)


पेशवाकाल में इस किले पर अनेक हिंदू मंदिरों का निर्माण किया गया।

ई.स. 1774 में यह किला अंग्रेज़ों ने जीत लिया।

ई.स. 1774 में ही सालबाई की संधि के अंतर्गत यह किला पुनः मराठों को सौंप दिया गया।

ई.स. 1818 में मराठा साम्राज्य का पतन हुआ और यह किला ब्रिटिश सत्ता के अधीन चला गया।

ई.स. 1860 में ब्रिटिश सरकार ने इस किले को ब्रिटिश अधिकारी लिटलवुड को किराये पर दिया। उसने यहाँ चीनी का कारखाना स्थापित करने का प्रयास किया।

26 मई 1909 को तत्कालीन भारत सरकार ने इस किले को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया।

15 अगस्त 1947 के बाद यह किला भारत सरकार के अधीन आ गया।

इस प्रकार वसई किले का गौरवशाली ऐतिहासिक परिचय हमें प्राप्त होता है। Vasai kille ke bare me jankari hindi me 



Vasai Fort (Bassein Fort) – Information in English

  Vasai Fort (Bassein Fort) – Information in English “Invincible fort Janjira, Vasai Fort too fought till unconsciousness, finally the front...