गोंधेश्वर मंदिर – प्राचीन शिव मंदिर का वैभवशाली स्थल
Gondeshvar Mandir ki Jankari (Hindi mein)
गोंधेश्वर मंदिर महाराष्ट्र राज्य के नासिक ज़िले में, सिन्नर शहर के पास स्थित एक ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण शिव मंदिर है। यह मंदिर 11वीं–12वीं शताब्दी में यादव (Seuna-Yadava) वंश के शासनकाल में निर्मित माना जाता है तथा यह हेमाडपंती / भूमिज शैली की उत्कृष्ट वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है।
🛕 गोंधेश्वर मंदिर का विस्तृत परिसर
सिन्नर में स्थित प्राचीन गोंधेश्वर मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही विशाल और भव्य प्रांगण दिखाई देता है। मंदिर के उत्तर, दक्षिण और पूर्व दिशा में तीन प्रवेशद्वार हैं। मंदिर के बाहर मजबूत और विस्तृत परकोटा (तटबंदी) है तथा अंदर का आंगन अत्यंत प्रशस्त है।
इस आंगन के मध्य भाग में 125 फीट लंबा और 95 फीट चौड़ा चबूतरा है, जिस पर शिवपंचायतन गोंधेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर समूह की संरचना तत्कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करती है।
🚪 दक्षिण प्रवेशद्वार
मंदिर के दक्षिण दिशा में अत्यंत सुंदर और शिल्पकला से सुसज्जित प्रवेशद्वार है। प्रवेशद्वार के बाहरी भाग में स्तंभों से जुड़ी बैठक व्यवस्था की गई है।
प्रवेशद्वार की चौखट के दोनों ओर सूरसुंदरीयों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं तथा ऊपरी भाग के ललाटबिंब पर गणेश जी की मूर्ति अंकित है। आद्य वंदनीय गणेश का नमन कर ही मंदिर में प्रवेश हो, इस भावना से यह रचना की गई प्रतीत होती है।
चौखट के किनारों पर अत्यंत सुंदर नक्काशी दिखाई देती है। बाहरी ओर स्तंभ हैं, जिन पर गुंबदाकार छत बनी हुई है। इस छत पर बारीक नक्काशी और आकर्षक कीर्तिमुख उकेरे गए हैं।
«कीर्तिमुख का अर्थ है मंदिर परिसर में आने वाले भक्तों के पापों का दहन करने वाली, चिंता, तनाव और क्रोध को नष्ट कर प्रसन्नता प्रदान करने वाली तथा नकारात्मक शक्तियों को सकारात्मक रूप में परिवर्तित करने वाली देव–दानव संमिश्र कलाकृति।»
🌿 विस्तृत मंदिर प्रांगण
प्रवेशद्वार से भीतर आते ही सुंदर, स्वच्छ और विस्तृत आंगन दिखाई देता है। पूरे परिसर में पत्थरों की फरसबंदी की गई है और दोनों ओर शोभायमान वृक्ष लगाए गए हैं। इसी मार्ग से आगे बढ़ने पर पूरे मंदिर समूह का भव्य दर्शन होता है।
🌅 स्वर्गमंडप – पूर्वाभिमुख प्रवेशद्वार
मंदिर का पूर्व दिशा का प्रवेशद्वार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। पूर्व दिशा अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली, उगते सूर्य की दिशा मानी जाती है। यहाँ सुंदर स्वर्गमंडप की रचना देखने को मिलती है।
स्तंभों पर आधारित यह वास्तु रचना अत्यंत मनोहारी है। कुशों और खोबणियों पर सुंदर नक्काशी कर संधि-अडक (जॉइंट) पद्धति से दीवारें निर्मित की गई हैं। ऊपर की ओर सूर्यप्रकाश और चंद्रप्रकाश के लिए वृत्ताकार खुला स्थान छोड़ा गया है।
इस संरचना के कारण स्थापत्य कला का सौंदर्य और अधिक निखर कर सामने आता है। प्रवेश कमान पर पत्थरों में उकेरी गई बारीक नक्काशी वाली नर्तकियों, गायकों और वादकों की मूर्तियाँ दर्शकों का मन मोह लेती हैं।
🐘 गणेश मंदिर
मंदिर परिसर के नैऋत्य (South-West) दिशा में गणेश मंदिर स्थित है।
यह मंदिर अन्य मंदिरों का लघुरूप प्रतीत होता है। बाहरी भाग में स्तंभों सहित गर्भगृह की रचना है, जिस पर सुंदर नक्काशीदार पट्टियाँ उकेरी गई हैं।
सीढ़ियाँ चढ़ने पर बाह्य मंडप मिलता है। यहाँ अनेक कीर्तिमुख, पुष्पलताओं की नक्काशी तथा ऊपर की ओर सुंदर पुष्प अलंकरण से सुसज्जित गुंबद दिखाई देता है।
गर्भगृह की चौखट पर द्वारपाल और द्वारपालिका की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।
साथ ही शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए भगवान विष्णु की शिल्पांकित आकृति भी दृष्टिगोचर होती है। भीतर के गर्भगृह में श्री गणेश जी की मूर्ति विराजमान है।
नंदीमंडप :
मुख्य मंदिर के सामने चार स्तंभों पर निर्मित नंदीमंडप स्थित है। इन स्तंभों पर नर्तकियों, गायकों तथा वाद्य वादन करने वाले कलाकारों की अत्यंत सजीव एवं कलात्मक मूर्तियाँ चारों दिशाओं में उकेरी गई हैं।
इन मूर्तियों पर सुंदर आभूषण, करधनी तथा पैरों में पहने गए तोड़ों का सूक्ष्म और आकर्षक शिल्पकार्य दिखाई देता है। नंदी के गले में घंटियों की माला है तथा पीठ पर स्थित कूबड़ की गूंथन अत्यंत मनोहर है। यहाँ भी सुंदर कीर्तिमुख शिल्प देखने को मिलते हैं।
नंदीमंडप पर घुमटाकार हेमाडपंथी शैली का कलश है। यह संपूर्ण निर्माण शुष्क-संधि (ड्राय जॉइंट) तकनीक से, छेनी और हथौड़े की सहायता से किया गया है। नंदीमंडप के बाहर एक विशाल शिवलिंग स्थित है तथा उसके समीप कुछ भग्न मूर्तियों के अवशेष भी देखे जा सकते हैं।
शिवमंदिर :
नंदीमंडप के सामने मध्यभाग में भव्य शिवमंदिर स्थित है। मंदिर के प्रवेशद्वार पर सुंदर नक्काशीदार स्तंभ हैं तथा बाहरी भाग में जगह-जगह कीर्तिमुखों की आकर्षक शिल्पाकृति दिखाई देती है। प्रवेशद्वार के चारों ओर व्याल शिल्प उकेरे गए हैं और उनके चरणों के नीचे दबे हुए हाथी शक्ति और सामर्थ्य के प्रतीक हैं।
द्वार पर सूक्ष्म नक्काशी वाले द्वारपाल और द्वारपालिका हैं। भैरव तथा चक्रधर विष्णु की मूर्तियाँ प्रवेशद्वार की शोभा बढ़ाती हैं। इन मूर्तियों पर अंकित वस्त्र एवं आभूषण तत्कालीन वैभव और संस्कृति को दर्शाते हैं। प्रवेशद्वार के ललाटबिंब पर गणेश की मूर्ति उकेरी गई है। मंदिर के भीतर विशाल सभामंडप है, जिसकी छत पर सुंदर पुष्पाकृतियाँ कोरित हैं।
सभामंडप :
सभामंडप में चार स्तंभ हैं और प्रत्येक स्तंभ पर विशिष्ट शिल्पकला देखने को मिलती है। पहले स्तंभ पर सुरसुंदरी, श्रीकृष्ण, वामन तथा नरसिंह अवतार की मूर्तियाँ हैं। दूसरे स्तंभ पर गजलक्ष्मी और गणपति की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। तीसरे स्तंभ पर पिंडदान विधि का शिल्पांकन किया गया है, जबकि चौथे स्तंभ पर सुरसुंदरी तथा अन्य धार्मिक शिल्प अंकित हैं।
सभामंडप के चारों ओर गंधर्व, महाभारत और रामायणकालीन दृश्य, बाली–सुग्रीव युद्ध प्रसंग, वाद्य बजाते और नृत्य करते कलाकार तथा कीर्तिमुखों की सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है। सभामंडप की भूमि पर कछुए (कूर्म) का शिल्प उकेरा गया है।
अंतराल :
सभामंडप के आगे अंतराल भाग स्थित है। इसके पार्श्व की दीवारों में देवकोष्ठक बनाए गए हैं, जिन्हें अत्यंत सूक्ष्म और आकर्षक नक्काशी से सजाया गया है।
गर्भगृह :
मंदिर का सर्वाधिक पवित्र और आंतरिक भाग गर्भगृह है। गर्भगृह की चौखट पर सुंदर नक्काशीदार पट्टिकाएँ उकेरी गई हैं। निचले भाग में द्वारपाल और द्वारपालिका हैं तथा विष्णु की मूर्ति गदा और चक्र धारण किए हुए दर्शाई गई है। द्वारपालिकाएँ चँवर लेकर सेवा करती हुई दिखाई देती हैं।
गर्भगृह में शिवपिंड स्थापित है, जिस पर निरंतर जलाभिषेक होता है। गर्भगृह के कलश पर सुंदर कमलपुष्प नक्काशी की गई है। बाहरी नंदीमंडप से आने वाली सूर्य किरणें सीधे गर्भगृह में प्रवेश करती हैं। शिवपिंड की छाया दीवार पर पड़ने से संपूर्ण मंदिर सूर्यप्रकाश से आलोकित हो उठता है।
बाह्य रचना :
मंदिर के बाहरी भाग के निचले हिस्से में आयताकार और चौकोर कड़ी संरचना दिखाई देती है। इस भाग पर हाथियों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं, जो मंदिर को उठाए हुए प्रतीत होती हैं और वैभव का प्रतीक मानी जाती हैं। ऊपरी भाग में सुरसुंदरी, नृत्यसुंदरी तथा मध्य में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ कोरित हैं।
मंदिर का निर्माण हेमाडपंथी शैली में किया गया है। निचले पत्थरों में खाच-संधि और द्रोणी पद्धति का प्रयोग किया गया है, जबकि ऊपरी पत्थरों में एक ओर खूंटी और दूसरी ओर खाच बनाकर सुदृढ़ निर्माण किया गया है। सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश-छाया का विचार कर की गई प्रकाश योजना स्थापत्यकला की एक अद्भुत कृति है। मंदिर पर भूमिज शैली का शिखर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
मंदिर परिसर की स्थापत्य एवं शिल्प विशेषताएँ
🕉️ मकरमुख प्रणाली (प्रणाल / जल-निकासी व्यवस्था)
शिवलिंग पर अर्पित किया गया जल बाहर प्रवाहित हो सके, इसके लिए बाहरी भाग में मकरमुख प्रणाली उकेरी गई है। मकरमुख को गंगा नदी का वाहन माना जाता है।
इस विशेषता के आधार पर विद्वानों का मत है कि यह मंदिर ईस्वी सन 1000 से पूर्व का हो सकता है।
क्योंकि गोमुख स्थापित करने की परंपरा 12वीं शताब्दी के बाद निर्मित मंदिरों में अधिक देखने को मिलती है। मकर प्रणाली की यह निर्माण शैली उत्तर भारत के साथ-साथ कंबोडिया के मंदिरों में भी दिखाई देती है। मंदिर पर गिरने वाले वर्षा जल एवं अभिषेक के जल को उचित रूप से बाहर ले जाने हेतु इस प्रकार की यांत्रिक व्यवस्था की जाती है। यहाँ जल प्रवाह के स्थान पर मकरमुख शिल्प है, जिस पर चतुर्भुज देवी की प्रतिमा उकेरी गई है।
🌺 पार्वती / दुर्गा मंदिर
मंदिर के वायव्य (North-West) दिशा में पार्वती / दुर्गा मंदिर स्थित है।
प्रवेशद्वार पर चार स्तंभ हैं, जिन पर सुंदर नक्काशी तथा अनेक कीर्तिमुख उकेरे गए हैं। बाहरी भाग में बैठने की व्यवस्था है। गर्भगृह की चौखट पर विभिन्न प्रकार की अलंकरण पट्टिकाएँ दिखाई देती हैं। प्रवेशद्वार के दोनों ओर द्वारपाल और द्वारपालिकाएँ हैं। चँवर धारण किए हुए द्वारपालिकाएँ तथा पानी की चमड़े की थैली लेकर जल छिड़काव करता हुआ प्रतिहारी भी उकेरा गया है। गर्भगृह के ललाटबिंब पर गणेश की प्रतिमा है। उंबरठे के नीचे दो कीर्तिमुख उकेरे गए हैं। निचले भाग में रंगोली बनाने हेतु पत्थर की विशेष व्यवस्था की गई है।
आंतरिक गर्भगृह में काले पाषाण में उकेरी गई देवी महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है। देवी के एक हाथ में तलवार, दूसरे हाथ में त्रिशूल, बाएँ हाथ में ढाल है तथा उनके चरणों के नीचे महिषासुर दर्शाया गया है। शिखर के अंतराल भाग में कमल पुष्प की सुंदर नक्काशी की गई है। मंदिर के बाहरी भाग में नीचे चौथरे, उन पर गजशिल्प, उनके ऊपर नक्काशीदार चौकटी और उनमें गणेश की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। अनेक स्थानों पर सुरसुंदरी एवं नृत्य करती स्त्रियों की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। जगह-जगह देवकोष्ठक बनाए गए हैं। एक के ऊपर एक पत्थरों को कूस और खांचे में फँसाकर, शुष्क संधि पद्धति से दीवारें निर्मित की गई हैं। ऊपर अनेक शिखरों की रचना है और ऊँचे गोपुर इस मंदिर की विशेष पहचान हैं।
☀️ सूर्य मंदिर
अन्य मंदिरों की भाँति ईशान्य (North-East) दिशा में सूर्य मंदिर स्थित है।
इस मंदिर में भी बाह्य प्रवेश, शिखर तथा गर्भगृह की संपूर्ण रचना देखने को मिलती है।
बाहरी भाग में नक्काशीदार द्वारचौखट, सुरसुंदरी तथा नृत्य करती स्त्रियों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।
यहाँ अनेक कीर्तिमुख भी दृष्टिगोचर होते हैं। गर्भगृह में सूर्यदेव की प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
🕉️ विष्णु मंदिर
आग्नेय (South-East) दिशा में विष्णु मंदिर स्थित है। बाह्य प्रवेशद्वार पर सुंदर नक्काशीदार स्तंभ हैं। गर्भगृह में भी उत्कृष्ट शिल्पकला देखने को मिलती है। गर्भगृह में हाथों में चक्र और गदा धारण किए हुए श्री विष्णु भगवान विराजमान हैं। गोंधेश्वर महादेव मंदिर की ऐतिहासिक एवं स्थापत्य जानकारी
🔹 पुष्करणी
- मंदिर के पूर्व दिशा में एक विशाल जलाशय स्थित है, जिसे पुष्करणी कहा जाता है। इस पुष्करणी के पत्थरों का उपयोग गोंधेश्वर मंदिर के निर्माण में किया गया है। इस कारण मंदिर और पुष्करणी का आपसी संबंध स्थापत्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
कीर्तिमुख एवं व्याल शिल्प – संक्षिप्त जानकारी
🔹 कीर्तिमुख
कीर्तिमुख केवल मुख वाला एक भयावह शिल्प होता है। यह शिल्प प्रायः मंदिरों के प्रवेशद्वार, ललाटबिंब या कलश के नीचे उकेरा हुआ पाया जाता है।
इसका अर्थ “यश अथवा कीर्ति का मुख” होता है।
कीर्तिमुख शिल्प को दुष्ट शक्तियों को दूर रखने वाला, मंदिर की रक्षा करने वाला तथा शुभता का प्रतीक माना जाता है। हिंदू मंदिर स्थापत्य में यह एक महत्वपूर्ण रक्षणात्मक शिल्प है।
🔹 व्याल शिल्प
व्याल एक काल्पनिक प्राणी होता है, जिसे सिंह, हाथी, घोड़े अथवा अन्य पशुओं के मिश्रित रूप में दर्शाया जाता है।
व्याल शिल्प सामान्यतः मंदिरों की बाहरी दीवारों, स्तंभों अथवा चौखटों पर उकेरे जाते हैं।
ये शिल्प शक्ति, पराक्रम, संरक्षण तथा भयप्रदता का प्रतीक होते हैं।
शत्रुओं एवं नकारात्मक शक्तियों को रोकने के प्रतीक स्वरूप व्याल शिल्पों का उपयोग किया जाता है।
दोनों शिल्प भारतीय मंदिर स्थापत्य की सौंदर्य भावना, प्रतीकात्मकता तथा धार्मिक आस्था को दर्शाने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं।
• यात्रा (Fort Trekking) के दौरान कई जरूरी सामान की आवश्यकता होती है। आप नीचे दी गई वेबसाइट के माध्यम से इन्हें देख सकते हैं और खरीद सकते हैं।
🔹 सिन्नर नगरी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- सिन्नर नगर के संबंध में एक प्रचलित किंवदंती है कि यह वही नगरी है जिसे बाणासुर राक्षस ने उलट-पलट कर नष्ट किया था।
- इस नगर को इतिहास में विभिन्न नामों से जाना गया है:
सिंधी नगरी, सेनुनापुर, श्रीनगर तथा बाद में सिन्नर
- इतिहास में यह उल्लेख भी मिलता है कि यादव राजा सेऊण चंद्र द्वारा इस नगरी की स्थापना की गई थी।
🔹 यादवकालीन राजनीतिक घटनाक्रम
- ईस्वी सन 1175 में चालुक्यों के सामंत सरदार के रूप में यादव शक्तिशाली हुए।
- यादव राजा भिल्लम द्वितीय ने देवगिरी से नासिक तक अपने राज्य का विस्तार किया।
- 12वीं शताब्दी में कुछ समय के लिए सिन्नर यादवों की राजधानी रहा।
- यादव राजा गोविंदचंद्र के शासनकाल में गोंधेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण किया गया।
- इस नगर पर सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट और यादव जैसी विभिन्न राजवंशों का आधिपत्य रहा।
- आगे चलकर पेशवाकाल तक सिन्नर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सत्ता का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा
🏛️ राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक
भारत सरकार ने इस मंदिर को 4 मार्च 1909 को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया है। यह स्मारक स्थापत्य और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान माना जाता है।
🔹 मंदिर का प्रकार एवं देवता
- गोंधेश्वर महादेव मंदिर एक शिव पंचायतन मंदिर है।
- मुख्य शिव मंदिर के साथ यहाँ निम्न देवताओं के मंदिर स्थित हैं:
- गणेश, शिव, पार्वती, विष्णु, सूर्य
🔹 स्थापत्य एवं निर्माण पद्धति
- मंदिर के निर्माण के लिए समीप स्थित पुष्करणी से प्राप्त पत्थरों का उपयोग किया गया है।
- निर्माण में शुष्क संधि पद्धति (Dry Masonry) का प्रयोग किया गया है।
- पत्थरों को नर–मादा पद्धति से एक-दूसरे में मजबूती से फँसाकर संरचना खड़ी की गई है।
- मंदिर की शिल्पकला में कीर्तिमुख एवं व्याल शिल्पों की समृद्ध सज्जा देखने को मिलती है।
- प्रयुक्त पत्थर गुलाबी वेसिक्युलर शैल (चट्टान) प्रकार का है, जिसके कारण समय के साथ अनेक शिल्पों में क्षरण दिखाई देता है।
- इसके बावजूद शिल्परचना अत्यंत उत्कृष्ट है और तत्कालीन वैभवशाली परिधान, केशविन्यास तथा आभूषणों की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है
🔹 धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
- मौनिनाथ द्वारा लिखित चरित्र ग्रंथ में इस स्थान का उल्लेख ‘ब्रह्मपुरी’ के रूप में मिलता है।
- महानुभाव पंथ के संस्थापक श्री चक्रधर स्वामी के यहाँ आगमन के कारण इस स्थान को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त हुआ है।
- इसी कारण प्रत्येक वर्ष महानुभाव पंथ के अनेक अनुयायी यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।
🔹 छाया–प्रकाश योजना (Solar Alignment)
- इस मंदिर में छाया–प्रकाश की अत्यंत सुंदर और वैज्ञानिक योजना देखने को मिलती है।
- सूर्योदय के समय सूर्य की किरणें सीधे गर्भगृह तक पहुँचती हैं।
- सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन के अनुसार समय में थोड़ा अंतर दिखाई देता है।
- इससे स्पष्ट होता है कि मंदिर निर्माण के समय दिशाज्ञान और स्थापत्य कला का अत्यंत कुशल उपयोग किया गया था।
🔱 धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व (Religious Significance)
गोंधेश्वर मंदिर महादेव के भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है:
- महाशिवरात्रि और सावन माह में यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं।
- यह मंदिर शिवभक्तों द्वारा एक शक्तिपीठ के रूप में आदरपूर्वक देखा जाता है।
- विद्यार्थियों द्वारा यहाँ सूर्यपूजन, योग तथा सूर्यनमस्कार किए जाते हैं, जिससे क्रीड़ा और स्वास्थ्य से जुड़े उपक्रम भी संपन्न होते हैं।
📍 स्थान एवं पहुँच मार्ग (Location)
- 📌 स्थान: सिन्नर, जिला नासिक, महाराष्ट्र — नासिक शहर से लगभग 25–30 किमी की दूरी पर।
- 📍 पुणे और मुंबई से भी यह स्थल सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
- ✈️ निकटतम रेलवे स्टेशन: नासिक रोड
- 🚌 बस / टैक्सी सुविधा: सिन्नर स्टेशन से मंदिर तक सहज रूप से उपलब्ध।
📸 दर्शन एवं भ्रमण अनुभव (Visitor Experience)
गोंधेश्वर मंदिर अपेक्षाकृत कम भीड़भाड़ वाला स्थान है, इसलिए इतिहासप्रेमियों और शांति की खोज में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक आदर्श स्थल है।
मंदिर प्रातः से सायंकाल तक खुला रहता है और प्रवेश सामान्यतः निःशुल्क है।
भ्रमण के दौरान अवश्य देखें:
✔️ उत्कृष्ट पत्थर की नक्काशी
✔️ शिवलिंग एवं नंदी मंडप का दर्शन
✔️ परिसर का शांत वातावरण
✔️ समीप स्थित गोंधेश्वर तालाब एवं प्राकृतिक सौंदर्य
📌 निष्कर्ष
🔥 गोंधेश्वर मंदिर महाराष्ट्र का एक प्राचीन, स्थापत्य की दृष्टि से समृद्ध तथा धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण शिव मंदिर है। यह यादवकालीन स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है और इतिहास, कला तथा अध्यात्म का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है। 🔱
ऐसा है —
गोंधेश्वर मंदिर : प्राचीन शिव मंदिर का वैभवशाली स्थल Gondeshvar Mandir ki Jankari (Hindi mein)



























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