माहुली, पळसगड, भंडारगड किला जानकारी
• स्थान:
महाराष्ट्र राज्य के ठाणे जिले में शहापूर के पास आसनगांव के निकट सह्याद्री पर्वत की श्रृंखला में एक ही स्थान पर तीन जुड़े हुए किले देखने को मिलते हैं। उनमें माहुली, पळसगड और भंडारगड ऐसे ये जुड़ किले हैं।
• ऊंचाई:
माहुली किले की समुद्र तल से ऊंचाई लगभग २८१५ फीट है और यह ठाणे जिले का सबसे ऊंचा शिखर वाला किला है।
• किले तक जाने का मार्ग:
• मुंबई से ठाणे और वहां से पडघा मार्ग से आसनगांव होकर माहुली किले तक पहुंचा जा सकता है।
• नाशिक मार्ग से आने पर इगतपुरी – कसारा घाट मार्ग से शहापूर और वहां से आगे आसनगांव होकर माहुली किले तक जाया जा सकता है।
• माहुली किले पर देखने योग्य स्थान:
• माहुली किले के पायथ्य (तलहटी) में एक गणेश मंदिर है। वहां से दो मार्ग दिखाई देते हैं। वहां के कमानीदार प्रवेश मार्ग से हम माहुली किले की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। आगे वन विभाग का ऑफिस आता है, जहां से प्रवेश टिकट लेकर आगे किले की ओर जा सकते हैं।
• निसर्ग पर्यटन केंद्र के पास से आगे जंगल के रास्ते माहुली किले की ओर जाते समय सह्याद्री का सुंदर और मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है। साथ ही वन संपदा की जानकारी भी प्राप्त होती है।
• लकड़ी का पुल:
जंगल से किले की ओर जाते समय बहने वाले नाले पर लकड़ी का पुल बनाया गया है। उसे पार करके हम किले की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
• किलेबंदी (तटबंदी):
बुरुज व किलेबंदी
पैदल लगभग दो घंटे की चढ़ाई चढ़ने के बाद हम किले की किलेबंदी के पास पहुंचते हैं। वहां पहुंचने पर ऊपर के भाग में ध्वज स्तंभ पर लहराता हुआ भगवा ध्वज दिखाई देता है।
• सीढ़ी मार्ग:
किलेबंदी के पास ही किले के ऊपर जाने के लिए एक लोहे की सीढ़ी लगाई गई है। उस मार्ग से हम किले पर जा सकते हैं।
• पानी के टांके:
किले पर निर्माण करते समय निचले भाग से पत्थर निकालकर उनका उपयोग यहां की इमारतों और किलेबंदी के निर्माण में किया गया। उसी स्थान पर पानी संग्रह करने के लिए टांके बनाए गए। उनमें जमा पानी का उपयोग पूरे वर्ष किया जाता था।
• मंदिर के अवशेष और महादेव पिंडी:
माहुली किले के पानी के टांकों से आगे जाने पर कुछ दूरी पर एक महादेव पिंडी और कुछ अवशेष देखने को मिलते हैं, जो समय के साथ उपेक्षित अवस्था में दिखाई देते हैं।
• छत्रपती शिवराय की प्रतिमा:
आगे किले के महाद्वार की ओर जाते समय हाल ही में स्थापित छत्रपती शिवराय की प्रतिमा देखने को मिलती है। उनके दर्शन करके हम आगे महाद्वार की ओर जा सकते हैं।
• माहुली किला महाद्वार:
गोमुख पद्धति का मार्ग
पहरेदारों की देवड़ियां
किले के महाद्वार का काफी हिस्सा टूट चुका है। इस दरवाजे का निर्माण गोमुख पद्धति में किया गया है। इस प्रकार की रचना के कारण शत्रु के लिए किले का दरवाजा तोड़ना कठिन होता था। गोमुख का अर्थ है गाय द्वारा बछड़े को चाटते समय बनने वाला मोड़। इस कारण किले का दरवाजा अंदर की ओर सुरक्षित रहता है और बुरुज से दरवाजा जल्दी दिखाई नहीं देता। दरवाजे का ऊपरी भाग गिर चुका है, केवल खड़े अवशेष बचे हैं। ऊपर के हिस्से और किलेबंदी के पत्थरों के अवशेष आसपास पड़े हुए दिखाई देते हैं। दरवाजा ऊंची चट्टान के पास होने के कारण उसके अंदर खोदकर पहरेदारों के लिए देवड़ियां बनाई गई हैं। साथ ही दरवाजे के बाहर की ओर शरभ नामक प्राणी की शिल्पाकृति देखने को मिलती है।
दरवाजा बंद करने के लिए लकड़ी के अडसर लगाने की खांचे भी दिखाई देते हैं। कुछ पत्थरों पर सुंदर नक्काशी भी की गई है।
• वाड़े और मंदिरों के अवशेष:
वीरगळ और मंदिर अवशेष
माहुली किले पर घूमते समय जब हम भंडारगड की ओर जाने वाले मार्ग से जाते हैं, तब रास्ते में एक स्थान पर वाड़ों तथा मंदिरों के अवशेष देखने को मिलते हैं।
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• राजसदरे के अवशेष:
किला भ्रमण करते हुए आगे बढ़ने पर हमें चार-पाँच सीढ़ियों वाला ऊँचा चबूतरा जैसा निर्माण दिखाई देता है। इसके लिए कई तराशे हुए पत्थरों का उपयोग किया गया होगा। ऊपर की ओर बैठने की व्यवस्था होने से यह स्पष्ट होता है कि यह राजसदरे के अवशेष हैं। यहां प्रशासनिक अधिकारियों की बैठकें होती थीं। इस संरचना के पास एक तुलसी वृंदावन भी पाया जाता है।
• वास्तु अवशेष:
सदरे के पीछे की ओर एक अन्य संरचना के अवशेष दिखाई देते हैं। यह एक निवास स्थान (रहने की जगह) रहा होगा। इसकी काफी हद तक गिरावट हो चुकी है।
• प्राचीन शिवमंदिर माहुलीश्वर:
माहुली किले पर एक शिवमंदिर स्थित है। इसकी तीनों ओर की दीवारें अच्छी अवस्था में दिखाई देती हैं। अंदर का गर्भगृह खुला है और वहां एक शिवलिंग देखने को मिलता है। यहां एक भगवा ध्वज भी दिखाई देता है।
• दारूगोला कोठार:
किले के एक हिस्से में एक संरचना दिखाई देती है जो नष्ट होने की अवस्था में है। यह किले का दारूगोला (बारूद) रखने का स्थान यानी दारूगोला कोठार था।
• भंडार गड:
माहुलीश्वर के दर्शन करने के बाद जब हम महाद्वार की ओर जाने वाले मार्ग पर आते हैं, तब वहां एक अलग रास्ता मिलता है। उस रास्ते से हम भंडारगड की ओर जा सकते हैं।
भंडारगड, माहुली किले के दक्षिण-पश्चिम दिशा में कोकण की ओर स्थित है।
इस मार्ग पर आगे बढ़ते हुए रास्ते में कुछ वीरगली (वीर पत्थर) दिखाई देते हैं।
साथ ही कुछ शिल्प भी देखने को मिलते हैं। आगे जाने के लिए एक खिंड (दर्रा) आती है। यहां ऊपर चढ़ने के लिए लोहे की सीढ़ी लगी हुई है, जिसके माध्यम से हम भंडारगड पर पहुंच सकते हैं।
भंडारगड पर हमें हाथीखाना (हाथियों के रहने का स्थान) के अवशेष दिखाई देते हैं। साथ ही कोकण दिशा की ओर स्थित कल्याण दरवाजा भी देखने को मिलता है।
• गड माथा व कोकण (कल्याण) दरवाजा:
सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में स्थित इस किले का शीर्ष (माथा) चढ़ना कठिन होता है। जगह-जगह लोहे की सीढ़ियां लगी हुई हैं। ऊपर पहुंचने पर दूर तक वजीर सुळका, भटजी और नवरा-नवरी सुळके दिखाई देते हैं। साथ ही तानसा अभयारण्य का भी दृश्य दिखाई देता है।
• कल्याण दरवाजा:
यह दरवाजा कोकण की ओर स्थित है। इसे देखने के लिए गहरी खाई के किनारे उतरना पड़ता है। वर्तमान में यह मार्ग काफी कठिन है। फिर भी यह दरवाजा समय के साथ आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है।
• कल्याण दरवाजा ही भंडारगड पर आने का मुख्य मार्ग है, लेकिन कई शिवप्रेमी माहुली मार्ग से आते हैं। कल्याण दरवाजे की राह खड़ी सीढ़ियों वाली है और यह गहरी खाई से नीचे उतरती है, इसलिए पर्वतारोही इस मार्ग का उपयोग करते हैं। इसे चढ़ते समय काफी थकान होती है।
• हनुमान दरवाजा:
कल्याण दरवाजा देखने के बाद वापस लौटकर सीढ़ी मार्ग से उतरते हुए, गहरी खाई की संकरी पगडंडी से हम हनुमान दरवाजे की ओर जा सकते हैं। रास्ते में चट्टान पर उकेरी गई हनुमान जी की मूर्ति भी देखने को मिलती है।
पळसदुर्ग (Palasdurg)
वाडे के अवशेष से नीचे की दिशा में जाने वाले मार्ग से आगे बढ़ने पर बड़े-बड़े पत्थर (शिलाएं) दिखाई देते हैं। उस स्थान पर दो रास्ते जाते हैं। एक भंडारगड की ओर और दूसरा पळसदुर्ग की ओर जाता है।
पळसदुर्ग किले के मार्ग से आगे बढ़ने पर ऊंची चढ़ाई लगती है। समय के साथ यहां की संरचनाएं नष्ट हो चुकी हैं।
पळसदुर्ग – अवशेषों वाला पठार
• पत्थर की किलेबंदी:
आगे चढ़ाई करने पर पत्थर की किलेबंदी देखने को मिलती है।
• घाटी (घळ):
आगे एक घाटी दिखाई देती है। यह स्थान ऊंचाई पर होने के कारण यहां से तानसा बांध का जलसंग्रह और अभयारण्य का दृश्य दिखाई देता है।
• गणेश दरवाजा:
किले के परिसर में अनेक पेड़-पौधे और झाड़ियां उग आने के कारण यहां की संरचना देखने में कठिनाई होती है। लेकिन हाल ही में सह्याद्री प्रतिष्ठान द्वारा यहां एक दरवाजा खोजा गया है। दरवाजे की चौखट के अवशेष और दरवाजे की जगह की सफाई का कार्य उन्होंने किया है।
• ऐतिहासिक घटनाएं:
• माहुली किला और उसके जुड़ किले पळसदुर्ग तथा भंडारगड किसने बनवाए, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक उल्लेख नहीं मिलता। फिर भी यह किला यादव या उससे पहले की किसी हिंदू राजवट के समय बनाया गया होगा।
• ईस्वी सन 1485 में यह किला निजामशाही में शामिल हुआ।
• ईस्वी सन 1635-36 में निजामशाही पर हुए मुगल और आदिलशाही आक्रमण के समय शाहाजी राजे ने निजामशाही की रक्षा करते हुए अपनी पत्नी जिजाबाई और पुत्र शिवराय को यहां सुरक्षित रखा था।
• निजामशाही के पतन के बाद यह किला मुगलों के अधीन था।
• ईस्वी सन 1661 में शिवराय ने माहुली किले को स्वराज्य में जीत लिया।
• ईस्वी सन 1665 में पुरंदर की संधि में यह किला वापस मुगलों को दे दिया गया।
• ईस्वी सन 1668 में मराठों ने इसे पुनः जीतने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली।
• बाद में मोरोपंत पिंगळे प्रधान ने ईस्वी सन 1670 में इसे फिर से स्वराज्य में शामिल किया।
• आगे संभाजी राजे के काल तक यह किला स्वराज्य में ही रहा।
• ईस्वी सन 1735 में औरंगजेब बादशाह ने चालबाजी से इस किले पर कब्जा कर लिया।
• आगे पेशवा काल में माहुली और उसके जुड़ किले फिर से मराठा साम्राज्य में शामिल किए गए।
• आगे ईस्वी सन 1857 में मराठा-इंग्रेज संधि के बाद यह किला अंग्रेजों के अधीन चला गया।
• ईस्वी सन 1947 में यह किला स्वतंत्र भारत सरकार के अधीन आ गया।
इस प्रकार माहुलीगड, भंडारगड और पळसदुर्ग किलों की जानकारी है।




























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