किल्ले भुदरगड के बारे मे जाणकारी हिंदी मे
Bhudargad kile ke bare me jankari hindi me
भुदरगड स्थान
कोल्हापुर ज़िले में गारगोटी शहर से समीप सह्याद्री पर्वत की उप-दूधगंगा (चिकोडी) पर्वतरांगों में शान से खड़ा हुआ शिलाहार राजा भोज द्वितीय द्वारा निर्मित गिरीदुर्ग ही भुदरगड किला है।
भुदरगड किले का भूगोल:
किले के पश्चिम व उत्तर दिशा में वेदगंगा नदी की विस्तृत घाटी स्थित है।
पूर्व दिशा में चिकोत्रा नदी पर बना नागणवाड़ी प्रकल्प व चिकोत्रा नदी की घाटी है।
दक्षिण दिशा में "म्हातारीचे कामत" नामक विशाल पठार फैला हुआ है।
इन सभी के मध्य में पहाड़ी पर भुदरगड किला स्थित है।
भुदरगड किले की ऊँचाई:
भुदरगड किला समुद्र तल से लगभग 3190 फीट ऊँचाई पर स्थित है। यह एक विस्तृत पठार पर बसा है।
पठार की लम्बाई लगभग 800 मीटर है।
चौड़ाई लगभग 700 मीटर है।
भुदरगड किले के समीप स्थित गाँव:
किले के पायथ्य में तथा आसपास ये बस्तियाँ स्थित हैं –
राणेवाड़ी, माडेकरवाड़ी, कदमवाड़ी, पेठ शिवापूर, शिंदेवाड़ी, वरेकरवाड़ी, जकीन पेठ, गडबिद्री, वरपेवाड़ी, बारवे, मुरुक्टे, पुष्पनगर।
भुदरगड़ किले तक पहुँचने का मार्ग
भुदरगड़ किले तक जाने के लिए डामर सड़क सीधे किले के अंदर तक जाती है।
कोल्हापुर से किले भुदरगड़ की दूरी 61 किलोमीटर है।
कोल्हापुर से गारगोटी की दूरी 50 किलोमीटर है। वहाँ से पुष्पनगर मार्ग होते हुए सीधे डामर सड़क से राणेवाड़ी – पेठ शिवापुर मार्ग से 11 किलोमीटर दूर भुदरगड़ किला है।
गारगोटी – पाल मार्ग – बार्वे – पेठ शिवापुर होते हुए किले भुदरगड़ जाया जा सकता है। यह दूरी लगभग 15 किलोमीटर होती है।
गडहिंग्लज – उत्तुर – पिंपलगाँव – दिंडेवाड़ी – बार्वे मार्ग से भी किले भुदरगड़ पहुँचा जा सकता है।
भुदरगड़ किले पर दर्शनीय स्थल :
किले पर घूमने योग्य स्थानों में –
हौद इत्यादि शामिल हैं।
हनुमान मंदिर
भुदरगड़ किले की उत्तरी तटबंदी के नीचे स्थित पेठ शिवापुर गाँव से किले की ओर आते समय, रास्ते के दाहिनी ओर बाहर की तटबंदी के नीचे एक प्राचीन हनुमान मंदिर दिखाई देता है। हनुमानजी बलोपासना (शक्ति साधना) के प्रतीक माने जाते हैंl
गुप्त भुयारी मार्ग :
हनुमान मंदिर से आगे झाड़ियों के बीच, तट के नीचे से एक गुप्त भुयारी मार्ग होने की जानकारी मिलती है। कहा जाता है कि यह मार्ग पाल गाँव के घने जंगल में खुलता था।
सुरक्षा कारणों से आज यह मार्ग बंद कर दिया गया है।
इस रास्ते का उपयोग किले पर यदि हमला हो जाए तो रसद (अनाज व सामान) पहुँचाने और यदि किला शत्रु के कब्जे में चला जाए तो सुरक्षित बाहर निकलने के लिए किया जाता था।
पाल गाँव का नामकरण
शिलाहार राजा भोज द्वितीय शिकार करने के लिए पाल क्षेत्र में आया करता था। यहाँ वह एक पाल (झोपड़ी/आवास) बनाकर रहता था। इसी कारण उस स्थान का नाम पाल पड़ा।
भैरवनाथ मंदिर :
हनुमान मंदिर से ऊपर किले पर चढ़ने के बाद डामर सड़क से सीधे भैरवनाथ मंदिर तक पहुँचा जा सकता है। यह किले का प्राचीन मंदिर है और हेमाडपंथी शैली में निर्मित है। लाल पत्थर से बना सुंदर सभामंडप तथा अंदर दो बड़े हाल हैं।
भीतर गर्भगृह है, जिसमें काले पत्थर से तराशी हुई भैरवनाथ की सुंदर मूर्ति देखने को मिलती है। मंदिर के पास यात्रियों के ठहरने के लिए ओवरियाँ बनी हुई हैं। जब मराठों ने इस किले पर विजय प्राप्त की, तब उन्होंने इस मंदिर को मुगलों की पताका दान में दी थी, जो आज भी यहाँ देखने को मिलती है। मंदिर के सामने के प्रांगण में कई छोटी-बड़ी देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं। आगे की ओर दो ऊँची दीपमालाएँ दिखाई देती हैं। हर साल माघ कृष्ण नवमी के दिन यहाँ बड़ी यात्रा भरती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं।
तोपगाड़ा :
भैरवनाथ मंदिर के सामने दीपमालाओं के आगे एक तोपगाड़ा है, जिसे एक पत्थर की बनी चौकी पर रखा गया है। उसी चौकी के एक ओर तोप गाड़ी में लगाने के लिए पुराने टूटी हुई पत्थर की चक्के भी देखने को मिलते हैं। यहाँ से आगे वेदगंगा नदी और उसका घाटी क्षेत्र दिखाई देता है। साथ ही गारगोटी शहर का भी दर्शन होता है।
भुदरगड किला – तटबंदी :
इस किले की तटबंदी अत्यंत मजबूत है। हाल ही में इस किले की तटबंदी का जीर्णोद्धार किया गया है। जगह-जगह पहरेदारी के लिए बुर्ज, तट पर जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। जगह-जगह प्राचीन दरवाजे बंद अवस्था में दिखाई देते हैं। तट के किनारे कुछ दूरी पर स्थान-स्थान पर शौचालय भी देखने को मिलते हैं।
चोरवाट (गुप्त रास्ता):
किले की प्राचीर से बाहर जाने के लिए गुप्त रास्ते (चोरवाट) भी बने हुए थे। लेकिन सुरक्षा कारणों से अब इन्हें बंद कर दिया गया है।
चिलखती बुर्ज (दुहरे बुर्ज):
किले की किलेबंदी में दुहरी संरचना वाला, निगरानी के लिए बनाया गया चिलखती बुर्ज है।
प्राचीन वाड़े के अवशेष:
भैरवनाथ मंदिर से थोड़ा आगे जाने पर एक ओर पुराने वाड़ों के अवशेष दिखाई देते हैं।
धान्य कोठार (अनाज भंडार) व खुला हौद:
भैरवनाथ मंदिर के पास कुछ दूरी पर चौकोर आकार का एक खुला, मजबूत निर्मित धान्य कोठार का हौद दिखाई देता है। पहले यह ढका हुआ था, लेकिन अब केवल पक्की संरचना नजर आती है। यह गहरे जमीन में स्थित है। यहाँ पहले अनाज संग्रहित किया जाता था।
किले पर तैनात सैनिकों और वहाँ रहने वाले लोगों की अन्न की जरूरत पूरी करने के लिए यहाँ अनाज का भंडार रखा जाता था।
सदर:
भैरवनाथ मंदिर से दुधीतलाब की ओर जाते समय एक वास्तु मिलती है। वहाँ का गिरा हुआ निर्माण हाल ही में ठीक किया गया है। यहाँ सदर हुआ करती थी, जिसका उपयोग राजाओं और सरदारों की बैठक व चर्चा के लिए किया जाता था।
शिव मंदिर:
सदर के पास ही एक मंदिर है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर छत्रपति शिवाजी महाराज की एक प्रतिमा है, जिसे भालजी पेंढारकर ने सन् 1945 में स्थापित किया था।
इसके पीछे गर्भगृह है जिसमें शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर की मरम्मत करवीर संस्थान ने की और इसका जीर्णोद्धार कराया।
अंबा माता मंदिर / भवानी मंदिर:
शिवमंदिर के सामने के भाग में कुछ खंडहर दिखाई देते हैं। उसी स्थान पर गिरी हुई प्राचीर के पास अंबा माता मंदिर है। यहाँ भवानी देवी अर्थात अंबा माता की शस्त्रसज्ज मूर्ति स्थापित है।
दुधी तालाब:
शिवमंदिर से थोड़ा आगे जाने पर एक विशाल जलाशय दिखाई देता है। भुदरगड किले पर स्थित सबसे बड़ा जलस्रोत दुधी तालाब है।
इसके पानी का रंग सफेद दिखाई देता है, इसलिए इसे दुधी तालाब कहा जाता है। इस पानी का उपयोग किले पर खेती के लिए किया जाता है।
भैरवी मंदिर:
तालाब के किनारे एक देवी का मंदिर भी है। यह हेमाडपंथी शैली में निर्मित है।
महादेव मंदिर :
दुधी तालाब के किनारे दूसरी ओर एक प्राचीन महादेव मंदिर दिखाई देता है। इसकी बनावट हेमाडपंथी शैली की है। एक पत्थर की खोखली जगह में दूसरा पत्थर जड़कर इसकी रचना की गई है।
जखुबाई मंदिर :
दुधी तालाब से एक रास्ता जकिन पेठ गाँव की ओर जाता है। उस रास्ते पर थोड़ी दूरी आगे बढ़ने पर "म्हातारीच्या कामता" की दिशा में थोड़ा चलने पर ज़मीन के अंदर एक छोटे से सुरंगनुमा स्थान में सीढ़ियाँ उतरकर जखुबाई देवी का मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर में एक ओर से प्रवेश और दूसरी ओर से बाहर निकलने का रास्ता है।
पोखर धोंडी व पूर्व दरवाजे के अवशेष :
जखुबाई मंदिर की ओर जाते समय एक पट्टिका (बोर्ड) मिलती है। वहाँ से आगे जाने पर किले की टूटी हुई दीवार नज़र आती है। उस ओर चलते जाने पर लगभग 100 वर्ग फुट क्षेत्र में शिला पर तराशी हुई एक गुफानुमा कोठरी दिखती है, जिसे पोखर धोंडी कहा जाता है। इसे बड़े पत्थर को काटकर बनाया गया है।
वहीं पास में पूर्व दरवाजे की चौखट के अवशेष भी देखे जा सकते हैं। ब्रिटिश काल में यहाँ के गडकऱियों ने बगावत की थी। उस समय अंग्रेज़ों ने पूर्व दरवाजे की ओर से हमला कर तोपों से गोलाबारी की थी और इस ओर की प्राचीर तथा दरवाज़ा ध्वस्त कर दिया था। उसके अवशेष आज भी दिखाई देते हैं।
छोटा तालाब :
दुधी तालाब के सामने की ओर कुछ मंदिर और कुछ वाडों के अवशेष दिखाई देते हैं। वहाँ से आगे चलने पर थोड़ी दूरी पर एक छोटा तालाब भी मिलता है। इस तालाब के किनारे उस समय की छोटी-छोटी कब्रें दिखाई देती हैं। साथ ही छोटे-छोटे शिवलिंग भी नज़र आते हैं। इसके अलावा समाधियाँ भी मौजूद हैं। यह तालाब बहुत गहरा है।
भुदरगड किले के बारे में ऐतिहासिक घटनाएँ :
• भुदरगड किला शिलाहार राजा भोज ने बनवाया। उनके नाम पर इस किले को भुदरगड कहा गया।
• इसके बाद यह किला बहमनी सुल्तान के कब्जे में था।
• फिर यह किला आदिलशाही शासन में था।
• सन् 1667 में यह किला छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्वराज्य में मिला लिया।
• लेकिन थोड़े ही समय बाद यह किला मुगलों के कब्जे में चला गया।
• सन् 1672 में मराठों ने फिर से यह किला जीतकर स्वराज्य में मिला लिया। इस युद्ध में एक मुगल सरदार मारा गया। उस समय मिले मुगलों के निशान मराठों ने भैरवनाथ मंदिर को दान में दिए। वे आज भी वहाँ देखने को मिलते हैं। साथ ही शिवाजी महाराज ने इस किले की मरम्मत की और यहाँ एक मजबूत सैन्य ठिकाना बनाया।
छत्रपति शिवाजी महाराज का यहाँ अधिक निवास भले न रहा हो, लेकिन स्वराज्य का विजय मार्ग इस किले के पायथ्य में बहने वाली वेदगंगा नदी के किनारे से जाता था। दक्षिण से वापस महाराष्ट्र लौटते समय छत्रपति राजाराम महाराज यहाँ ठहरे थे।
• 18वीं शताब्दी में परशुराम भाऊ पटवर्धन ने सैनिकों के पहरेदारों को फुसलाकर यह किला अपने कब्जे में लिया। दस वर्ष तक यह उनके कब्जे में रहा।
• इसके बाद यह किला ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया।
• सन् 1844 में करवीर संस्थान के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार के अधीन किले पर यहाँ के गढ़करों ने बगावत की और उसे अपने कब्जे में लिया। इसमें भुदरगड और समानगड किलों के गढ़करी भी शामिल थे।
• 13 अक्टूबर 1844 को ब्रिटिश जनरल डोलोमोटी ने सैनिक कार्रवाई की। तोपों से गोला-बारूद चलाकर किले की बड़ी-बड़ी प्राचीरें ढहा दीं। साथ ही पूर्वी दरवाजे को नुकसान पहुँचाया। इसका उद्देश्य आगे कभी किले पर बगावत न हो सके, यही था। और बगावत को दबा दिया गया।
• सन् 1945 में इस किले के शिव मंदिर में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा की स्थापना भालजी पेंढारकर ने की।
• सन् 1947 में भारत स्वतंत्र होने के बाद यह किला स्वतंत्र भारत सरकार के अधीन आ गया।
• वर्तमान में यह किला महाराष्ट्र राज्य सरकार के पुरातत्व विभाग पुणे के अधीन है। किले और यहाँ की इमारतों की काफी मरम्मत की गई है।
ऐसा है भुदरगड किले का इतिहास और जानकारी। Bhudargad kille ke bare me jankari hindi me















