किला जीवधन
Fort Jivdhan information in Hindi
स्थान :
महाराष्ट्र राज्य में स्थित सह्याद्री पर्वत की ऊँची पर्वतरांगों में, पुणे जिले के जुन्नर तहसील से गुजरने वाले अति प्राचीन नाणे घाट मार्ग की सुरक्षा हेतु अनेक किले निर्माण किए गए थे। इनमें शिवनेरी, हडसर, चावंड, निमगिरी और जीवधन ये किले शामिल हैं। इनमें से जीवधन किला नाणेघाट के बिल्कुल पास स्थित है। यहाँ से नाणेघाट केवल 2.5 किलोमीटर दूरी पर है।
• जीवधन किले की ऊँचाई :
जीवधन किले की औसत ऊँचाई 3754 फीट है।
जीवधन किले तक पहुँचने के मार्ग :
• पुणे शहर से जीवधन किला 123 किलोमीटर दूरी पर है।
• मुंबई से जीवधन किला 160 किलोमीटर दूरी पर है।
• पुणे जिले के जुन्नर, चाकण, मंचर, नारायणगाँव से घाटघर नामक गाँव (जो किले के पायथ्यावर है) तक पहुँचा जा सकता है।
• घाटघर गाँव से पैदल ट्रेक द्वारा लगभग पौन घंटे में किले पर पहुँचा जा सकता है।
जीवधन किले पर देखने योग्य स्थान :
• जुन्नर शहर से घाट क्षेत्र की ओर जाते समय नाणेघाट के पास स्थित घाटघर गाँव पहुँचते ही वाहन पार्क कर पैदल किले की ओर चढ़ाई शुरू की जाती है।
• जंगल मार्ग और वन्य परिसर :
जंगल के घने बांबू (बांस) के जंगल से होते हुए किले के घनदाट जंगल में प्रवेश होता है।
इस क्षेत्र में अत्यंत विषैले सर्प पाए जाते हैं, इसलिए सावधानी आवश्यक है।
• सातवाहन कालीन दगड़ी अवशेष :
इस जंगल मार्ग पर चलते समय सातवाहन काल के अनेक दगड़ी अवशेष दिखाई देते हैं।
• कात्याळ की सीढ़ी मार्ग :
जंगल रास्ते से आगे बढ़ते ही उँचे कात्याळ पहाड़ के पायथ्य पर पहुँचा जाता है।
यहाँ पहाड़ के कठोर कात्याळ (चट्टान) में खोदी हुई सीढ़ियाँ दिखाई देती हैं।
यहीं से किले की चढ़ाई प्रारंभ होती है।
• कात्याळ खडक का संकरा दर्रा :
कात्याळ की सीढ़ियों से चढ़ते समय अत्यंत खड़ी सीढ़ियाँ मिलती हैं।
अब लोहे की रॉड लगाए जाने से चढ़ाई थोड़ी आसान हुई है।
आगे दो ऊँची कात्याळ चट्टानों के बीच से संकरी खतरनाक पगडंडी जाती है।
बरसात में यह मार्ग अत्यंत कठिन हो जाता है क्योंकि पानी प्रचंड मात्रा में बहता है और रास्ते पर पत्थर जमा हो जाते हैं।
• जीवधन किला महादरवाजा :
सीढ़ी मार्ग चढ़ने के बाद एक विशाल शिलाखंड में तराशा गया भव्य महादरवाजा दिखाई देता है।
दरवाजे पर सुंदर कोरीव काम है।
इसके बाजू में नालाकृति का कात्याळ बुरुज भी दिखाई देता है।
दरवाजे के अंदर पहरेदारों के लिए कोरीव देवडियाँ बनाई गई हैं।
• कात्याळ खोली :
महादरवाजे के भीतर दाहिनी ओर कात्याळ में खोदी गई एक सुंदर कक्ष (खोली) दिखाई देती है।
छीनी-हथौड़े से बनाया गया उत्कृष्ट शिल्पकला यहाँ देखी जा सकती है।
• पायरी मार्ग :
इस मार्ग से किले के ऊपर तथा महादरवाजे पर जाया जा सकता है।
बुरुज पर पहुँचकर नीचे का निसर्गरम्य दृश्य मनोहारी दिखाई देता है।
बुरुज, तटबंदी तथा जंग्या भी यहाँ से देखी जा सकती हैं।
• किले का अजस्त्र शिला क्षेत्र :
तटबंदी के पास की पगडंडी किले के शीर्ष भाग की ओर जाते हुए बड़े-बड़े शिलाखंडों के बीच से गुजरती है।
ऊपर पहुँचने पर नाणेघाट, आसपास की पर्वतरांगें, घने जंगल और खोल दऱियाँ दिखाई देती हैं।
• किले का शीर्ष भाग :
ऊपर का भाग चढ़-उतार वाला और थोड़ा पसरटा है।
बरसात में यहाँ घास की प्रचुरता होती है और कई वन कीट भी मिलते हैं।
बरसात में यहाँ की घास-फूलों की शोभा मनमोहक होती है, लेकिन रास्ते निसरडे (फिसलनभरे) हो जाते हैं।
• धान्य कोठार :
किले की सबसे अच्छी संरक्षित इमारत धान्य कोठार है।
हेमाडपंथी शैली की यह दगड़ी इमारत पाँच कोठारों से बनी है।
गुम्बदाकार छत, देवडियाँ, कोरीव दगड़, तथा भुयार जैसी संरचना इसे अन्य किलों से भिन्न बनाती है।
यह तत्कालीन लोगों की कष्टसाध्य जीवनशैली और वास्तुकला का उत्तम उदाहरण है।
• पाण्याची टाकी (जल टैंक) :
किले में 4–5 पाण्याचे टाके (जलाशय) हैं।
इनमें पानी मिलता है, लेकिन काफी गाद जमा है।
एक टंकी में पानी नापने के लिए छोटा खांब (स्तंभ) भी है।
बीच में एक देवड़ी भी खोदी गई है।
आज स्थिति खराब होने से यहाँ का पानी शेवाळयुक्त और उपयोग के लायक नहीं रहा।
• जिवाई देवी मंदिर :
किले के ऊपरी भाग में भग्न मंदिर के अवशेष हैं, जिसमें जिवाई देवी की मूर्ति है।
समय के साथ मंदिर खंडहर में बदल गया है।
• शिव मंदिर :
जिवाई मंदिर के पास ही एक छोटे से भग्न मंदिर के अवशेष हैं, जिसमें शिव पिंडी है।
इससे पता चलता है कि यह शिव मंदिर था।
• खोल दरी और वानरलिंग सुळका :
किले के एक छोर पर गहरी दरी और सामने ऊँचा वानरलिंग सुळका (350 फीट ऊँचा) दिखाई देता है।
ट्रेकर्स यहाँ रस्सी के सहारे चढ़ाई करते हैं।
यह स्थान गिर्यारोहकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
यहाँ से दरी और जंगल का भव्य दृश्य दिखता है।
परती का मार्ग :
नीचे उतरते समय भी चढ़ाई जितनी ही कठिनाई होती है।
लेकिन यह यात्रा धैर्य और संयम सिखाती है।
सीढ़ी मार्ग से नीचे उतरकर किले की यात्रा पूर्ण होती है।
जीवधन किले का इतिहास :
• इस किले को किसने बनाया, इस विषय में स्पष्ट ऐतिहासिक पुरावे नहीं मिलते।
• सातवाहन काल में इस क्षेत्र पर सातवाहन सत्ता थी।
• बाद में चालुक्य और राष्ट्रकूटों ने यहाँ शासन किया।
• 1170–1300 ईस्वी में यादवों का शासन था।
• 1488 में यह किला निजामशाही के ताबे में था।
• 1636 में शहाजी राजे भोसले ने मुर्तिजा निजाम को इसी किले की कैद से मुक्त किया।
• 1663 में किला मोगलों के ताबे में गया।
• बाद में यह अंग्रेजों के अधीन हुआ।
• 1818 में अंग्रेजों ने यहाँ धान्य कोठार जलाया और किले की तोड़फोड़ की।
• आज यह महाराष्ट्र राज्य का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भाग है।
अंत में :
ऐसे ऐतिहासिक किले को जीवन में एक बार अवश्य देखना चाहिए और महाराष्ट्रीय इतिहास व संस्कृति का अनुभव करना चाहिए।
अशी आहे जीवधन किल्याची माहिती — यही है जीवधन किले की जानकारी



















