crossorigin='anonymous' src='https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1553308877182847'/> महाराष्ट्र किल्ले व स्थळे यांची माहिती Forts and places in maharashtra: मदनगड किला जाणकारी हिंदी भाषा मे (Madangad Fort Information in Hindi)

गुरुवार, २६ फेब्रुवारी, २०२६

मदनगड किला जाणकारी हिंदी भाषा मे (Madangad Fort Information in Hindi)

 मदनगड किला जाणकारी हिंदी भाषा मे 
(Madangad Fort Information in Hindi)

मदनगड किला जाणकारी हिंदी भाषा मे   (Madangad Fort Information in Hindi)


📍 स्थान :

महाराष्ट्र राज्य के नाशिक ज़िले से होकर जाने वाली उत्तर सह्याद्री पर्वत श्रृंखला के पश्चिमी भाग में स्थित कळसूबाई शिखर की पर्वत श्रेणी में अलंग, मदनगड और कुलंग ये किले देखने को मिलते हैं।

इनमें से मदनगड एक प्रमुख दुर्ग है।

🏔️ ऊँचाई :

इस किले की ऊँचाई समुद्र तल से

4900 फीट / 1493.52 मीटर है।

Fort 

🚶‍♂️ किले तक पहुँचने के मार्ग (परिवहन मार्ग) :

मदनगड किले के पास पायथ्य में आंबेवाड़ी गाँव स्थित है।

आंबेवाड़ी गाँव नाशिक शहर से 55 किलोमीटर की दूरी पर है।

नाशिक – इगतपुरी – आंबेवाड़ी मार्ग से यहाँ पहुँचा जा सकता है, इसके बाद पैदल ट्रेक करके किले पर जाया जाता है।

आंबेवाड़ी, पुणे से 182 किलोमीटर दूर है।

मुंबई से 140 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

गुजरात राज्य के सूरत शहर से इसकी दूरी लगभग 300 किलोमीटर है।

मुंबई, पुणे, नाशिक और सूरत भारत के प्रमुख शहर हैं, जो सड़क, रेल एवं हवाई मार्गों द्वारा राज्य के अन्य भागों तथा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं।

आंबेवाड़ी तक पहुँचने का सबसे उत्तम मार्ग सड़क मार्ग है।

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🏞️ मदनगड किले पर देखने योग्य स्थान :

नाशिक मार्ग से इगतपुरी होकर आंबेवाड़ी के रास्ते किले के पायथ्य क्षेत्र तक पहुँचा जा सकता है।

यहाँ से गूगल मैप की सहायता से जंगल के रास्ते से होते हुए किले के क्षेत्र में प्रवेश किया जाता है।

🌿 कठिन जंगली पैदल ट्रेक :

किले के आसपास का क्षेत्र जंगली पठारी (मालरान) स्वरूप का है।

यहाँ विरल जंगलों से होकर बनी पगडंडी पर ऊँच-नीच वाले रास्तों से चलते हुए किले की ओर जाना पड़ता है।

मार्ग में वर्षा के पानी से बनी घल (कटाव वाली पगडंडी) से होते हुए हम खिंडी क्षेत्र में पहुँचते हैं।

आते समय रास्ते में पानी का ओढ़ा (छोटी धारा) भी पार करना पड़ता है।

💧 पानी का ओढ़ा :

जंगल मार्ग से आगे बढ़ने पर ऊपर के क्षेत्र से बहकर आने वाला एक ओढ़ा दिखाई देता है।

बरसात के मौसम में इस ओढ़े में भरपूर पानी रहता है, जबकि गर्मियों में पानी के स्रोत सूखने लगते हैं।

इस ओढ़े से क्षेत्र के सभी वन्य जीव, पक्षी एवं वनस्पतियों की आवश्यक जल-आवश्यकता पूरी होती है।

• खिंड कात्याल शिल्प :

घने जंगलों से होकर अनेक ऊँचाइयाँ पार करने के बाद हम किले की ऊँची कात्याळ चट्टानों के पास पहुँचते हैं। वहाँ से पैदल चलते हुए किले की तलहटी में आते हैं, जहाँ कात्याळ शिल्प देखने को मिलते हैं। यहाँ से किले की ओर जाने वाला मार्ग दर्शाया गया है। अलंग किल्ला, मदनगड और कुलंग किल्ला—ये तीनों किले यहाँ से दिखाई देते हैं। कात्याळ शिल्प के दाईं ओर जाने वाला रास्ता मदनगड की ओर जाता है। इसी मार्ग से हम कात्याळ प्रस्तर (चट्टानी) चढ़ाई वाले किले के आरोहण पथ पर आगे बढ़ते हैं।

• कठिन कात्याल चढ़ाई व पायरी मार्ग :

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Bhartiy kille 

यहाँ से ट्रेक अत्यंत कठिन हो जाता है। थोड़ा ऊपर चढ़ने पर कात्याळ पायरी मार्ग शुरू होता है, जो चट्टानों में जगह-जगह काटकर बनाया गया दिखाई देता है। इन पायऱियों की रचना ऐसी है कि पानी रुकता नहीं और सहज रूप से नीचे निकल जाता है। इसी मार्ग से हम किले पर चढ़ते हैं।

• संकरा पायरी-खड़ा मार्ग :

किले पर चढ़ते समय यह किला त्रिजोड़ी (तीन किलों की शृंखला) में होने के कारण, पास के पहाड़ी भाग से किले तक जाने वाला अत्यंत संकरा प्रस्तर मार्ग मिलता है, जिस पर चढ़ते समय काफी थकान होती है। आगे कुछ स्थानों पर भूस्खलन के कारण मार्ग ध्वस्त हुआ दिखाई देता है। ऐसे स्थानों पर तार और रस्सियाँ रोलिंग/सहारे के लिए लगाई गई हैं। एक ओर गहरी खाई है और दूसरी ओर खड़ा काला प्रस्तर शिलाखंड। जिन्हें पर्वतारोहण का अनुभव है और ऊँचाई का भय नहीं है, ऐसे लोगों के लिए मदनगड ट्रेक को “पंढरी” के समान माना जाता है। इस संकरे मार्ग से एक समय में केवल एक ही व्यक्ति किले पर चढ़ सकता है। आगे ऊपरी भाग में चढ़ने के लिए रस्सी लगाई गई है, जिसके सहारे हम ऊपर पहुँचते हैं। जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं, वैसे-वैसे कळसुबाई शिखर, कुलंग किला, अलंग किला तथा सह्याद्री पर्वत श्रृंखला की अन्य चोटियाँ, साथ ही भाटघर धरण और अन्य जलग्रहण क्षेत्रों के सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं।

• दरवाजा :

किले के दरवाजे अब भग्न अवस्था में हैं। उनके अवशेष आसपास बिखरे हुए दिखाई देते हैं। वर्तमान में यहाँ एक भी दरवाजा अस्तित्व में नहीं है।

• फडताल पानी का टांका :

मदनगड किला जाणकारी हिंदी भाषा मे   (Madangad Fort Information in Hindi)

महाराष्ट्र किल्ले 

किले के दरवाजे और अन्य संरचनाओं के निर्माण हेतु, पायरी मार्ग के पास के प्रस्तर को काटकर भीतर एक छोटा पानी का टांका बनाया गया है। वर्षा ऋतु में इसमें पानी भर जाता है। किले पर रहने वालों के लिए पानी की व्यवस्था हो—इसी उद्देश्य से इसका निर्माण किया गया प्रतीत होता है। संभवतः देवड़ी में रहने वाले पहरेदारों के लिए यह टांका खोदा गया होगा।

• विस्तृत पठार (माथा) :

किले के ऊपरी भाग में एक छोटा किंतु विस्तृत पठार है, जिसका ढलान हल्का है। इस क्षेत्र का उपयोग निगरानी के लिए किया जाता था। प्राचीन और मध्ययुगीन काल में यहाँ से आसपास के व्यापारिक मार्गों और अन्य गतिविधियों पर निगरानी रखी जाती थी।

• पानी की टंकियाँ :

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किले के माथे के ढलान को ध्यान में रखते हुए, मार्ग पर प्रस्तर को काटकर पत्थर निकालकर आपस में जुड़ी हुई पानी की टंकियाँ बनाई गई हैं। वर्षा ऋतु में इनमें पानी संचित किया जाता था और उसी पानी का उपयोग पूरे वर्ष पीने तथा अन्य आवश्यकताओं के लिए किया जाता था।

• कात्याल खोदीव गुहा कक्ष :

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किले के ऊँचे भाग में निर्माण कार्य के लिए नीचे से सामग्री न ले जाकर, यहीं के प्रस्तर को काटकर एक कक्ष (कमरा) बनाया गया दिखाई देता है। सुंदर छेनी और हथौड़े की सहायता से पत्थर काटकर यह लयन (आवासीय) कक्ष शिबंदी में रहने वाले लोगों के लिए बनाया गया था। वर्तमान में इस स्थान पर किले की भ्रमंती के लिए आने वाले गिर्यारोहक ठहरते हैं।

• बांधकाम (निर्माण) अवशेष :

मदनगड किला जाणकारी हिंदी भाषा मे   (Madangad Fort Information in Hindi)


किले के ऊपरी भाग में भूमि से सटे निर्माण के ज्योत्य (आधार) के अवशेष देखने को मिलते हैं। आसपास कुछ पत्थर बिखरे हुए दिखाई देते हैं। संभवतः यहाँ किले के प्रशासनिक कार्य देखने वाले अधिकारियों और सैनिकों के निवास हेतु कुछ निर्माण किए गए होंगे। समय के साथ उपेक्षा होने के कारण ये संरचनाएँ नष्ट हो गईं और आज केवल उनके अवशेष ही शेष हैं।

• किले का उद्देश्य :

प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि यह किला व्यापारिक मार्गों पर निगरानी रखने तथा कुलंग और अलंग किलों पर आक्रमण करने के लिए इस स्थान का उपयोग न हो, इस उद्देश्य से विकसित किया गया था। यहाँ अधिक निर्माण नहीं दिखाई देता, जिससे तकनीकी दृष्टि से यह अनुमान लगाया जाता है कि सीमित संख्या में सैनिकों द्वारा निगरानी हेतु यह किला बनाया गया था।

• चारों दिशाओं में दिखाई देने वाले किले और शिखर :

किले के उत्तर दिशा में हरिहर, त्र्यंबक, अंजनेरी; दक्षिण दिशा में हरिश्चंद्र, आजोबागड, खट्टाशिखर, कोकणकडा; पूर्व दिशा में कळसुबाई शिखर और अलंग किल्ला तथा पश्चिम दिशा में कुलंग किल्ला किले के माथे से स्पष्ट दिखाई देते हैं।

मदनगड किले की ऐतिहासिक जानकारी :

• ऐसा माना जाता है कि मदनगड किले का निर्माण यादव राजवंश के काल में हुआ होगा। कुलंग और अलंग किलों की जुड़ी हुई जोड़ी पर शत्रु अधिकार न कर सके, इसके लिए मदनगड स्थित इस पर्वत को उपयोग में न लिया जाए, इसी उद्देश्य से मदनगड का विकास किया गया होगा। साथ ही व्यापारिक मार्गों पर निगरानी रखने के लिए यहाँ पूर्वकाल में एक चौकी रही होगी, ऐसा स्थानीय लोगों की बोलचाल में कहा जाता है।

• ईस्वी सन 9वीं से 11वीं शताब्दी के काल में यह पर्वत यादव वंश के शासन में शामिल हुआ। इसके भौगोलिक स्थान को ध्यान में रखते हुए, निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा की दृष्टि से यहाँ पानी की टंकियाँ, गुहाकक्ष, दरवाजा तथा पायरी मार्ग विकसित किए गए।

• आगे चलकर यह किला सुल्तानशाही के मुस्लिम शासन तथा उसके बाद मराठी शासन के अंतर्गत रहा।

• कुछ समय तक नाशिक क्षेत्र में होने के कारण इस किले ने मुगल शासन भी देखा।

• इसके पश्चात ईस्वी सन 1760 में यह किला कुलंग किले के साथ स्वराज्य के प्रधानमंत्री पेशवाओं के अधीन आया।

• ईस्वी सन 1818 में इस किले पर ब्रिटिशों ने अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने यहाँ के पायरी मार्ग को क्षतिग्रस्त किया तथा किले के दरवाजे और अन्य वास्तुओं को नष्ट कर दिया, ताकि मराठा पुनः एकजुट होकर उनकी सत्ता को चुनौती न दे सकें। इसी कारण इन प्रेरणास्थलों को नष्ट किया गया।

• ईस्वी सन 1947 के बाद यह किला स्वतंत्र भारत सरकार के अधीन है।

• वर्तमान में अनेक ट्रेकर्स A. M. K. (Alang–Madangad–Kulang) नाम से अलंग, मदनगड और कुलंग—इन तीनों किलों की ट्रेकिंग करते हैं।

रहने की व्यवस्था कैसी है?

• किले के परिसर में स्थित जलस्रोत फरवरी महीने के बाद सूखने लगते हैं। इसलिए ट्रेक पर जाने वालों को अक्टूबर से फरवरी के बीच ट्रेक करना अधिक उपयुक्त होता है।

• वर्षा ऋतु में भी ट्रेक किया जाता है, परंतु विशेष सावधानी आवश्यक है क्योंकि काई (शैवाल) जमने से मार्ग फिसलन भरा हो जाता है। अतः अक्टूबर से फरवरी का समय सर्वोत्तम माना जाता है।

• साथ ही, क्षेत्र के अनुभवी गाइड को साथ लेना अत्यंत लाभदायक होता है।

भोजन की व्यवस्था कैसी है?

• इस स्थान पर भोजन की कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।

• रहने की व्यवस्था संभव है, क्योंकि यहाँ गुहा उपलब्ध है।

• भोजन की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती है।

• फरवरी महीने के बाद पानी की कमी महसूस होने लगती है।

• यहाँ के कुंडों का पानी पीने योग्य है, किंतु यदि उसे छोटे फिल्टर से शुद्ध कर लिया जाए तो बेहतर होता है।

इस प्रकार यह है मदनगड किले की संपूर्ण जानकारी।

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