तुंग किले की जानकारी (Tung Fort / कठीणगढ़)
📍 स्थान :
महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले के मावल तालुका में पवना बाँध के जलग्रहण क्षेत्र में खंडाला और लोनावला के पास पश्चिमी घाट अर्थात सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में तुंग किला स्थित है।
इस किले को कठीणगढ़ के नाम से भी जाना जाता है।
📏 ऊँचाई :
समुद्र तल से यह किला 3526 फीट अर्थात 1075 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
🚍 तुंग किले तक पहुँचने के यातायात मार्ग :
मुंबई और पुणे अंतरराष्ट्रीय स्थान हैं।
मुंबई से लोनावला तथा वहाँ से आंबी वैली रोड द्वारा घुसळखांब, फिर जावन तुंगी मार्ग से आगे तुंग किले के पायथ्य में स्थित हनुमंत मंदिर तक निजी वाहन से जाना पड़ता है और वहाँ से पैदल चढ़कर किले पर जाना होता है।
पुणे से पिंपरी-चिंचवड, खंडाला-लोनावला मार्ग से तुंग किले तक पहुँचा जा सकता है।
लोनावला से तुंग किला 26 किलोमीटर की दूरी पर है।
पुणे से तुंग किला 67 किलोमीटर की दूरी पर है।
👀 तुंग किले पर देखने योग्य स्थान :
🚗 हनुमंत मंदिर परिसर :
निजी वाहन से जावन-तुंग रोड द्वारा हम किले के पायथ्य में स्थित हनुमंत मंदिर परिसर में पहुँचते हैं। वहाँ वाहन पार्क कर हनुमंत के दर्शन करके गढ़ भ्रमण की शुरुआत की जा सकती है।
🛕 हनुमंत मंदिर :
गढ़ के पायथ्य में हमें नया बना हुआ हनुमंत मंदिर देखने को मिलता है। सिंदूरी रंग में रंगी सुंदर मूर्ति देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है।
हनुमंत संकटमोचक और बलोपासक देवता होने के कारण प्रत्येक किले और परिसर में उनकी स्थापना देखने को मिलती है।
⚔️ वीरगाळ (वीर स्मारक शिलाएँ) :
आगे मार्ग में एक ही स्थान पर क्रम से रखी हुई वीरगाळ देखने को मिलती हैं। युद्ध में पराक्रम दिखाकर स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं की स्मृति में ये वीरगाळ स्थापित की जाती हैं।
तुंग किले पर स्वराज्य काल में हुए आक्रमणों को परास्त करने वाले हिंदू योद्धाओं की स्मृति में ये वीरगाळ स्थापित की गई हैं।
इन वीरों ने महाराष्ट्र, देश, धर्म, स्त्री, गौमाता और क्षेत्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, इसका प्रतीक ये वीरगाळ हैं।
ये पहले बिखरी अवस्था में थीं। उन्हें एकत्र कर संरक्षित करने के लिए सह्याद्री दुर्ग प्रतिष्ठान के घाटी मावळों ने यहाँ स्थापित किया है और नई पीढ़ी तक इतिहास पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया है।
इन वीरगाळों को नमन कर आगे कठिन चढ़ाई के लिए प्रेरणा मिलती है।
🧗♂️ खड़ा सीढ़ी मार्ग :
वीरगाळ देखने के बाद आगे खड़ी चढ़ाई के बाद सीढ़ी मार्ग शुरू होता है। ब्रिटिश आक्रमण और वर्षा के कारण बड़ी दरार पड़ने से यह मार्ग नष्ट हो गया था, जिसे हाल ही में पुनर्निर्मित किया गया है।
यहाँ शिवकालीन सीढ़ियाँ भी देखने को मिलती हैं, जिन्हें स्वराज्य सीढ़ी कहा जाता है।
ऊपर जाने के लिए अत्यंत कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है। जगह-जगह लोहे की रॉड और रस्सियाँ लगाई गई हैं, जिनके सहारे ऊपर चढ़ा जा सकता है।
🛕 चपटदान मारुति लयन मंदिर :
गढ़ पर चढ़ते समय रास्ते में चट्टान में खोदा हुआ मारुति मंदिर दिखाई देता है। भीतर सिंदूरी रंग में रंगी सुंदर मूर्ति देखने को मिलती है।
💧 पानी का टांका :
मारुति मंदिर के पास ही चट्टान में खोदा हुआ पानी का टांका देखने को मिलता है।
🛖 लयन देवड़ी :
थोड़ा आगे जाने पर पहरेदारों के रहने के लिए खोदी गई देवड़ी दिखाई देती है। आज भी पर्वतारोहियों और गढ़ प्रेमियों द्वारा विश्राम के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
⚔️ रणमंडल मार्ग :
किले के द्वार की ओर जाते समय एक ओर ऊँची चट्टान और दूसरी ओर गहरी खाई तथा बीच में संकरी पगडंडी दिखाई देती है, जहाँ अधिकतम दो व्यक्ति ही चल सकते हैं। इसे रणमंडल मार्ग कहा जाता है।
यदि शत्रु किले की ओर बढ़े तो उन्हें रोकना आसान होता है। ऊपर से पत्थरों की वर्षा की जा सकती है और कम संख्या में आने वाली सेना को नष्ट किया जा सकता है। शत्रु को जोरदार हमला करना संभव नहीं होता।
🚪 मुख्य प्रवेश द्वार :
रणमंडल मार्ग से आगे बढ़ने पर किले का मुख्य प्रवेश द्वार दिखाई देता है। चट्टान में पानी के टांके खोदते समय निकाले गए पत्थरों और अन्य तराशे गए पत्थरों से बना अग्निजन्य काले पत्थर का मजबूत दरवाजा विशेष आकर्षण का केंद्र है।
बगल की सीढ़ियों और अन्य भागों के जीर्णोद्धार से प्राचीन वैभव पुनः प्राप्त हुआ है।
🛡️ चिलखत बुर्ज :
किले के द्वार के पास की संकरी पगडंडी से जाने पर दूसरी ओर दोहरी चिलखती बुर्ज दिखाई देती है। समय के साथ कुछ हिस्से गिर चुके हैं, फिर भी यह बुर्ज आज भी अच्छी स्थिति में है।
दोहरी प्राचीर वाली यह बुर्ज निगरानी और शत्रु गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उपयुक्त थी।
🚪 बुर्ज का जीभी दरवाजा :
मुख्य प्रवेश द्वार से अंदर आने पर खड़ा सीढ़ी मार्ग मिलता है। ऊपर चढ़ने पर चंद्राकार मोड़ वाला स्थान दिखाई देता है। भीतर की ओर एक दरवाजा दिखाई देता है, जिसे जीभी दरवाजा कहा जाता है।
इस दरवाजे के सामने की बुर्ज में हनुमंत की मूर्ति उत्कीर्ण है।
🛖 पहरेदार देवड़ियाँ :
अंदर की ओर पहरेदारों के विश्राम हेतु बनाई गई देवड़ियाँ दिखाई देती हैं। इनमें शिबंदी के सैनिक विश्राम करते थे।
🛕 गणेश मंदिर :
जीभी दरवाजे से अंदर ऊपर की ओर जाने पर ऊँचाई पर गणेश मंदिर दिखाई देता है। साधारण निर्माण शैली वाला यह मंदिर प्राचीन काल की याद दिलाता है। हाल ही में इसका जीर्णोद्धार किया गया है।
💦 खोदे हुए जलकुंड :
शिवकाल में पर्वत के जल प्रवाह को ध्यान में रखते हुए निचले भाग में पानी के मार्ग पर कात्याळ तालाब खोदे गए थे।
गढ़ पर पीने और उपयोग के पानी की आवश्यकता पूरी करने के लिए इनका निर्माण किया गया था।
इनसे निकाले गए पत्थरों का उपयोग प्राचीर और अन्य इमारतों के निर्माण में किया गया।
इन तालाबों के पास कई जंगली केले के पौधे उगे हुए दिखाई देते हैं।
🏯 बालकिल्ला :
गढ़ के ऊपरी भाग में संकरी पगडंडी से खड़ी चढ़ाई करते समय जगह-जगह पानी के टांके खोदे हुए दिखाई देते हैं।
🚩 बालकिल्ला ध्वज :
गढ़ के सर्वोच्च शिखर पर ध्वज स्तंभ दिखाई देता है।
🛕 तुंगाई देवी मंदिर :
गढ़ के ऊँचे और भव्य बालकिल्ले पर एक छोटा सा जीर्णोद्धारित मंदिर दिखाई देता है, जो तुंगाई देवी का मंदिर है।
इसी देवी के नाम पर इस किले का नाम तुंग रखा गया है।
🏚️ अन्य अवशेष :
किले पर जगह-जगह गिरे हुए वाड़ों और अन्य निर्माणों के अवशेष देखने को मिलते हैं।
📜 तुंग किला (उर्फ कठीणगढ़) – ऐतिहासिक जानकारी :
इस किले पर खुदी हुई गुफाएँ सातवाहन काल की हैं।
पूर्व में यह क्षेत्र सातवाहन और यादव हिंदू राजवंशों के अधीन था।
उस काल में यहाँ लंबी गुफाएँ और पानी की पौड़ियाँ (टांके) खोदी गईं।
कोंकण के पवन मावल व्यापार मार्ग पर निगरानी के लिए इस किले का निर्माण किया गया।
ईस्वी सन 1482-83 में सैयद अली तबतबा द्वारा लिखित फारसी ग्रंथ बुरहान-ए-मासरी में इस क्षेत्र का उल्लेख तुंग अरण्य के रूप में मिलता है।
ईस्वी सन 1482-83 में मलिक नायब के पुत्र अहमद ने जुन्नर और कोंकण प्रांत जीतकर तुंग क्षेत्र को बहमनी सत्ता में शामिल किया।
यादव और बहमनी काल में यह पर्वत निगरानी चौकी के रूप में उपयोग में था।
बहमनी सत्ता के विघटन के बाद यह किला निजामशाही के अधीन आया।
ईस्वी सन 1636 में निजामशाही के पतन के बाद यह किला आदिलशाही में शामिल हुआ।
ईस्वी सन 1656 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने मावल प्रांत जीतकर इस किले को स्वराज्य में शामिल किया।
4 सितंबर 1656 को कई किलों के नाम बदले गए।
किले की कठिन स्थिति को देखते हुए इसका नाम कठीणगढ़ रखा गया।
ईस्वी सन 1665 में पुरंदर संधि के समय दिलेरखान ने आसपास के गाँव लूटे, लेकिन किला नहीं जीत सका।
पुरंदर संधि के अनुसार ईस्वी सन 1665 में तुंग किला मुगलों को सौंपा गया।
आगरा से मुक्त होने के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुनः यह किला स्वराज्य में लिया।
ईस्वी सन 1704 में छत्रपति संभाजी महाराज के निधन के बाद मुगलों ने घेरा डालकर किला जीत लिया।
अमानुल्ला खान उर्फ अलीवर्दी खान की यहाँ नियुक्ति हुई और उसने किले का नाम बंकीगढ़ रखा।
आगे तिकोणा (वितंडगढ़) किले के किलेदार करतलदास के पुत्र कुवरमल तथा बाद में अभयराम किलेदार रहे।
ईस्वी सन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद दर्यासारंग सरखेल कान्होजी आंग्रे ने किले को स्वराज्य में शामिल किया।
पेशवा श्रीमंत बालाजी विश्वनाथ की सलाह से यह किला छत्रपति शाहू महाराज को सौंपा गया।
ईस्वी सन 1818 में ब्रिटिश अधिकारी कर्नल प्रीथर ने तोपों से हमला कर सीढ़ियाँ तोड़ीं और किले पर कब्जा कर लिया।
आगे यह किला भोर संस्थान को सौंपा गया।
भारत स्वतंत्र होने के बाद भोर संस्थान के भारत में विलय पर यह किला भारत सरकार के अधीन आया।
भारत सरकार के पुरातत्व विभाग, शिवभक्त दुर्गप्रेमी, सह्याद्री प्रतिष्ठान और स्थानीय लोगों के सहयोग से यहाँ संरक्षण कार्य किए जा रहे हैं।
✨ इस प्रकार है तुंग (कठीणगढ़) किले की संपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी।




















कोणत्याही टिप्पण्या नाहीत:
टिप्पणी पोस्ट करा
यह एक प्रायव्हेट वेबसाईट हैं l इसमें लिखी हुई जाणकारी के बारे में आप को आशंका हो तो सरकारी साईट को देखकर आप तसल्लई कर सकते हैं l