पद्मदुर्ग उर्फ कासा किल्ले के बारे मे जाणकारी हिंदी मे
Padmdurg urph kasa kille ke bare me jankari hindi me
“पद्मदुर्ग बसाकर राजपुरी के ऊपर दूसरी राजापुरी बसाई।”
ऐसा वर्णन छत्रपति शिवाजी महाराजों ने किया था। मराठों के इतिहास में भव्य और मजबूत ऐसा जलदुर्ग यानी पद्मदुर्ग है।
• स्थान :
भारत देश के पश्चिमी तट पर स्थित महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ ज़िले में मुरुड गाँव के पास समुद्र में एक कछुए के आकार के टापू पर बना हुआ जलदुर्ग पद्मदुर्ग आज भी शिवकालीन इतिहास की गवाही देते हुए मजबूती से खड़ा दिखाई देता है।
• पद्मदुर्ग किले की ऊँचाई :
पद्मदुर्ग एक जलदुर्ग है और इसकी समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 500 फुट है।
• पद्मदुर्ग किले पर जाने का यात्री मार्ग :
चूँकि पद्मदुर्ग एक जलदुर्ग है, इसलिए यहाँ केवल समुद्र मार्ग से ही पहुँचा जा सकता है।
• सड़क मार्ग :
• अलीबाग – रेवदंडा – मुरुड – समुद्री नाव द्वारा पद्मदुर्ग।
• मुंबई – गोवा हाईवे पर स्थित इंदापुर – तला – भालगांव मार्ग से मुरुड गाँव और वहाँ से पद्मदुर्ग।
• मुंबई – गोवा हाईवे पर नागोठणे / कोलाड से – रोहे – चणेरे – बिरवाडी – मुरुड – राजापुरी रोड पर एकसंबा गाँव, वहाँ से मछुआरों की नाव द्वारा पद्मदुर्ग किले पर जाया जा सकता है।
• पद्मदुर्ग यह किला समुद्री किला होने के कारण ज्वार-भाटा तथा मौसम के अनुसार वहाँ के मछुआरे (कोळी) पर्यटकों को पद्मदुर्ग किले पर ले जाते हैं।
• पद्मदुर्ग किले का दूसरा नाम कासा है।
• पद्मदुर्ग किले पर जाने के लिए पहले मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की अनुमति आवश्यक थी। अब वहाँ का कस्टम कार्यालय हटा दिया गया है। वर्तमान में दिनभर यांत्रिक नावों से जाया जा सकता है।
• पद्मदुर्ग किले का निर्माण क्यों किया गया?
“घर में जैसा चूहा वैसा स्वराज्य में सिद्दी।”
पूर्व अफ्रीका महाद्वीप के सुलतान के साथ आए नीग्रो यानी अब्येसेनियन लोग, जिन्हें स्थानीय लोग हबशी कहते थे, बाद में सिद्दी नाम से प्रसिद्ध हुए।
उन्होंने मुरुड के पास स्थित जंजीरा किला अपने कब्ज़े में लिया और अपनी समुद्री सत्ता स्थापित की। वे इस्लाम धर्म के अनुयायी थे। वे समुद्र किनारे रहने वाले लोगों को सताते, लूटमार करते, स्त्रियों का अपहरण करते तथा हिंदवी स्वराज्य के तटीय क्षेत्र में काफी उत्पात मचाते थे।
इसीलिए उनके बंदोबस्त हेतु और साथ ही अंग्रेज़, पुर्तगाली, डच जैसे समुद्री शत्रुओं की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराजों ने आरमार खड़ा किया। उसी का एक भाग था – जंजीरा के सिद्दी के उपद्रव पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया पद्मदुर्ग किला।
• पद्मदुर्ग किले पर देखने योग्य स्थान :
• समुद्री किनारा दीवार :
पद्मदुर्ग किला और पड़कोटा के पास समुद्र में एक तटबंदी दीवार दिखाई देती है। समुद्री लहरों का ज़्यादा जोरदार प्रहार किले पर न हो, इसके लिए यह तटबंदी बनाई गई थी। यह पड़कोटा का एक हिस्सा थी। आज भी यह तटबंदी समुद्री लहरों से टकराते हुए मजबूती से खड़ी नज़र आती है।
• पड़कोट :
मुरुड की ओर से आने पर पड़कोट के पास नावें रोककर किले की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। वर्तमान में इस पड़कोट की तटबंदी काफी हद तक जीर्ण-शीर्ण दिखाई देती है।
पड़कोट का अर्थ है – किले की सुरक्षा हेतु उसके सामने की ओर बनाया गया सुरक्षा तट वाला कोट। इसका उपयोग किले के तटीय भाग में उतरकर किले तक पहुँचने से पहले आने वाले व्यक्ति की जाँच-पड़ताल करने के लिए किया जाता था। यह एक छोटा किला ही होता था। जिसकी तटबंदी से समुद्र के रास्ते आने वाले शत्रु जहाजों पर नज़र रखी जाती थी। इसके अंदर बालेकिला भी देखने को मिलता है।
• पंखुड़ी का कमलबुरुज :
पड़कोट से सटा हुआ एक बुर्ज है, जो किले के पश्चिम दरवाजे के पास स्थित है। उस बुर्ज की संरचना ऐसी है कि एक ओर से देखने पर यह कमल की पंखुड़ी जैसा प्रतीत होता है। ऊपर से यदि ड्रोन की मदद से देखा जाए तो यह कमल जैसा दिखाई देता है। संस्कृत भाषा में कमल को पद्म कहते हैं, इसलिए इस किले को पद्मदुर्ग कहा जाता है।
• कोटेश्वरी मंदिर :
पड़कोट में एक मंदिर दिखाई देता है, वह कोटेश्वरी देवी का मंदिर है। आज भी भग्नावस्था में मौजूद इस मंदिर में किले की रक्षा के लिए शस्त्र सज्ज अवस्था में रखे गए हैं।
• पश्चिम दरवाजा :
पद्मदुर्ग किले के तटीय भाग में उतरने पर पश्चिम दिशा में एक मजबूत एवं भव्य दरवाज़ा दिखाई देता है, जिसे पश्चिम दरवाज़ा कहते हैं। यह दरवाज़ा बालेकिले का प्रवेशद्वार है। इसके अंदर प्रवेश करने पर अनेक वास्तुओं के अवशेष दिखाई देते हैं। इस दरवाज़े की बनावट अन्य किलों जैसी ही है और इसके अंदर की ओर देवडियाँ बनी हुई हैं, जो पहरेदारों के विश्राम हेतु बनाई गई थीं।
• पद्मदुर्ग किले की तटबंदी :
पद्मदुर्ग किले की तटबंदी अत्यंत मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। तट की दीवारें बहुत मोटी हैं और जगह-जगह उस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। उन पर से आराम से चलना या दौड़ना संभव है। साथ ही अनेक जंग्या (तोफखाने की खिड़कियाँ) और फांज्या (छोटे झरोखे) भी दिखाई देते हैं।
• जंगी :
किले की दीवारों में बनाई गई छिद्र जिनसे बंदूक या तीर के सहारे बाहर से आए शत्रु पर सुरक्षित रहते हुए निशाना साधा जा सकता है।
• फांज्या :
ये आकार में बड़े छिद्र होते हैं जिनसे तोप के द्वारा शत्रु पर वार किया जा सकता है।
• टेहळणी बुर्ज (निगरानी बुर्ज) :
जगह-जगह निगरानी के बुर्ज दिखाई देते हैं, जिनसे समुद्र के चारों ओर नजर रखी जा सकती है। इसी बुर्ज की दीवारों में जगह-जगह फांज्या और जंग्या भी दिखाई देते हैं।
• पानी संग्रह हौद :
आज भी अच्छी स्थिति में यहाँ पानी जमा करने के लिए बनाए गए तीन बड़े हौद दिखाई देते हैं। इनमें से दो सूखे हैं, जबकि एक में आज भी पानी दिखाई देता है।
तीसरे हौद में एक छोटा झरना है, जिससे शुद्ध पीने योग्य पानी रिसता रहता है।
• शिबंदी (सैनिकों) के लिए बनाई गई इमारतों के अवशेष :
किले पर काम करने वाले सैनिक और अन्य नौकरों को रहने के लिए दीवारों से सटी हुई कोठरियाँ बनाई गई थीं। इनके अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। कुछ लोग इन्हें कस्टम के सिपाहियों के लिए बनाई गई कोठरियाँ भी बताते हैं।
• मस्जिद :
किले के अंदर एक जगह मस्जिद के अवशेष दिखाई देते हैं। संभवतः यह शिबंदी में रहने वाले मुस्लिम सैनिकों को नमाज़ पढ़ने के लिए बनाई गई होगी।
• वाड़े और आवासीय इमारतों के अवशेष :
शिवकालीन तथा बाद के समय में बनी हुई इमारतों के अवशेष यहाँ दिखाई देते हैं। यह किला कस्टम अधिकारियों के ताबे में था, उस समय उनके रहने के लिए भी यहाँ इमारतें बनाई गई थीं।
इन इमारतों की रचना देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ रसोईघर, बाथरूम आदि की सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई थीं।
• तोपें :
पद्मदुर्ग इस किले पर हमें लगभग 38 से 40 तोपें देखने को मिलती हैं। अन्य किलों की तुलना में यहाँ तोपें अधिक दिखाई देती हैं। यह जलदुर्ग होने के कारण समुद्री आक्रमण करने वाले जहाजों का सामना करने के लिए इनको रखा गया था। साथ ही तोपों के गोले भी मिले हैं, जिन्हें पुरातत्त्व विभाग ने अपने कब्जे में लिया है।
• पूर्व द्वार :
किले के पूर्व दिशा में एक द्वार आज भी सुस्थित दिखाई देता है। उसके ऊपर बने बुर्ज की तोपें उसके पास ही रखी हुई नज़र आती हैं। इसकी बनावट भी पश्चिम द्वार जैसी ही है।
• शिवकालीन निर्माण की विशेषता :
किसी भी कामकाज में बारीकी और ईमानदारी यह शिवकालीन निर्माण में देखने को मिलती है। पद्मदुर्ग किले की प्राचीर पर दिन-रात समुद्री लहरों का प्रहार होता है। खारे पानी की लहरों से पत्थरों का काफी ह्रास हुआ है।
परंतु दो पत्थरों के बीच का चुना आज भी जस का तस दिखाई देता है। इसकी विशेषता यह है कि यह चुना बनाते समय गुड़, हीरड़ी का पत्ता, चुना, राल और कात्या का उपयोग किया गया था। इस वजह से निर्माण में मजबूती दिखाई देती है। आज भी 350 वर्ष बीत जाने के बावजूद यह मजबूती से खड़ा है।
• फर्शबंदी निर्माण :
पद्मदुर्ग किले के एक बुर्ज पर हमें फर्श बिछा हुआ दिखाई देता है। वहाँ बनी जंगियों में तोपें भी दिखाई देती हैं, जो आज भी किले की सुरक्षा के लिए सज्ज प्रतीत होती हैं।
• ध्वजस्तंभ :
पश्चिम द्वार के पास बने पडकोट में कमल की पंखुड़ी आकार के बुर्ज पर ध्वजस्तंभ दिखाई देता है। यहाँ स्वराज्य का भगवा ध्वज लहराया जाता था। अब केवल वहाँ ध्वजस्तंभ का चौथरा देखने को मिलता है।
• कुआँ :
पड़कोट में एक चौकोनी कुएँ के अवशेष देखने को मिलते हैं, जिसे पीने के पानी की सुविधा के लिए बनाया गया था।
• पद्मदुर्ग किले से हम जंजीरा किला और मुरुड का किनारी भाग देख सकते हैं।
पद्मदुर्ग किले से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ :
• पद्मदुर्ग किले का निर्माण ईस्वी सन 1670-72 में छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में शुरू किया गया। यह ईस्वी सन 1675 में पूर्ण हुआ।
• स्वराज्य का समुद्री शत्रु यानी पपाउंदीर समझे जाने वाले जंजीरा के सिद्दी की स्वराज्य विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए पद्मदुर्ग का निर्माण किया गया।
• पद्मदुर्ग का निर्माण करते समय सिद्दियों ने बहुत अटकाव किया, लेकिन उसे नाकाम कर यह जलदुर्ग छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाकर तैयार किया।
• पद्मदुर्ग इस जलदुर्ग का प्रथम किल्लेदार पद पर सुभानजी मोहिते की नियुक्ति की गई।
• स्वराज्य की नौसेना में रहने वाले लाय पाटील कोली ने जंजीरा के सिद्दी के विरुद्ध मोरोपंत प्रधान की सहायता से योजना बनाई। और अपने साथियों के साथ रात के समय जंजीरा पर हमला करके पिछले भाग से किले की दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने का साहस किया। लेकिन मोरोपंत और लाय पाटील का समय एक साथ नहीं आया, इसलिए उन्हें पीछे हटना पड़ा और प्रयास असफल हो गया। जब छत्रपति शिवाजी महाराज को यह बात पता चली तो यमपुरी यानी जंजीरा पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने का साहस करने वाले लाय पाटील को उन्होंने पालखी का सम्मान दिया। परंतु समुद्र में रहने वाले कोलियों को पालखी का क्या उपयोग, इस कारण उन्होंने वह पालखी नम्रतापूर्वक लौटा दी। तब छत्रपति शिवाजी महाराज ने विचार करके एक गलबत (नौका) बनवाकर उसका नाम "पालखी" रखा और लाय पाटील को भेंट दी। साथ ही छत्र, वस्त्र, निशानी तथा समुद्र किनारे की सरपटेलकी भी प्रदान की। इस प्रकार उनका बहुमान किया।
• छत्रपति संभाजी महाराज के राज्यकाल में यह किला स्वराज्य में था।
• राजाराम महाराज के राज्यकाल में जब मुगल आक्रमण स्वराज्य पर हुआ, उस समय यह किला जंजीरा के सिद्दी ने अपने अधिकार में ले लिया।
• ई.स. 2 दिसंबर 1759 को सरखेल कान्होजी आंग्रे के पौत्र राघोजी आंग्रे ने सिद्दियों के कब्जे से इस किले को जीत लिया।
• आगे चलकर ई.स. 1818 के बाद इस किले को अंग्रेजों ने अन्य किलों के साथ अपने कब्जे में ले लिया।
• उसके बाद के समय में इस किले की उपेक्षा हुई।
• आजकल इस स्थान पर केवल थोड़े पर्यटक आते हैं। यहाँ का परिसर काफी हद तक स्वच्छ दिखाई देता है।
• समुद्री ज्वार-भाटा के कारण यहाँ समुद्री रेत, शंख, सीपियाँ दिखाई देती हैं।
• यहाँ अन्य किलों की अपेक्षा अधिक तोपें देखने को मिलती हैं। वे ढली हुई, मजबूत विदेशी तोपें हैं। साथ ही तोपगाड़े भी मौजूद हैं।
ऐसी है पद्मदुर्ग उर्फ कासा किले की जानकारी।
Padmdurg urph kasa kille ke bare me jankari hindi me
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