शनिवार, ३ जानेवारी, २०२६

🌳 नवेगांव–नागझिरा वन्य अभयारण्य |nagzhira abhyaranya संपूर्ण जानकारी


🌳 नवेगांव–नागझिरा वन्य अभयारण्य | संपूर्ण जानकारी

🌳 नवेगांव–नागझिरा वन्य अभयारण्य | संपूर्ण जानकारी


📍 1. नवेगांव–नागझिरा वन्य अभयारण्य का स्थान

नवेगांव–नागझिरा वन्य अभयारण्य महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में स्थित है। यह गोंदिया और भंडारा जिलों की सीमा पर, गोंदिया जिले के अर्जुनी मोरगांव तहसील में फैला हुआ है। पेंच, ताडोबा और कान्हा जैसे प्रमुख टाइगर रिज़र्व के बीच स्थित होने के कारण इसे संक्रमण क्षेत्र (कॉरिडोर सैंक्चुरी) कहा जाता है, जो बाघों के सुरक्षित आवागमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

🌳 नवेगांव–नागझिरा वन्य अभयारण्य | संपूर्ण जानकारी


📐 2. क्षेत्रफल एवं भौगोलिक संरचना

इस अभयारण्य का कुल क्षेत्रफल लगभग 653.67 वर्ग किलोमीटर है। इसका अधिकांश भाग पहाड़ी और घने जंगलों से आच्छादित है। पहाड़ियों के पाददेश में इटीयाडोह बांध, नवेगांव बांध और नवेगांव झील स्थित हैं। माधवझरी, राणी डोह, कामझरी, टेलनझरी, अंगेझरी और श्रृंगारबोड़ी जैसे कई प्राकृतिक जलस्रोत और दलदली क्षेत्र यहां पाए जाते हैं। क्षेत्रफल के आधार पर यह भारत में 46वें और महाराष्ट्र में 5वें स्थान पर है।



🗂️ 3. अभयारण्य के प्रमुख वन विभाग

नवेगांव–नागझिरा अभयारण्य को पांच प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है—नागझिरा (155 वर्ग किमी), नवीन नवेगांव (151 वर्ग किमी), नवेगांव राष्ट्रीय उद्यान (133 वर्ग किमी), नवेगांव अभयारण्य (123 वर्ग किमी) और पोका क्षेत्र (97 वर्ग किमी)। यह विभाजन वन्यजीव संरक्षण और प्रबंधन की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है।

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💧 4. नवेगांव बांध एवं जल प्रबंधन



नवेगांव बांध इस अभयारण्य का मुख्य जलस्रोत है, जिसका निर्माण गोंड आदिवासी राजा सीताराम कोंडू पाटील डोंगरबा द्वारा किया गया था। झील के मध्य भाग में उनकी समाधि स्थित है। इस बांध से आसपास के पांच गांवों को निःशुल्क जलापूर्ति होती है, जबकि 15 से 20 गांवों को सिंचाई और पेयजल की सुविधा मिलती है।

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🌿 5. वनस्पति एवं वन संरचना

यह क्षेत्र उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों में आता है। यहां सागौन, बांस, ऐन, धावड़ा, तेंदू, मोह, हल्दू, कवठ, जामुन, बेल, महुआ, आम और शीशम जैसे वृक्ष पाए जाते हैं। अभयारण्य में महर्षि चरक के नाम पर ‘चरक उद्यान’ विकसित किया गया है, जहां औषधीय और आयुर्वेदिक पौधों का संरक्षण किया जाता है। यहां सुगंधित वृक्ष और जंगली फल देने वाली झाड़ियां भी पाई जाती हैं, जिनमें ‘आमरस’ नामक दुर्लभ फल विशेष उल्लेखनीय है।

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🌊 6. जल वनस्पतियां एवं वनीकरण कार्य

नवेगांव झील और अन्य जलाशयों में कमल, शैवाल और जलपर्णी ‘इकोर्निया’ (स्थानीय नाम – बेशरम) जैसी जल वनस्पतियां पाई जाती हैं। इन निरुपयोगी वनस्पतियों का उन्मूलन कर नए वनीकरण और पारिस्थितिकी संतुलन के कार्य किए जा रहे हैं।

🐯 7. प्रमुख वन्यजीव – बंगाल टाइगर



नवेगांव–नागझिरा अभयारण्य का मुख्य आकर्षण बंगाल टाइगर है। यहां बाघों की नियमित गणना सेंसर और कैमरा ट्रैप के माध्यम से की जाती है। एक नर बाघ लगभग 45 वर्ग किलोमीटर और एक मादा बाघिन लगभग 12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विचरण करती है। पंजों के निशान और शरीर की धारियों से प्रत्येक बाघ की पहचान की जाती है।

🐆 8. अन्य स्तनधारी प्राणी

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इस अभयारण्य में तेंदुआ, जंगली बिल्ली, ढोले (जंगली कुत्ते), गौर, सांभर, चीतल, नीलगाय, जंगली सूअर, भालू, बंदर और लंगूर सहित 34 से अधिक स्तनधारी प्रजातियां पाई जाती हैं, जो इसकी समृद्ध जैवविविधता को दर्शाती हैं।



🐦 9. पक्षी जीवन एवं पक्षी निरीक्षण

यह अभयारण्य पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग माना जाता है। यहां 209 से अधिक पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें एशिया के लगभग 60% प्रवासी पक्षी शामिल हैं। गरुड़, गिद्ध, हॉर्नबिल, मोर, क्रौंच, हंस, सारस, बगुला, किंगफिशर और जलकुक्कुट प्रमुख पक्षी हैं।



🐍 10. सरीसृप, उभयचर एवं कीट जीवन

यहां 36 से अधिक सरीसृप प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें विभिन्न सांप और घोरपड़ शामिल हैं। इसके अलावा मेंढक, केकड़े जैसे उभयचर और 120 से अधिक तितली प्रजातियां भी इस अभयारण्य में पाई जाती हैं।

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🚗 11. नवेगांव–नागझिरा कैसे पहुंचें

निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर है। रेल मार्ग से साकोली और गोंदिया स्टेशन से सड़क द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है। अभयारण्य में कुल 10 प्रवेश द्वार हैं और पर्यटकों के लिए जिप्सी व कैंटर सफारी की सुविधा उपलब्ध है।

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⚠️ 12. पर्यटकों के लिए नियम एवं सुरक्षा निर्देश

अभयारण्य में धूम्रपान, मद्यपान, प्लास्टिक और कचरा ले जाना सख्त वर्जित है। वन्यजीवों को छेड़ना या तेज आवाज करना मना है। फोटोग्राफी की अनुमति है, लेकिन फ्लैश का उपयोग निषिद्ध है।



👥 13. आदिवासी समुदाय एवं स्थानीय रोजगार

अभयारण्य की सीमा पर गोंड आदिवासी गांव स्थित हैं। वन विभाग द्वारा सौर ऊर्जा आधारित सौम्य करंट फेंसिंग की व्यवस्था की गई है। स्थानीय लोगों को गाइड, ड्राइवर, वॉचमैन और वनोपज संग्रह जैसे कार्यों से रोजगार उपलब्ध कराया जाता है।

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📅 14. भ्रमण का सर्वोत्तम समय

नवेगांव–नागझिरा भ्रमण के लिए अक्टूबर से जून का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। यहां रॉक गार्डन, सजावटी पौधे, बच्चों के खेल क्षेत्र और भित्ति चित्र पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

🏨 15. ठहरने की सुविधा

पर्यटकों के लिए पीठेझरी, नागझरी और उमरझरी में सरकारी निवास व्यवस्था उपलब्ध है। इसके अलावा आसपास निजी लॉज और भोजनालय भी मौजूद हैं।



🏛️ 16. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह क्षेत्र प्राचीन काल में गोंड राजाओं के अधीन था। 18वीं शताब्दी में नवेगांव झील का निर्माण हुआ। 22 नवंबर 1974 को इसे अभयारण्य घोषित किया गया और 2012 में नवेगांव–नागझिरा को राष्ट्रीय व्याघ्र परियोजना का दर्जा मिला। वर्तमान में यहां प्रतिवर्ष 40,000 से अधिक पर्यटक आते हैं।

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Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary | Complete Information


🌳 Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary | Complete Information

Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary | Complete Information

 

📍 1. Location of Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary

Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary is located in the Vidarbha region of Maharashtra state, on the border of Gondia and Bhandara districts, specifically in Arjuni Morgaon taluka of Gondia district. Since it lies between major tiger reserves like Pench, Tadoba, and Kanha, this sanctuary is also known as a Corridor Sanctuary. It plays a crucial role in the migration and safe movement of tigers.

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📐 2. Area and Geographical Structure

The Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary covers an area of approximately 653.67 square kilometers. A large part of the forest is hilly terrain. At the foothills of these hills lie Itiadoh Dam, Navegaon Bandh, and Navegaon Lake. Several natural water bodies and marshy areas such as Madhavjhiri, Rani Doh, Kamjhiri, Telanjhiri, Angenjhiri, and Shringarbodi are found within the sanctuary.



🗂️ 3. Major Forest Divisions

The sanctuary is divided into five major sections for effective forest and wildlife management. These include Nagzira (155 sq. km), New Navegaon (151 sq. km), Navegaon National Park (133 sq. km), Navegaon Wildlife Sanctuary (123 sq. km), and Poka Area (97 sq. km). In terms of size, it ranks 46th in India and 5th in Maharashtra.



💧 4. Navegaon Bandh and Water Management

Navegaon Bandh is the main water reservoir of the sanctuary. It was constructed by the Gond tribal king Sitaram Kondu Patil Dongarba. His memorial (samadhi) still exists in the middle of the lake. Water from this project is supplied free of cost to five nearby villages, while 15 to 20 villages receive water for irrigation and drinking purposes.

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🌿 5. Vegetation Structure (Flora)

The sanctuary falls under the tropical deciduous forest category. Major tree species found here include teak, bamboo, ain, dhawda, tendu, mahua, haldu, kawath, jamun, bel, mango, and shisham. An internal botanical garden named Charak Udyan, after Maharshi Charak, has been developed, where various medicinal and Ayurvedic plants are cultivated. Fragrant trees and small shrubs yielding wild fruits are also found here. A rare local fruit called “Amras” is a special attraction of this forest.



🌊 6. Aquatic Vegetation and Afforestation Work

Water bodies within the sanctuary contain lotus, algae, and aquatic plants such as Eichhornia (locally known as Besharam). As these plants are considered harmful to the ecosystem, they are being removed, and new afforestation and ecological restoration activities are being carried out.



🐯 7. Main Wildlife Attraction – Tiger

The main attraction of Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary is the Bengal Tiger. It is believed that nearly one-sixth of India’s tigers are found in this region. Tigers are counted annually using modern sensor systems and camera traps. A male tiger occupies around 45 square kilometers, while a tigress occupies about 12 square kilometers. Tigers are identified by their pugmarks and unique stripe patterns.

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🐆 8. Other Mammals

Apart from tigers, the sanctuary is home to leopards, jungle cats, wild dogs (dholes), gaur, sambar, chital, nilgai, wild boar, sloth bears, monkeys, and langurs. In total, more than 34 species of mammals are found here, highlighting the rich biodiversity of the forest.

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🐦 9. Birdlife

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Navegaon–Nagzira is a well-known destination for birdwatching. Over 209 species of birds have been recorded here. About 60% of Asian migratory bird species visit this area. Commonly seen birds include eagles, vultures, hornbills, peacocks, storks, herons, swans, cranes, parrots, kingfishers, wagtails, and water hens.



🐍 10. Reptiles, Amphibians, and Insects

Around 36 species of reptiles have been documented in the sanctuary, with possibilities of more yet to be identified. Notable reptiles include the banded krait and monitor lizard. Amphibians such as frogs, aquatic creatures like crabs, and more than 120 species of butterflies are also found here.

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🚗 11. How to Reach Navegaon–Nagzira Wildlife Sanctuary

Nagpur is the nearest international airport. The sanctuary can be reached by road or rail from Nagpur. Sakoli railway station on the Nagpur–Kolkata route and Gondia railway station are the nearest railheads. The sanctuary has 10 entry gates. Jeep and canter safaris are available, along with trained guides and drivers.



⚠️ 12. Rules and Safety Guidelines

Smoking, alcohol consumption, plastic items, and littering are strictly prohibited inside the forest area. Tourists are allowed to observe animals from a distance but are not permitted to touch or disturb them. Photography is allowed, but the use of flash is strictly prohibited.

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👥 13. Tribal Communities and Local Employment

Several Gond tribal villages are located along the forest boundary. To prevent wild animals from entering farmlands, solar-powered mild electric fencing has been installed, which does not harm animals. Local people are provided employment as guides, drivers, watchmen, forest produce collectors, and through other conservation-related activities.

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📅 14. Best Time to Visit

Tourists visit the sanctuary throughout the year; however, the best time to visit is from October to June. Attractions such as a rock garden, ornamental plants, children’s play areas, and walls decorated with wildlife murals enhance the visitor experience.

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🏨 15. Accommodation Facilities

Accommodation facilities are available at Pitezari, Nagjhiri, and Umarjhiri. In addition, private lodges and restaurants are available in nearby areas for tourists.

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🏛️ 16. Historical Background

Historically, this region was under the rule of Gond kings. In the 18th century, Navegaon Lake was constructed by Gond king Sitaram Kondu Patil Dongarba. The area was declared a wildlife sanctuary on 22 November 1974, and in 2012, Navegaon and Nagzira were jointly recognized as the Navegaon–Nagzira Tiger Reserve. Today, more than 40,000 tourists visit this sanctuary every year.

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नवेगाव–नागझिरा वन्य अभयारण्य | संपूर्ण माहिती navegav nagzhira abhyarany mahiti

 

🌳 नवेगाव–नागझिरा वन्य अभयारण्य | संपूर्ण माहिती navegav nagzhira abhyarany mahiti 

नवेगाव–नागझिरा वन्य अभयारण्य | संपूर्ण माहिती navegav nagzhira abhyarany mahiti


📍 1. नवेगाव–नागझिरा वन्य अभयारण्याचे स्थान

नवेगाव–नागझिरा वन्य अभयारण्य महाराष्ट्र राज्यातील विदर्भ विभागात गोंदिया व भंडारा जिल्ह्यांच्या सीमेवर, गोंदिया जिल्ह्यातील अर्जुनी मोरगाव तालुक्यात वसलेले आहे. पेंच, ताडोबा आणि कान्हा या प्रमुख व्याघ्र प्रकल्पांच्या मधोमध असल्यामुळे या अभयारण्याला संक्रमण क्षेत्र (कॉरिडॉर अभयारण्य) असेही म्हटले जाते. वाघांच्या स्थलांतरासाठी हा भाग अत्यंत महत्त्वाचा मानला जातो.

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📐 2. क्षेत्रफळ व भौगोलिक रचना

नवेगाव–नागझिरा वन्य अभयारण्य सुमारे ६५३.६७ चौ. किलोमीटर क्षेत्रात पसरलेले आहे. या अरण्याचा बराचसा भाग डोंगराळ असून डोंगरांच्या पायथ्याशी इटीयाडोह धरण, नवेगाव बांध व नवेगाव तलाव आहेत. तसेच माधवझरी, राणी डोह, कामझरी, टेलनझरी, अंगेझरी व शृंगारबोडी असे अनेक नैसर्गिक पाणवठे व दलदलीचे भाग येथे आढळतात.



🗂️ 3. अभयारण्याचे प्रमुख विभाग

या अरण्याचे पाच प्रमुख विभाग करण्यात आले आहेत. त्यामध्ये नागझिरा (१५५ चौ. किमी), नवीन नवेगाव (१५१ चौ. किमी), नवेगाव राष्ट्रीय उद्यान (१३३ चौ. किमी), नवेगाव अभयारण्य (१२३ चौ. किमी) आणि पोका क्षेत्र (९७ चौ. किमी) यांचा समावेश होतो. आकारमानानुसार या अरण्याचा भारतात ४६ वा तर महाराष्ट्रात ५ वा क्रमांक लागतो.

नवेगाव–नागझिरा वन्य अभयारण्य | संपूर्ण माहिती navegav nagzhira abhyarany mahiti


💧 4. नवेगाव बांध व जलव्यवस्थापन

नवेगाव बांध हा या अभयारण्यातील मुख्य पाणलोट तलाव आहे. या तलावाची निर्मिती आदिवासी गोंड राजा सीताराम कोंडू पाटील डोंगरबा यांनी केली असून तलावाच्या मध्यभागी आजही त्यांची समाधी आहे. या प्रकल्पामुळे परिसरातील पाच गावांना मोफत पाणीपुरवठा होतो, तर इतर १५ ते २० गावांना सिंचन व पिण्याच्या पाण्यासाठी याचा उपयोग केला जातो.



🌿 5. वनस्पती रचना (Flora)

येथील वातावरण उष्ण कटिबंधीय पानझडी अरण्य प्रकारात मोडते. या अरण्यात साग, बांबू, ऐन, धावडा, तेंदूपत्ता, मोह, हळदु, कवठ, जांभूळ, बेल, महुआ, आंबा व शिसव यांसारखी विविध वृक्षसंपदा आढळते. अरण्याच्या अंतर्गत भागात महर्षी चरक यांच्या नावाने ‘चरक उद्यान’ उभारण्यात आले असून येथे अनेक औषधी व आयुर्वेदिक वनस्पतींची लागवड करण्यात आली आहे. तसेच सुवासिक वृक्ष व रानमेवा देणारी लहान झुडपेही येथे दिसतात. ‘आमरस’ नावाचे दुर्मीळ स्थानिक फळ हे येथील विशेष आकर्षण आहे.



🌊 6. जलवनस्पती व वनीकरण कार्य

नवेगाव तलाव व इतर जलाशयांमध्ये कमळे, शेवाळ तसेच जलपर्णी इकोर्निया (स्थानिक नाव – बेशरम) ही वनस्पती आढळते. ही वनस्पती निरुपयोगी असल्याने तिचे उच्चाटन करून नवीन वनीकरण व पर्यावरण संवर्धनाची कामे केली जात आहेत.



🐯 7. प्रमुख प्राणी – वाघ

नवेगाव–नागझिरा अभयारण्याचे प्रमुख आकर्षण म्हणजे बंगाल वाघ. संपूर्ण भारतातील सुमारे १/६ वाघ या परिसरात आढळतात, असे मानले जाते. वाघांची दरवर्षी जनगणना केली जाते. एक नर वाघ सुमारे ४५ चौ. किमी तर वाघीण सुमारे १२ चौ. किमी क्षेत्रात वावरते. वाघांच्या पंजांच्या खुणा व अंगावरील पट्ट्यांवरून त्यांची ओळख पटवली जाते. आधुनिक सेन्सर व कॅमेरा ट्रॅपद्वारे त्यांची मोजदाद केली जाते.

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🐆 8. इतर सस्तन प्राणी

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या अभयारण्यात बिबट्या, रानमांजर, ढोले (जंगली कुत्रे), गवा, सांबर, चितळ, नीलगाय, रानडुक्कर, अस्वल, माकडे व वानरे असे ३४ पेक्षा अधिक सस्तन प्राणी आढळतात. ही जैवविविधता या अरण्याचे महत्त्व अधोरेखित करते.

🐦 9. पक्षीजीवन



नवेगाव–नागझिरा हे पक्षी निरीक्षणासाठी प्रसिद्ध ठिकाण आहे. येथे २०९ पेक्षा अधिक पक्षी प्रजाती आढळतात. आशियातील सुमारे ६०% स्थलांतरित पक्षी येथे येतात. गरुड, गिधाड, हॉर्नबिल, मोर, करकोचा, बगळा, हंस, क्रौंच, पोपट, खंड्या, भारद्वाज व पाणकोंबड्या असे विविध पक्षी येथे पाहायला मिळतात.

🐍 10. सरीसृप, उभयचर व कीटकजीवन

येथे सुमारे ३६ प्रकारचे सरीसृप प्राणी नोंदवले गेले असून त्यापेक्षा अधिक असण्याची शक्यता आहे. पट्टेरी मण्यार व घोरपड विशेषतः आढळतात. तसेच बेडूक, खेकडे व इतर जलचर जीव दिसतात. याशिवाय १२० पेक्षा जास्त फुलपाखरांच्या प्रजाती येथे आढळतात.

🚗 11. अभयारण्यात कसे जायचे

नागपूर हे जवळचे आंतरराष्ट्रीय विमानतळ आहे. नागपूर–कोलकाता रेल्वेमार्गावरील साकोली स्टेशन किंवा गोंदिया रेल्वे स्टेशन येथून रस्तेमार्गे अभयारण्यात जाता येते. अभयारण्यात एकूण १० प्रवेशद्वारे आहेत. जिप्सी व कॅन्टर सफारीची सुविधा असून गाईड व ड्रायव्हर उपलब्ध करून दिले जातात.



⚠️ 12. नियम व सूचना

अरण्य परिसरात धूम्रपान, मद्यपान तसेच प्लास्टिक व कचरा नेण्यास सक्त मनाई आहे. प्राण्यांना त्रास देणे किंवा मोठे आवाज करणे निषिद्ध आहे. फोटोग्राफीस परवानगी आहे, मात्र फ्लॅश वापरण्यास मनाई आहे.

👥 13. स्थानिक आदिवासी व रोजगार

अभयारण्याच्या सीमेवर अनेक गोंड आदिवासींची गावे आहेत. शेतात जंगली प्राणी घुसू नयेत म्हणून सौरऊर्जेवर चालणारी सौम्य करंट फेंसिंग दिली जाते. स्थानिक लोकांना गाईड, ड्रायव्हर, वॉचमन, रानमेवा संकलन व वन्यउत्पादनांच्या कामांतून रोजगार उपलब्ध करून दिला जातो.

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📅 14. भेट देण्याचा उत्तम काळ

नवेगाव–नागझिरा येथे वर्षभर पर्यटक येतात, मात्र ऑक्टोबर ते जून हा काळ भेटीसाठी सर्वोत्तम मानला जातो. पर्यटकांसाठी रॉक गार्डन, शोभेच्या वनस्पती, मुलांसाठी खेळणी आणि भित्तीचित्रांनी सजवलेला परिसर आकर्षण ठरतो.

🏨 15. राहण्याची सोय

पीठेझरी, नागझरी आणि उमरझरी येथे पर्यटकांसाठी निवास व्यवस्था उपलब्ध आहे. याशिवाय आसपासच्या भागात खाजगी लॉज व उपहारगृहेही आहेत.

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🏛️ 16. ऐतिहासिक माहिती

हा प्रदेश पूर्वी गोंड राजांच्या ताब्यात होता. १८व्या शतकात गोंड राजा सीताराम कोंडू पाटील डोंगरबा यांनी नवेगाव तलावाची निर्मिती केली. २२ नोव्हेंबर १९७४ रोजी हा परिसर अभयारण्य म्हणून घोषित झाला, तर २०१२ साली नवेगाव–नागझिरा राष्ट्रीय व्याघ्र प्रकल्प म्हणून मान्यता मिळाली. आज येथे दरवर्षी ४०,००० पेक्षा अधिक पर्यटक भेट देतात.

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मंगळवार, ३० डिसेंबर, २०२५

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी Moragad Fort Information in Hindi

 मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी

Moragad Fort Information in Hindi

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


• स्थान :

भारत के महाराष्ट्र राज्य के नाशिक ज़िले के सटाणा तालुका में सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में स्थित मोरागड किला है।

यहाँ जुड़वाँ किलों की एक जोड़ी देखने को मिलती है। एक मोरागड और दूसरा मुल्हेर किला है।


• ऊँचाई :

इस किले की औसत ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 1357 मीटर है।

मोरागड किले तक पहुँचने के मार्ग :

• नाशिक शहर से – दिंडोरी – वणी – साल्हेरवाड़ी – वाघांबे मार्ग से मोरागड पहुँचा जा सकता है।

• नाशिक ज़िले के मालेगांव मार्ग से – मालेगांव – वडनेर – नामपूर – ताहाराबाद मार्ग से मोरागड पहुँचा जा सकता है।

मोरागड किले की जानकारी :

नाशिक ज़िले के सटाणा तालुका में मोरागड स्थित है। किले के पायथ्य पर पहुँचने के बाद सामने दो जुड़े हुए किलों की जोड़ी दिखाई देती है। इनमें से एक मोरागड और दूसरा मुल्हेर है।

• मोरागड–मुल्हेर के पास एक धर्मशाला है। उद्धव महाराज धर्मशाला में रुकने की अच्छी व्यवस्था उपलब्ध है। सुबह जल्दी उठकर किले की यात्रा की जा सकती है।

• पहली तटबंदी और किले का भग्न द्वार :

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


किले की ओर चलते समय सबसे पहले एक तटबंदी दिखाई देती है और उसके बाद किले का पहला द्वार आता है। इसका अधिकांश भाग टूट चुका है, लेकिन वर्तमान में खड़े चौखट के स्तंभ देखने को मिलते हैं।

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


• आगे रास्ते में एक छतरी दिखाई देती है। उसके आगे बढ़ने पर कुछ खंडहर इमारतों के अवशेष देखने को मिलते हैं।

• भव्य तालाब :

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


आगे जाने पर एक विशाल और सुंदर निर्माण वाला तालाब दिखाई देता है। तालाब के अंदर पानी की ऊँचाई मापने के लिए एक स्तंभ मौजूद है।

• महादेव मंदिर :

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


तालाब के पास एक सुंदर महादेव मंदिर देखने को मिलता है। मंदिर के सामने भव्य सभामंडप है और अंदर शिवलिंग स्थित है। उसके पीछे एक गणेश मूर्ति भी दिखाई देती है। सभामंडप में स्तंभ और मेहराबदार कमानें देखने को मिलती हैं।

• सोमेश्वर मंदिर :

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


आगे पगडंडी से चलने पर सोमेश्वर मंदिर दिखाई देता है। यह मंदिर भी तालाब के किनारे स्थित मंदिर जैसा ही निर्मित है। मंदिर के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका निर्माण ईस्वी सन 1480 में हुआ था। मंदिर के अंदर गहरा गर्भगृह है, जिसमें महादेव पिंड स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण बाभुळराजे ने करवाया था।

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


गर्भगृह के सामने के सभामंडप में नंदी विराजमान है। सभामंडप के ऊपर कमानाकार मेहराब में सुंदर जालीदार नक्काशी दिखाई देती है। इससे प्रतिदिन सुबह सूर्य की किरणें सीधे महादेव पिंड पर पड़ती हैं। यह उत्कृष्ट स्थापत्य कला का एक सुंदर उदाहरण है।

सोमेश्वर के दर्शन के बाद ऊपर की दिशा में जाने पर मोरागड और मुल्हेर किलों को जोड़ने वाली बीच की खिंड (दर्रा) में पहुँचा जाता है।

• खिंड की दीवार :

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


मुल्हेर और मोरागड एक-दूसरे के काफ़ी निकट होने के कारण एक-दूसरे के सहायक किले हैं। शत्रु एक किले के सहारे दूसरे किले पर आसानी से कब्ज़ा न कर सके, इसके लिए जब यह किला स्वराज्य में शामिल हुआ, तब छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस खिंड में एक मज़बूत दीवार का निर्माण करवाया।

इस दीवार के ऊपरी भाग में जंगिया और फांजियां बनाई गई हैं। शत्रु के साथ पहली मुठभेड़ यहीं हो सकती है, यह समझकर यह मज़बूत दीवार खड़ी की गई थी।

• दीवार पार करने के बाद दो रास्ते दिखाई देते हैं। इनमें से एक मार्ग मुल्हेर किले की ओर जाता है, जबकि दूसरा मार्ग मोरागड किले की ओर जाता है। मोरागड की ओर जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ने पर एक अत्यंत ऊँचा और विशाल चट्टानी पर्वत दिखाई देता है, वही है मोरागड किला।

• पानी के टैंक (जल कुंड):

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi


किले की सीढ़ीदार चढ़ाई के मार्ग के पास एक चट्टान में खोदा हुआ पानी का टैंक देखने को मिलता है। इसी टैंक के पास से सीढ़ियों वाला मार्ग गुजरता है।

• खोदा हुआ सीढ़ी मार्ग:

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पानी के टैंकों के पास से सीढ़ीदार रास्ता शुरू होता है। यह पूरा मार्ग ठोस चट्टान को काटकर बनाया गया है। चट्टान में तराशे जाने के कारण यह आज भी अच्छी अवस्था में है। इसे केवल छेनी और हथौड़े की सहायता से बनाया गया प्रतीत होता है।

• महाद्वार (मुख्य द्वार):

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सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचने पर एक भव्य महाद्वार दिखाई देता है। काले बेसाल्ट पत्थर में तराशे गए स्तंभ और ऊपर नक्काशीदार मेहराब इस द्वार को आकर्षक बनाते हैं और किले की सुरक्षा भी करते हैं।

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इस द्वार के दोनों ओर हिंदू देवताओं की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं, जिनमें से एक गणेश मूर्ति स्पष्ट है, जबकि दूसरी मूर्ति अस्पष्ट अवस्था में है। द्वार के अंदरूनी भाग में पहरेदारों के विश्राम हेतु बनाई गई देवड़ियाँ (कोठरियाँ) हैं। अंदर की ओर कुछ निर्माण आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त दिखाई देता है।

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ऊपरी चौखट पर हिंदू धर्म का पवित्र प्रतीक कमल की नक्काशी की गई है। इसके ऊपर बनी मेहराब अत्यंत सुंदर और आकर्षक प्रतीत होती है।

• खंडहर अवस्था में दूसरा द्वार:

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महाद्वार से अंदर प्रवेश करने के बाद थोड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है। ऊपर जाते समय चारों ओर गिरे हुए पत्थर दिखाई देते हैं। आगे चढ़ने पर चौखट, उंबर (देहली) और स्तंभों के अवशेष मिलते हैं। पास की दीवार आंशिक रूप से सुरक्षित है। यह किले का दूसरा द्वार है।

यदि शत्रु मुख्य द्वार पर अधिकार कर ले, तो यह दूसरा द्वार उसके लिए बाधा उत्पन्न करता था। लेकिन समय के साथ-साथ प्रशासनिक और स्थानीय उपेक्षा के कारण यह द्वार आज जर्जर अवस्था में दिखाई देता है।

• इस द्वार से आगे का मार्ग:

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इस द्वार से किले के ऊपरी भाग में जाया जा सकता है। यहाँ से नीचे की ओर खड़ी और पथरीली सीढ़ीदार चढ़ाई दिखाई देती है। साथ ही, किले की प्राचीर (तटबंदी) पर भी यहीं से पहुँचा जा सकता है। इस स्थान से दोनों किलों के बीच स्थित संकरी घाटी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

• पानी का टैंक:

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आगे बढ़ते ही एक ओर चट्टान में खोदा हुआ एक और पानी का टैंक दिखाई देता है। वर्तमान में गर्मियों के मौसम में यह प्रायः सूखा रहता है। किले की प्राचीर, बुर्ज तथा अन्य निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक पत्थर यहीं से निकाले गए थे।

• कठिन और पथरीला सीढ़ी मार्ग:

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यहाँ से आगे रास्ता काफी खड़ा और कठिन हो जाता है। कुछ स्थानों पर यह पूरी तरह चट्टानी है, कहीं पत्थरों की सीढ़ियाँ लगाई गई हैं, तो कहीं सीढ़ियाँ सीधे चट्टान में तराशी गई हैं। इस मार्ग से ऊपर चढ़ते हुए घुमावदार मोड़ लेते हुए किले के ऊपरी दूसरे महाद्वार तक पहुँचा जाता है।

• दूसरा महाद्वार:

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वक्र और अर्धगोलाकार चढ़ाई पार करने के बाद एक और भव्य द्वार दिखाई देता है, जो किले के ऊपरी भाग की ओर ले जाता है। इसकी रचना भी नीचे स्थित महाद्वार के समान ही है। इसके अंदरूनी हिस्से में भी पहरेदारों के लिए बनी देवड़ियाँ देखने को मिलती हैं।

मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी  Moragad Fort Information in Hindi

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इस महाद्वार से नीचे का जंगल, सोमेश्वर मंदिर, महादेव मंदिर, हरगड और पास स्थित मुल्हेर किले का ऊपरी भाग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

• कठोर चट्टानी पठार:

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दूसरे महाद्वार से ऊपर जाने के लिए सीढ़ीदार मार्ग है। इस मार्ग से ऊपर पहुँचने पर एक विस्तृत और कठोर चट्टानी पठार दिखाई देता है। कुछ स्थानों पर इस पर मिट्टी की पतली परत है और जगह-जगह घास उगी हुई दिखाई देती है।

• पहला पानी का टैंक:

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सामने की एक पगडंडी से आगे बढ़ने पर जुड़े हुए पानी के टैंक देखने को मिलते हैं।

• राजमहल के अवशेष:

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थोड़ा आगे बढ़ने पर पत्थरों के ढेर और कुछ अवशिष्ट निर्माण दिखाई देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मध्यकाल में यहाँ एक राजमहल रहा होगा।

• किलेदार के वाड़े के अवशेष:

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इसके समीप ही किले के किलेदार के लिए बनाए गए वाड़े (निवास) के अवशेष भी देखने को मिलते हैं।

• निर्माण अवशेष:

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किले का निरीक्षण करते समय विभिन्न स्थानों पर बिखरे हुए अवशेष दिखाई देते हैं, जिनसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ किले की शिबंदी से जुड़े परिवार निवास करते थे। उनके घरों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। अनुमानतः यहाँ लगभग 60 से 70 घरों के अवशेष मौजूद हैं।

इन अवशेषों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि किले पर लगभग 400 से 500 लोग, या संभवतः उससे भी अधिक, निवास करते होंगे।

• विशाल जलकुंड क्रमांक 2:

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थोड़ा आगे बढ़ने पर एक बड़ा, चट्टान में खोदा हुआ जलकुंड दिखाई देता है। इसमें वर्तमान में भी पानी मौजूद रहता है। लगातार धूप के कारण इसमें काई (शैवाल) जम गई है। किले पर रहने वालों की जल-आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस जलकुंड का निर्माण किया गया होगा।

• गंगासागर तालाब:

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जल कुंड से आगे बढ़ने पर एक विशाल तालाब दिखाई देता है। किले के ऊपरी भाग में यह एकमात्र बड़ा जलस्रोत है। चट्टानी पहाड़ी के ढलान को ध्यान में रखकर इसका निर्माण किया गया प्रतीत होता है। एक ओर मजबूत परकोटा दीवार बनाकर यह तालाब तैयार किया गया है और गर्मियों में भी इसमें पानी उपलब्ध रहता है।

• रानी महल:

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गंगासागर तालाब के पास कुछ निर्माण अवशेष दिखाई देते हैं, जिन्हें रानी महल के अवशेष माना जाता है।

• चट्टान के किनारे स्थित तीसरा जलकुंड:

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आगे चलते हुए उस स्थान पर, जहाँ से किले का पानी नीचे की ओर गिरता है, एक विशाल चट्टान-खोदित जलकुंड दिखाई देता है। यहाँ की खुदाई से निकले पत्थरों का उपयोग किले के निर्माण में किया गया और इसी स्थान पर जलकुंड बनाया गया।

• अस्थायी निवास (रहुटियाँ):

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किले पर कुछ स्थानों पर अस्थायी शिविर या रहुटियाँ स्थापित करने के लिए चट्टानों में छेद किए गए हैं। ये आज भी दिखाई देते हैं। धूप और वर्षा से बचाव के लिए शिबंदी के पहरेदारों को यहाँ अस्थायी आश्रय मिलता था।

• दूरस्थ किलों का दृश्य:

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इस स्थान पर चट्टान के किनारे खड़े होकर निरीक्षण करने पर दूर स्थित मांगी–तुंगी किला तथा उसके नीचे की ओर जाती मार्गिका स्पष्ट दिखाई देती है। साथ ही सह्याद्री पर्वत श्रृंखला की अनेक चोटियाँ भी नजर आती हैं।

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मोरागड किले की ऐतिहासिक जानकारी:

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• मोरागड और मुल्हेर जुड़वाँ किले हैं, और इनके आसपास के अनेक स्थानों का उल्लेख महाभारत काल से जोड़ा जाता है।

• सूरत–बुरहानपुर मार्ग पर स्थित होने के कारण यह एक प्राचीन व्यापारिक मार्ग था। उस समय निगरानी (चौकसी) के उद्देश्य से इस किले का निर्माण किया गया और इसका उपयोग प्रहरी किले के रूप में होता था।

• मोरागड से दिखाई देने वाला हरगड किला इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को दर्शाता है।

• शालिवाहन और सातवाहन काल में, समीप स्थित मुल्हेर किले पर अनेक गुफाओं का निर्माण हुआ होगा, ऐसा माना जाता है।

• ईस्वी सन् 13वीं शताब्दी में यहाँ बाभुळराजा का शासन था। मुल्हेर और मोरागड संयुक्त जुड़वाँ किले थे। बाभुळराजा और सम्राट अकबर के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध थे, और कई बार अकबर द्वारा सैन्य सहायता दिए जाने के उल्लेख मिलते हैं।

• जब शाहजहाँ सम्राट बना, तब उसने ईस्वी सन् 1638 में अपने पुत्र औरंगज़ेब को इस प्रांत का सूबेदार नियुक्त किया। इसके बाद औरंगज़ेब ने इस क्षेत्र पर आक्रमण कर इसे मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

• ईस्वी सन् 1672 में सूरत की दूसरी लूट के बाद स्वराज्य लौटते समय छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस क्षेत्र को जीतकर स्वराज्य में सम्मिलित किया।

• इन जुड़वाँ किलों की सुरक्षा को बनाए रखने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने दोनों किलों के बीच स्थित संकरी घाटी में एक मजबूत दीवार का निर्माण कराया और किले की रक्षा व्यवस्था सुदृढ़ की।

• इसके बाद यह किला पेशवाओं के अधिकार में चला गया।

• ईस्वी सन् 1818 में जब अंग्रेज़ों ने पेशवाओं का अंत किया, तब यह किला मराठों से जीत लिया गया। अंग्रेज़ों ने यहाँ के अनेक निर्माणों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया।

• ईस्वी सन् 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के बाद यह किला स्वतंत्र भारत सरकार के अधीन आ गया।

• इस प्रकार मोरागड किले का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली है।

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