⭐ राजमाची किला जानकारी हिंदी मे Rajmachi kille ke bare me jankari hindi me
• स्थान :
महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले में सह्याद्री की डोंगररांगों (पर्वतरांगों) में स्थित राजमाची किला है।
• ऊँचाई :
समुद्र तल से यह किला 833 मीटर ऊँचाई पर स्थित है।
• पर्वत रेंज :
सह्याद्री पर्वत की लोणावला–खंडाला उपरांग में राजमाची किला स्थित है।
• मुंबई–पुणे रोड के लोणावला स्थान से 15 किलोमीटर की दूरी पर राजमाची है।
• राजमाची किले पर जाने के यात्री मार्ग :
• पुणे–मुंबई मार्ग पर लोणावला से तुंगारली मार्ग होते हुए राजमाची किले के पायथ्य पर स्थित गाँव तक पहुँचा जाता है। वहाँ से किले तक की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है।
• रायगढ़ जिले के कर्जत से कोंदिवडे, फिर आगे खरवंडी तक गाड़ी मार्ग है। खरवंडी से आगे पैदल पगडंडी पर खड़ी चढ़ाई चढ़कर राजमाची किले तक पहुँचा जा सकता है |
• लोणावला या खंडाला से कुणेगांव, वहाँ से आगे फणसराई और फिर राजमाची के समीप स्थित उधेवाडी गाँव से आगे किले तक जाया जा सकता है। यह मार्ग कुछ कच्चा और कुछ पक्का है।
• राजमाची किले पर देखने लायक स्थान :
• पुणे–मुंबई महामार्ग के लोणावला जैसे ठंडे पर्यटन स्थल से दोपहिया या चारपहिया वाहन से कुछ कच्चे–पक्के मार्गों से होते हुए राजमाची गाँव पहुँचा जाता है। यह कोकण क्षेत्र का एक सुंदर गाँव है।
यहाँ दो किले एक–दूसरे के शेजारी (साथ–साथ) खड़े दिखाई देते हैं—
एक श्रीवर्धनगड और दूसरा मणरंजनगड।
• श्रीवर्धन गढ़ :
राजमाची से सामने एक बेलाग सुळका (ऊँची नुकीली चोटी) वाला किला दिखाई देता है। वही है श्रीवर्धनगड़।
राजमाची गाँव से इस किले की ओर एक पगडंडी जाती है। यह पगडंडी दगड़ी चिरेबंदी (पत्थरों से बनी) दिखाई देती है।
• इस मार्ग से जाते समय एक कात्याळ (पत्थर काटकर बनाई गई) गुफा मिलती है।
वहाँ अंदर की ओर पानी का टांका (टंकी) दिखाई देता है।
वहाँ से आगे यह पगडंडी भैरवनाथ मंदिर की ओर जाती है।
नीचे आपके द्वारा दी गई संपूर्ण जानकारी को ज्यों-का-त्यों रखते हुए, शब्द, अर्थ व शैली बिना बदले सेम टू सेम हिंदी भाषा में अनुवाद प्रस्तुत है:
• भैरवनाथ मंदिर :
आगे चलते जाने पर आपको एक मंदिर मिलता है। मंदिर के परिसर में सुंदर दीपमाला, अश्व वीरगळ तथा अन्य देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। साथ ही दो तोपें भी रखी हुई दिखाई देती हैं। भैरवनाथ यह देवता संकट नाश करने वाले वीर हिंदू देवता हैं। इस मंदिर के सामने की ओर का रास्ता श्रीवर्धन गढ़ पर जाता है। वहीं मंदिर के पिछली ओर से जाने वाला रास्ता आपको मणरंजन गढ़ की ओर ले जाता है।
• श्रीवर्धनगढ़
• दगड़ी पैरी मार्ग :
भैरवनाथ मंदिर के सामने वाले रास्ते से आगे चलते जाने पर आपको एक सुंदर पायरी (सीढ़ीनुमा) मार्ग मिलता है। इस मार्ग पर जैसे-जैसे ऊपर चढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे बगल की घाटी का सुंदर दर्शन होने लगता है।
कुछ दूरी चलकर आगे कात्याळी पायवाट से ऊपर चढ़ना होता है। यह अत्यंत खड़ी परंतु सरल चढ़ाई है। इसी मार्ग से हम गढ़ के बुर्ज और महादरवाजे तक पहुँचते हैं।
• बुर्ज व महादरवाजा :
आज भी सुस्थित में दिखाई देने वाला आगे का संरक्षक बुर्ज और उसकी अंदरूनी तरफ से गोमुख बांधणी का रास्ता मिलता है। इस मार्ग से आगे अंदर के भाग में आपको एक भग्न, आधा टूटा हुआ दरवाज़ा मिलता है। यही गोमुख बांधणी का दरवाज़ा है। यह भले ही ढह गया हो, पर इसके अवशेष इसकी ऐतिहासिक भव्यता दर्शाते हैं।
यहाँ पड़े अवशेषों में हेमाडपंथी निर्माण शैली देखने को मिलती है। नर और मादी दगड़ (male–female stone joints) दिखाई देते हैं। यही किले का महादरवाजा है। इसके भीतर पहरेदारों के लिए बनी देवड़ियाँ भी दिखाई देती हैं। साथ ही दीये रखने के लिए बनी छोटी देवड़ियाँ भी दिखती हैं। एक ओर ऊँची खाई और दूसरी ओर मजबूत तटबंदी वाला संकरा रास्ता — इस मार्ग में बरसात के दिनों में बहुत पानी भर जाता है।
• पानी की टंकी :
यहाँ से आगे एक छोटा पायरी मार्ग गढ़ के ऊपरी भाग में ले जाता है। आगे कात्याळ में खोदी गई पानी की टंकियाँ मिलती हैं, जिनका पानी मध्ययुग में गढ़ पर रहने वालों की जरूरतें पूरा करता था।
• खोदिव कात्याळ गुंफा :
गढ़ के ऊपरी भाग की ओर जाते हुए रास्ते में आपको पहाड़ का एक कात्याळ (काली चट्टान) वाला हिस्सा मिलता है। पूरी काली कात्याळी चट्टान में खोदी गई प्राचीन गुफाएँ दिखाई देती हैं। बाहर बनाए गए भाग के अवशेष भी वहाँ दिखते हैं।
यहाँ एक-दूसरे से सटी तीन बड़ी खोदी हुई कक्षाएँ दिखाई देती हैं। बाहरी चौकट और सुंदर छनी (फ्रेम) हथौड़े से तराशी गई हैं। हर कमरे में दीये रखने के लिए छोटी देवड़ियाँ बनाई गई हैं।
• टूटे वाड़े व इमारतों के अवशेष :
कात्याळ खोह देखकर आगे बढ़ते हुए रास्ते में बहुत से झाड़-झंखाड़ दिखाई देते हैं। आगे कुछ इमारतों, वाड़ों और सदर के अवशेष मिलते हैं। समय के प्रवाह में इन इमारतों की उपेक्षा हुई, इसलिए कई इमारतें नष्ट होने की कगार पर हैं।
यहाँ पायाभूत अवशेष (foundations) से तत्कालीन वास्तुकला की कल्पना लगती है। यहाँ राजा, सरदार, सैनिक और मावले (सैनिक दल) के लिए वाड़े व सदर बनाए गए थे, जहाँ युद्ध, राजनीति व अन्य विषयों पर चर्चा होती थी।
• शिवलिंग :
इस स्थान पर एक शिवलिंग भी दिखाई देता है।
• तटबंदी :
समय के साथ किले की तटबंदी कई जगह ढह गई है। बरसात में उस पर बहुत घास और झाड़ उग आता है। फिर भी काफी हिस्सा आज भी मजबूत रूप से खड़ा है और तत्कालीन वैभव की याद दिलाता है। जगह-जगह तटबंदी पर चढ़ने के लिए पायऱियाँ भी बनी हुई हैं।
• कोंकण दरवाजा :
गढ़ का कोंकण की ओर का दरवाज़ा समय के साथ काफी नष्ट हो चुका है। इसी मार्ग से पहले घोड़ियाँ (घोड़े) लाए जाते थे।
• ध्वजस्तंभ :
थोड़ा आगे एक टोक पर आपको ध्वजस्तंभ मिलता है। यही किले का सर्वोच्च भाग है, जहाँ भगवा ध्वज लहराता हुआ दिखाई देता है।
• दुहरी चिलखती बुर्ज :
गढ़ फेरी पूरी करते हुए अंत में हम दुहरी तटबंदी वाले चिलखती बुर्ज पर पहुँचते हैं। पूरा पत्थरों से बना यह मजबूत बुर्ज आज भी गढ़ की रक्षा करता हुआ दिखाई देता है।
इस बुर्ज में जगह-जगह जंग्या और फांज्या दिखाई देती हैं।
• जंग्या :
इनसे किले पर आक्रमण करने वाले व्यक्तियों पर बंदूक या तीर से निशाना साधा जाता था।
• फांज्या :
इनसे तोप से गोले दागे जाते थे।
• भुयारी मार्ग :
दुहरी तटबंदी के बीच नीचे उतरने के लिए बुर्ज के नीचे बहुत संकरा भुयारी मार्ग है, जिससे नीचे की तटबंदी तक जाया जा सकता है।
• चोरवाट :
किले पर हमला होने पर सुरक्षित बाहर निकलने के लिए एक गुप्त सुरंगनुमा चोरवाट भी यहाँ मिलती है।
• गुफा :
दुहरी चिलखती बुर्ज से नीचे उतरकर एक ओर चलने पर एक छोटी गुफा भी दिखाई देती है।
• बड़ा टांका :
दुहरी बुर्ज देखकर आगे थोड़ी टेढ़ी राह से दूसरी ओर जाते हुए एक बड़ा टांका मिलता है। इसमें निर्मल स्वच्छ पानी मिलता है। भीषण गर्मी में भी यहाँ पानी उपलब्ध रहता है।
• वहाँ से आगे चलते हुए हम सीधे कात्याळ खोह के पास पहुँचते हैं और आगे गढ़ उतरना शुरू होता है।
• श्रीवर्धनगढ़ से दिखाई देने वाले दुर्ग :
यह ऊँचाई पर स्थित होने से यहाँ से ठाणे व पुणे जिले के लोणावला–खंडाला क्षेत्र की सुंदर पर्वतरांगें दिखाई देती हैं।
लोहगढ़, तुंग, खंडाला, माथेरान, सोमगिरी, मोरगिरी, ढाक, कोरीगढ़, घनगड, कर्नाळा, इशाळगड़, प्रबळगढ़, नागफणी एवं कातळदरा झरना भी दिखाई देता है।
• दुहरी तटबंदी :
इस गढ़ को दुहरी तटबंदी है, जो सुरक्षा की दृष्टि से बनाई गई है।
• मणरंजन गढ़ :
राजमाची के सामने श्रीवर्धन गढ़ और उसके आगे मणरंजन गढ़ दिखाई देता है। पायथ्य के उदेवाड़ी गाँव से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
• बड़ा टांका :
उदेवाड़ी से मणरंजन गढ़ जाते समय रान-वाट से आगे कात्याळ में खोदा हुआ एक बड़ा टांका मिलता है, जिसके बीच में एक खंभा भी है।
• रानवाट और खड़ी पायरी :
आगे चढ़ते हुए जगह-जगह चट्टानों में खोदी पायऱियाँ और छोटी पगडंडी मिलती है। ऊपर चढ़ते हुए नीचे के प्रदेश का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।
श्रावण के महीने में यहाँ घास खूब बढ़ जाती है और रंग-बिरंगे घासफूलों से यह स्थान अत्यंत सुंदर लगता है।
• बुर्ज :
ऊपर पहुँचते ही एक बड़ा बुर्ज मिलता है। इससे आगे जाकर गोमुख मार्ग दिखाई देता है।
• महादरवाजा :
गोमुख मार्ग से अंदर बढ़ने पर किले का कमानाकृति दरवाज़ा मिलता है।
कात्याळ चौकट आज भी खड़ी है और उसके ऊपर सुंदर नक्काशी दिखती है।
अंदर पहरेदारों के लिए बनी देवड़ियाँ आज भी सुस्थित हैं।
• महादरवाजे से आगे पठारी क्षेत्र मिलता है — बरसात में यह जगह घास और फूलों से भर उठती है।
• छप्पर रहित वाड़ा :
आगे चढ़ने पर एक बड़ा वाड़ा दिखाई देता है। इसका निर्माण आज भी मजबूत है, केवल ऊपरी छप्पर नहीं दिखता।
अंदर सुंदर दगड़ी चौथरे, दरवाजे के ऊपर गणेश मूर्ति दिखाई देती है। इससे उसकी भव्यता का अंदाज़ होता है।
• पाण्याचे टांके / तालाब :
आगे एक बड़ी खुदाई की हुई टंकी मिलती है, जिसका पानी आज भी उदेवाड़ी गाँव की जरूरतें पूरी करता है।
भीषण गर्मी में भी यह सूखता नहीं।
• आगे चलते छोटे टांके भी दिखाई देते हैं, जो संभवतः तटबंदी या अन्य निर्माण कार्य में पत्थर निकालते समय बने होंगे।
• तटबंदी :
गढ़ की तटबंदी आज भी कई जगह सुस्थित है, हालांकि लंबे समय की उपेक्षा के कारण कई हिस्से ढह गए हैं। दो-चार बुर्ज अभी भी अच्छी स्थिति में दिखते हैं।
• मणरंजन गढ़ श्रीवर्धन से छोटा है, लेकिन इसकी तटबंदी से श्रीवर्धन गढ़ का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।
ढाक, कर्नाळा, इर्शाळगड, नागफणी तथा प्रबळगढ़ भी दिखाई देते हैं।
• गोधनेश्वर मंदिर :
दोनों बालेकिलों का दर्शन लेने के बाद राजमाची के पठार पर स्थित गोधनेश्वर मंदिर अवश्य देखना चाहिए।
मंदिर परिसर में विशाल तालाब है और उसके पश्चिम में हेमाडपंथी शैली में बना सुंदर मंदिर है।
काले पत्थर के अनोखे खंभे अत्यंत सुंदर हैं।
पास ही गोमुख और नीचे कुंड है, जिसमें बारहमासी पानी बहता है।
गर्भगृह में सुंदर महादेव पिंडी दिखाई देती है।
मंदिर के सभा-मंडप में गणेश और नंदी की मूर्तियाँ हैं।
• कोंढाणे लेणी :
गोधनेश्वर मंदिर का दर्शन कर कर्जत की ओर जाते समय कोंढाणे गाँव के पास पहाड़ की कोंख में कोंढाणे लेणी दिखाई देती हैं।
ये लेणी गाँव के आग्नेय में २ किमी दूरी पर हैं।
यहाँ सुंदर, नाज़ुक नक्काशी वाली गुफाएँ हैं।
ये बौद्ध धर्म के हीनयान पंथ के अनुयायियों द्वारा बनाई गई हैं।
यहाँ चैत्यगृह व भिक्षुओं के निवास-कक्ष भी हैं।
जालीदार कमान, स्त्री-पुरुष की नक्काशी अत्यंत आकर्षक है।
ये लेणी ईसा पूर्व २री सदी में निर्मित हैं।
• राजमाची किले के बारे में ऐतिहासिक जानकारी :
• राजमाची किला सातवाहन काल में बनाया गया किला है। इस क्षेत्र में पाई जाने वाली लेणियों और इसके निर्माण में थोड़ा-बहुत साम्य दिखाई देता है।
• उसके बाद मुस्लिम शासन में यह किला बहमनी राजवटी के अधीन आया।
• बहमनी राजवट समाप्त होने के बाद यह किला आदिलशाही के अधीन हो गया।
• ईस्वी सन 1657 में, कल्याण प्रांत जीतने के बाद छत्रपति शिवराय ने इस किले के व्यापारिक स्थान के महत्व को समझकर इसे स्वराज्य में शामिल किया।
• ईस्वी सन 1689 तक, छत्रपति संभाजी महाराज के समय तक यह किला स्वराज्य में था।
• ईस्वी सन 1704 में औरंगजेब बादशाह ने हमला करके इस किले को मुगलों के कब्जे में लिया।
• थोड़े ही समय बाद मराठी मावलों ने यह किला पुनः स्वराज्य में शामिल कर लिया।
• ईस्वी सन 1713 में छत्रपति शाहू महाराज ने यह किला कान्होजी आंग्रे के आधीन दिया।
• ईस्वी सन 1730 में प्रथम बाजीराव पेशवा ने इस किले को अपने नियंत्रण में लिया।
• आगे एक-दो संघर्षों को छोड़कर यह किला पेशवाई शासन में ही रहा।
• ईस्वी सन 1818 में हुए ब्रिटिश-मराठा युद्ध के बाद यह किला ब्रिटिशों के अधीन चला गया।
• 26 अप्रैल 1909 में ब्रिटिश सरकार ने इस किले को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया।
• वर्तमान में 1947 के बाद यह किला स्वतंत्र भारत सरकार के अधीन है।
• आसान चढ़ाई और सुंदर रचना के कारण अनेक पर्यटक राजमाची किला देखने आते रहते हैं।
यह है
राजमाची किला जानकारी हिंदी मे
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