crossorigin='anonymous' src='https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1553308877182847'/> महाराष्ट्र किल्ले व स्थळे यांची माहिती Forts and places in maharashtra: वेरूळ लेणी (Ellora Caves) वेरूळ लेण्यांची माहिती | Ellora Caves Information in Hindi

मंगळवार, २७ जानेवारी, २०२६

वेरूळ लेणी (Ellora Caves) वेरूळ लेण्यांची माहिती | Ellora Caves Information in Hindi

 वेरूळ लेणी (Ellora Caves)
वेरूळ लेण्यांची माहिती | Ellora Caves Information in Hindi

वेरूळ लेणी (Ellora Caves)  वेरूळ लेण्यांची माहिती | Ellora Caves Information in Hindi


• स्थान :

महाराष्ट्र राज्य के संभाजीनगर (औरंगाबाद) शहर से थोड़ी दूरी पर, वेरूळ गाँव के पास, सातमाळा–अजंता पर्वत श्रृंखला में वेरूळ की प्रसिद्ध लेणियाँ स्थित हैं।

लेण्याओं तक पहुँचने के मार्ग :

• पुणे और संभाजीनगर (औरंगाबाद) शहर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हवाई सेवा से जुड़े हुए हैं।

• देश स्तर पर सड़क मार्ग, रेल मार्ग और हवाई सेवाओं द्वारा ये शहर अच्छी तरह से जुड़े हैं।

• संभाजीनगर से देवगिरी घाटी – दौलताबाद – कागज़ीपुर – खुलताबाद होते हुए आगे वेरूळ रोड से लेण्याओं तक जाने के लिए संपर्क मार्ग उपलब्ध है।

• धुळे शहर से – चाळीसगाव – कन्नड मार्ग द्वारा वेरूळ लेणियाँ पहुँचा जा सकता है।

• नाशिक से – सिन्नर – कोपरगांव – वैजापुर – लसूर मार्ग से वेरूळ लेणियाँ जाया जा सकता है।

• पुणे शहर से – अहमदनगर – शनि शिंगणापुर – नेवासा – गंगापुर – लसूर मार्ग द्वारा वेरूळ लेणियाँ देखने जाया जा सकता है।

वेरूळ लेण्याओं में देखने योग्य स्थान :

• संभाजीनगर शहर के सिडको बस स्थानक से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर वेरूळ गाँव स्थित है। वहाँ से थोड़ी दूरी पर लेण्याओं तक पहुँचने के लिए सड़क मार्ग है। इस मार्ग से सीधे लेण्याओं तक पहुँचा जा सकता है।

• इस क्षेत्र के पर्वत को पहले “येलो पर्वत” कहा जाता था। यहाँ से बहने वाली नदी को “येलगंगा” कहा जाता था। इस नदी के तट पर बसे गाँव को “येलोर” कहा जाता था। कालांतर में इसी नाम का अपभ्रंश होकर “वेरूळ” नाम प्रचलित हुआ और आज यह स्थान वेरूळ के नाम से जाना जाता है।

• ये लेणियाँ छेनी-हथौड़े के उपयोग से तराशी गई हैं। इन्हें बनाने में हजारों कारीगरों ने कई वर्षों तक अत्यंत परिश्रम किया है।

• इस स्थान पर कुल 34 लेणी (गुफाएँ) हैं। इनमें—

• लेणी क्रमांक 1 से 12 बौद्ध धर्मीय लेणियाँ हैं।

• लेणी क्रमांक 13 से 29 हिंदू धर्मीय लेणियाँ हैं।

• लेणी क्रमांक 30 से 34 जैन धर्मीय लेणियाँ हैं।

• यहाँ हिंदू, जैन और बौद्ध—तीनों धर्मों की लेणियों का सुंदर और संतुलित संगम देखने को मिलता है।

• बौद्ध लेणियाँ :

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• बौद्ध लेणियों में विहार, चैत्यगृह (प्रार्थनागृह), बुद्ध भिक्षुओं के निवास-स्थल, गौतम बुद्ध की विभिन्न भाव-मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियाँ तथा अन्य बौद्ध धर्मीय मूर्तियाँ और बोधिसत्वों की शिल्पकला देखने को मिलती है।

• लेणी क्रमांक 1 बुद्धकालीन घटनाओं पर आधारित उत्कीर्ण लेणी है। इस लेणी में आठ दालान हैं। यहाँ बुद्ध भिक्षु निवास करते थे। अनेक बुद्ध मूर्तियाँ और बौद्ध वाङ्मय से संबंधित रचनाएँ यहाँ पाई जाती हैं।

• लेणी क्रमांक 2 और लेणी क्रमांक 3 की संरचना एक-दूसरे के समान दिखाई देती है।

• लेणी क्रमांक 4 दो मंज़िला है। यहाँ बुद्ध की मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं।

• लेणी क्रमांक 5 महायान परंपरा की लेणी है। इस स्थान पर बुद्ध भिक्षु बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करते थे। साथ ही उनके लिए भोजन कक्ष भी यहाँ स्थित था।

• लेणी क्रमांक 6 एक विहार है। बुद्ध भिक्षु बौद्ध तत्त्वज्ञान के प्रचार के लिए चारिका करते थे। यात्रा के समय तथा वर्षा ऋतु में सुरक्षित आश्रय के रूप में विहार का उपयोग किया जाता था। इस लेणी में तारा बोधिसत्व और अवलोकितेश्वर की विभिन्न शिल्पाकृतियाँ देखने को मिलती हैं। साथ ही यहाँ हिंदू देवी सरस्वती की मूर्ति भी दिखाई देती है। सरस्वती विद्या की देवी मानी जाती हैं।

• लेणी क्रमांक 7 और 8 अधूरी रह गई हैं।

• लेणी क्रमांक 9 एक पूजास्थल जैसा प्रतीत होता है। यहाँ अनेक गवाक्ष (खिड़कियाँ) दिखाई देती हैं। इस लेणी में तारा बोधिसत्व की मूर्ति है। साथ ही इंद्रियों को वश में कर भय उत्पन्न करने वाले छह सर्प, हाथी, अग्निदेवता, तलवार आदि की शिल्पमूर्तियाँ भी उकेरी गई हैं।

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• लेणी क्रमांक 10 एक चैत्यगृह है। इसके मध्य भाग में स्तूप और बुद्धमूर्ति स्थित है। यहाँ सुंदर नक्काशीदार अनेक स्तंभ तथा अर्धवृत्ताकार कमान देखने को मिलती है। छत पर लकड़ी की आकृति जैसा सर्प उकेरा गया है। इस स्थान पर भिक्षु प्रार्थना और ध्यान किया करते थे।

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• लेणी क्रमांक 11 में कुछ बौद्ध धर्मीय तथा कुछ हिंदू धर्मीय मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं। यह लेणी दो मंज़िला है।

• लेणी क्रमांक 12 तीन मंज़िला है, जहाँ ध्यानस्थ बुद्धमूर्ति देखने को मिलती है।

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• हिंदू धर्मीय लेणियाँ :

• हिंदू धर्मीय लेणियों में विभिन्न हिंदू देवताओं की मूर्तियाँ तथा पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंगों को दर्शाने वाली शिल्पकला देखने को मिलती है।

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• कैलास मंदिर :

वेरूळ लेण्याओं में सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान कैलास लेणी (कैलास मंदिर) को प्राप्त है। एक अखंड पठार से विशाल शिला को चुनकर पहले संपूर्ण संरचना निर्धारित की गई और फिर शिखर से आधार की ओर खुदाई व नक्काशी करते हुए यह मंदिर बनाया गया। यह कैलास लेणी लगभग 50 मीटर लंबी, 33 मीटर चौड़ी और 29 मीटर ऊँची है।

“पहले शिखर, फिर आधार”

— यह इसकी अनोखी निर्माण शैली है।

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इस लेणी की संरचना में सुंदर गर्भगृह, उसके आगे सभामंडप, फिर स्तंभ, और अंत में प्रवेशद्वार की कमान दिखाई देती है।

• कैलास लेणी देखने जाते समय सबसे पहले एक भव्य नक्काशीदार कमान दिखाई देती है। प्रवेशद्वार पर शंखनिधि और पद्मनिधि नामक दो द्वारपाल उत्कीर्ण हैं।

• शिखर से नीचे तक अत्यंत सुंदर नक्काशी की गई है। लगभग 40,000 टन पत्थर निकालकर ये शिल्प निर्मित किए गए। यहाँ पशु, अलंकरण, पत्तियाँ और फूलों की सूक्ष्म व आकर्षक कलाकारी दिखाई देती है।

• ऊपरी मंडप तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का मार्ग है। इस लेणी में एक भव्य शिवलिंग स्थापित है।

• लेणी के चारों ओर अनेक देवकोष्ठ (छोटे मंदिर) खोदे गए हैं। शिव–पार्वती तथा अन्य हिंदू देवताओं की मूर्तियाँ यहाँ देखने को मिलती हैं।

• एक प्रसिद्ध शिल्प में रावण कैलास पर्वत उठाने का प्रयास करता हुआ दिखाया गया है, जबकि ऊपर पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान हैं। इसी कारण इस लेणी को कैलास लेणी कहा जाता है।

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• यहाँ देवी दुर्गा, गणेश, तथा शिव–पार्वती की अनेक भव्य शिल्पाकृतियाँ भी हैं।

• स्तंभ :

यहाँ एक ही अखंड पत्थर से तराशा गया विशाल स्तंभ देखा जा सकता है, जिसकी ऊँचाई लगभग 150 फीट बताई जाती है।

• इस स्थल पर महाभारत, रामायण तथा अनेक पौराणिक घटनाओं के दृश्य शिल्पों में उकेरे गए हैं।

• महाभारत भित्ति :

मंदिर परिसर में एक भित्ति (दीवार) है, जिस पर महाभारत काल के प्रसंग उत्कीर्ण हैं।

• यहाँ की शिल्पशैली कर्नाटक के पट्टदकल स्थित विरुपाक्ष मंदिर और कांची के कैलास मंदिर की शिल्परचना से साम्य रखती है।

• एक लोककथा के अनुसार, राष्ट्रकूट काल में यहाँ देवता को हाथी पर नैवेद्य अर्पित किया जाता था।

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• वेरूळ की जैन लेणियाँ :

• लेणी समूह में लेणी क्रमांक 30 से 34 जैन धर्मीय हैं। ये कुल पाँच गुफा मंदिर हैं।

• इनमें छोटे सभामंडप हैं, जहाँ इंद्रसभा, जगन्नाथ सभा और छोटा कैलास जैसी शिल्पाकृतियाँ देखने को मिलती हैं।

• जैन लेणियाँ एक मंज़िला हैं और अंदर से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

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• भव्य गज (हाथी), सूक्ष्म नक्काशी वाले स्तंभ, अत्यंत बारीक शिल्पकार्य और आकर्षक तोरण—ये सब जैन लेणियों के स्थापत्य वैभव को दर्शाते हैं।

• यहाँ जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ, इंद्र और गोमटेश्वर की मूर्तियाँ व शिल्पाकृतियाँ देखी जा सकती हैं।

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वेरूळ लेण्याओं की ऐतिहासिक जानकारी :

राष्ट्रकूट राजा कृष्ण के शासनकाल (ई.स. 753 से 783) में कैलास लेणी का निर्माण हुआ। इसमें राजा कृष्ण का महत्वपूर्ण योगदान था, जिसका उल्लेख शिलालेखों में मिलता है।

• बौद्ध और जैन लेणियाँ भी ई.स. 6वीं से 9वीं शताब्दी के बीच बनाई गईं।

• इन लेण्याओं की विशेषता यह है कि यहाँ हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों का त्रिवेणी संगम दिखाई देता है।

• ये लेणियाँ द्रविड़ संस्कृति से संबंधित हैं।

• बहमनी सुल्तान हसन गंगू बहमनी कुछ समय तक यहाँ निवासरत था।

• अरबी यात्री अल-मसूदी तथा फिरिश्ता जैसे विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रा-वृत्तांतों में वेरूळ लेण्याओं का उल्लेख किया है।

• मुगल काल में इन लेण्याओं को कुछ हद तक क्षति पहुँची।

• 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार ने इनके संरक्षण व मरम्मत के प्रयास किए।

• 1947 के बाद ये लेणियाँ स्वतंत्र भारत सरकार के अधीन आ गईं।

• 1951 में भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया।

• 1983 में यूनेस्को ने वेरूळ लेण्याओं को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी।

— इस प्रकार वेरूळ लेण्याओं का यह संपूर्ण ऐतिहासिक विवरण है।

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