चामार लेणी / म्हसरूळ लेणी – जानकारी (हिंदी में)
Chamar leni ke bare me jankari hindi me
स्थान :
महाराष्ट्र राज्य के नासिक शहर से थोड़ी दूरी पर स्थित म्हसरूळ गांव के पास त्रिकोणाकार पहाड़ी पर चामार लेणी स्थित हैं।
(गलत अर्थ चांभार लेणी कहा जाता है, परंतु सही नाम चामार लेणी ही है।)
ऊँचाई :
पहाड़ी के पायथ्य से लगभग 400 फीट ऊँचाई पर चामार लेणी हैं।
लेणी देखने के लिए यात्री मार्ग :
• नासिक महाराष्ट्र राज्य का एक प्रमुख औद्योगिक शहर है। यह पुणे से 210 किमी तथा मुंबई से 150 किमी दूरी पर है।
यहाँ से गुजरात रोड – म्हसरूळ – तवली फाटा – गजपंथ सिद्धक्षेत्र – रोड मार्ग से त्रिकोणी पहाड़ी के पायथ्य तक पहुँचकर आगे पैरों से चामार लेणी पहुँचा जा सकता है।
• गुजरात की ओर से आने पर – सूरत – नवसारी – वलसाड – पारडी – नानापोंढा – कुंभाले – पींट – तवली फाटा – यहाँ से गजपंथ सिद्धक्षेत्र के रास्ते चामार लेणी देखी जा सकती है।
चामार लेणी परिसर में देखने योग्य स्थान :
नासिक जिले से गुजरात की ओर जाते समय नासिक–म्हसरूळ मार्ग से तवली फाटा आकर वहाँ से गजपंथ / सिद्धक्षेत्र नामक स्थान 8 किमी आगे है।
वहाँ से आगे पहाड़ी के पायथ्य पर वाहन पार्क कर पायरी मार्ग अथवा पगडंडी से चामार लेणी पहुँचा जा सकता है।
पायरी मार्ग :
गजपंथ / सिद्धक्षेत्र से आगे लेणी समूह वाले त्रिकोणाकार पहाड़ के नीचे पार्किंग के बाद थोड़ी दूरी पैदल चलने पर पायरी मार्ग मिलता है।
यह एक सुंदर दगड़ी बांधव मार्ग है। कुल 437 पायड़ियाँ हैं। चढ़ाई के दौरान रेलिंग लगी है। ऊपर जाते-जाते पायड़ियाँ खड़ी होती जाती हैं।
जो लोग नियमित पर्वतारोहण करते हैं, उन्हें यह चढ़ाई आसान लगेगी, पर पहली बार आने वालों को थकान हो सकती हैl
इंद्रदेव व अंबिका मूर्ति :
लेणी परिसर में प्रवेश करते ही इंद्रदेव व देवी अंबिका की सुंदर मूर्तियाँ दिखाई देती हैं।
नवीन संरचना मंदिर :
लेणी समूह के पास एक गेट लगता है। अंदर प्रवेश करने पर एक छोटा-सा बस्ती मंदिर है। यह नया निर्मित है।
यहाँ कई देवडियाँ हैं जिनमें जैन धर्म के तीर्थंकरों की मनमोहक शिल्पाकृतियाँ दिखाई देती हैं।
ध्वजस्तंभ :
लेणी समूह के बाहर एक सुंदर नक्काशीदार ध्वजस्तंभ है, जिस पर जैन धर्म का प्रतीक ध्वज फहराने का कार्य जैन मुनी करते हैं।
पहली गुफा :
पहली गुफा में जैन मुनि पार्श्वनाथ भगवान की तीन बैठक मूर्तियाँ हैं।
मूर्तियों के चेहरे शांत, शीतल तथा विरक्त भाव दर्शाते हैं।
गुफा के बाहर चंद्रप्रभु भगवान, नेमिनाथ भगवान और आदिनाथ की ध्यानस्थ मूर्तियाँ हैं।
गर्भगृह श्वेत रंग से रंगा है तथा काले रंग की शिल्पाकृतियाँ उभारदार हैं।
बगल में यक्ष-यक्षिणी की मूर्तियाँ हैं।
इस गुफा का विस्तार कर पास में बस्ती मंदिर बनाया गया है जहाँ जैन धर्मीय अभिषेक, पूजा तथा ग्रंथ पाठ करते हैं और तपस्या भी होती है।
दूसरी गुफा :
यह गुफा विस्तृत है।
मुख्य गर्भगृह में शांतिनाथ भगवान, कुंथुनाथ भगवान और अरहनाथ भगवान की सुंदर खड़ी मूर्तियाँ हैं।
पीछे की ओर सुंदर महिरप दिखाई देती है।
मानसिक तनाव दूर करने के लिए यह स्थान अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
तीसरी गुफा :
यहाँ पार्श्वनाथ भगवान की लगभग 11 फीट ऊँची पद्मासन में बैठी ध्यानमग्न मूर्ति है।
मूर्ति शांत, त्याग, सेवा, संतोष और तृप्ति दर्शाती है।
यहाँ आने वाले हर व्यक्ति को मन की शांति प्राप्त होती है।
प्रदक्षिणा :
मंदिर लेणी परिसर से बाहर निकलकर पूरी पहाड़ी की प्रदक्षिणा की जा सकती है।
तलाब व पहाड़ी शिखर :
लेणी समूह से थोड़ी दूरी पर पहाड़ी शिखर जाने का मार्ग है। ऊपर दो छोटे तलाब हैं।
साथ ही सुंदर नासिक शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
पानी की टंकी :
लेणी समूह से कुछ दूरी पर चट्टानों में खोदी गई दो पानी की टंकियाँ हैं। समय के साथ ये क्षतिग्रस्त होती जा रही हैं।
गजपंथ सिद्धक्षेत्र मंदिर व संग्रहालय :
लेणी देखकर नीचे आते समय पहाड़ी के पायथ्य पर जैन मंदिर मिलता है।
यहाँ जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की दुर्लभ मूर्तियाँ हैं।
साथ ही जैन धर्म का धार्मिक संग्रहालय भी है – जिसमें प्राचीन मूर्तियाँ, कलाकृतियाँ, भुर्जपत्र, हस्तलिखित पोथियाँ, ताम्रपत्र, शिलालेख, कांस्य मूर्तियाँ आदि रखी हैं।
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चामार लेणी समूह से संबंधित ऐतिहासिक जानकारी :
• जैन धर्म की स्थापना से ही इस क्षेत्र में अनेक जैन मुनियों का निवास था।
• ईस्वी सन् 11वीं शताब्दी में दक्षिण भारतीय जैन राजा गजपती सिद्धक्षेत्र चामराज ने मुनियों की तपश्चर्या हेतु यह लेणी समूह खोदवाया।
• यहाँ जैन आचार्य कुंदकुंद देव का निवास था। उनके ग्रंथों से इस तीर्थ की जानकारी मिलती है।
• रामचंद्र व बलराम से भी पूर्व हुए सात बलभद्र यहीं से मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं।
• अनेक योगीराजों को भी यहाँ से मुक्ति प्राप्त हुई।
• बलभद्र काल में गजकुमार मुनिराज भी यहीं से मोक्ष गए। इसलिए इसे गजपथ कहा जाता है।
• राष्ट्रकूट काल में राजा विरप्पदेव ने जैन दीक्षा लेकर आचार्य वीरसेन नाम से कार्य किया।
• आचार्य वीरसेन ने यहाँ शिक्षाकेंद्र स्थापित किया।
• जैन धर्म के नौ बलभद्रों में से सात बलभद्र अलग-अलग तीर्थंकर काल में यहीं से मोक्ष गए – ऐसी मान्यता है।
• आज भी यहाँ अनेक योगी और जैन मुनि साधना करने आते हैं।
यही है चामार लेणी समूह की जानकारी – हिंदी में chamar leni ke bare me jankari hindi me










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