शनिवार, २० सप्टेंबर, २०२५

पद्मदुर्ग उर्फ कासा किल्ले के बारे मे जाणकारी हिंदी मे Padmdurg kille ke bare me jankari hindi me

 पद्मदुर्ग  उर्फ कासा किल्ले के बारे मे जाणकारी हिंदी मे 

Padmdurg urph kasa kille ke bare me jankari hindi me 

पद्मदुर्ग उर्फ कासा किल्ले के बारे मे जाणकारी हिंदी मे   Padmdurg kille ke bare me jankari hindi me


“पद्मदुर्ग बसाकर राजपुरी के ऊपर दूसरी राजापुरी बसाई।”

ऐसा वर्णन छत्रपति शिवाजी महाराजों ने किया था। मराठों के इतिहास में भव्य और मजबूत ऐसा जलदुर्ग यानी पद्मदुर्ग है।

स्थान :

भारत देश के पश्चिमी तट पर स्थित महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ ज़िले में मुरुड गाँव के पास समुद्र में एक कछुए के आकार के टापू पर बना हुआ जलदुर्ग पद्मदुर्ग आज भी शिवकालीन इतिहास की गवाही देते हुए मजबूती से खड़ा दिखाई देता है।

पद्मदुर्ग किले की ऊँचाई :

पद्मदुर्ग एक जलदुर्ग है और इसकी समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 500 फुट है।

पद्मदुर्ग किले पर जाने का यात्री मार्ग :

चूँकि पद्मदुर्ग एक जलदुर्ग है, इसलिए यहाँ केवल समुद्र मार्ग से ही पहुँचा जा सकता है।

सड़क मार्ग :

• अलीबाग – रेवदंडा – मुरुड – समुद्री नाव द्वारा पद्मदुर्ग।

• मुंबई – गोवा हाईवे पर स्थित इंदापुर – तला – भालगांव मार्ग से मुरुड गाँव और वहाँ से पद्मदुर्ग।

• मुंबई – गोवा हाईवे पर नागोठणे / कोलाड से – रोहे – चणेरे – बिरवाडी – मुरुड – राजापुरी रोड पर एकसंबा गाँव, वहाँ से मछुआरों की नाव द्वारा पद्मदुर्ग किले पर जाया जा सकता है।

• पद्मदुर्ग यह किला समुद्री किला होने के कारण ज्वार-भाटा तथा मौसम के अनुसार वहाँ के मछुआरे (कोळी) पर्यटकों को पद्मदुर्ग किले पर ले जाते हैं।

पद्मदुर्ग किले का दूसरा नाम कासा है।

• पद्मदुर्ग किले पर जाने के लिए पहले मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की अनुमति आवश्यक थी। अब वहाँ का कस्टम कार्यालय हटा दिया गया है। वर्तमान में दिनभर यांत्रिक नावों से जाया जा सकता है।

• पद्मदुर्ग किले का निर्माण क्यों किया गया?

“घर में जैसा चूहा वैसा स्वराज्य में सिद्दी।”

पूर्व अफ्रीका महाद्वीप के सुलतान के साथ आए नीग्रो यानी अब्येसेनियन लोग, जिन्हें स्थानीय लोग हबशी कहते थे, बाद में सिद्दी नाम से प्रसिद्ध हुए।

उन्होंने मुरुड के पास स्थित जंजीरा किला अपने कब्ज़े में लिया और अपनी समुद्री सत्ता स्थापित की। वे इस्लाम धर्म के अनुयायी थे। वे समुद्र किनारे रहने वाले लोगों को सताते, लूटमार करते, स्त्रियों का अपहरण करते तथा हिंदवी स्वराज्य के तटीय क्षेत्र में काफी उत्पात मचाते थे।

इसीलिए उनके बंदोबस्त हेतु और साथ ही अंग्रेज़, पुर्तगाली, डच जैसे समुद्री शत्रुओं की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराजों ने आरमार खड़ा किया। उसी का एक भाग था – जंजीरा के सिद्दी के उपद्रव पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया पद्मदुर्ग किला।

पद्मदुर्ग किले पर देखने योग्य स्थान :

समुद्री किनारा दीवार :

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पद्मदुर्ग किला और पड़कोटा के पास समुद्र में एक तटबंदी दीवार दिखाई देती है। समुद्री लहरों का ज़्यादा जोरदार प्रहार किले पर न हो, इसके लिए यह तटबंदी बनाई गई थी। यह पड़कोटा का एक हिस्सा थी। आज भी यह तटबंदी समुद्री लहरों से टकराते हुए मजबूती से खड़ी नज़र आती है।

पड़कोट :

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मुरुड की ओर से आने पर पड़कोट के पास नावें रोककर किले की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। वर्तमान में इस पड़कोट की तटबंदी काफी हद तक जीर्ण-शीर्ण दिखाई देती है।

पड़कोट का अर्थ है – किले की सुरक्षा हेतु उसके सामने की ओर बनाया गया सुरक्षा तट वाला कोट। इसका उपयोग किले के तटीय भाग में उतरकर किले तक पहुँचने से पहले आने वाले व्यक्ति की जाँच-पड़ताल करने के लिए किया जाता था। यह एक छोटा किला ही होता था। जिसकी तटबंदी से समुद्र के रास्ते आने वाले शत्रु जहाजों पर नज़र रखी जाती थी। इसके अंदर बालेकिला भी देखने को मिलता है।

पंखुड़ी का कमलबुरुज :

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पड़कोट से सटा हुआ एक बुर्ज है, जो किले के पश्चिम दरवाजे के पास स्थित है। उस बुर्ज की संरचना ऐसी है कि एक ओर से देखने पर यह कमल की पंखुड़ी जैसा प्रतीत होता है। ऊपर से यदि ड्रोन की मदद से देखा जाए तो यह कमल जैसा दिखाई देता है। संस्कृत भाषा में कमल को पद्म कहते हैं, इसलिए इस किले को पद्मदुर्ग कहा जाता है।

कोटेश्वरी मंदिर :

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पड़कोट में एक मंदिर दिखाई देता है, वह कोटेश्वरी देवी का मंदिर है। आज भी भग्नावस्था में मौजूद इस मंदिर में किले की रक्षा के लिए शस्त्र सज्ज अवस्था में रखे गए हैं।

पश्चिम दरवाजा :

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पद्मदुर्ग किले के तटीय भाग में उतरने पर पश्चिम दिशा में एक मजबूत एवं भव्य दरवाज़ा दिखाई देता है, जिसे पश्चिम दरवाज़ा कहते हैं। यह दरवाज़ा बालेकिले का प्रवेशद्वार है। इसके अंदर प्रवेश करने पर अनेक वास्तुओं के अवशेष दिखाई देते हैं। इस दरवाज़े की बनावट अन्य किलों जैसी ही है और इसके अंदर की ओर देवडियाँ बनी हुई हैं, जो पहरेदारों के विश्राम हेतु बनाई गई थीं।

पद्मदुर्ग किले की तटबंदी :

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पद्मदुर्ग किले की तटबंदी अत्यंत मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। तट की दीवारें बहुत मोटी हैं और जगह-जगह उस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। उन पर से आराम से चलना या दौड़ना संभव है। साथ ही अनेक जंग्या (तोफखाने की खिड़कियाँ) और फांज्या (छोटे झरोखे) भी दिखाई देते हैं।

जंगी

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किले की दीवारों में बनाई गई छिद्र जिनसे बंदूक या तीर के सहारे बाहर से आए शत्रु पर सुरक्षित रहते हुए निशाना साधा जा सकता है।

फांज्या :

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ये आकार में बड़े छिद्र होते हैं जिनसे तोप के द्वारा शत्रु पर वार किया जा सकता है।

टेहळणी बुर्ज (निगरानी बुर्ज) :

जगह-जगह निगरानी के बुर्ज दिखाई देते हैं, जिनसे समुद्र के चारों ओर नजर रखी जा सकती है। इसी बुर्ज की दीवारों में जगह-जगह फांज्या और जंग्या भी दिखाई देते हैं।

पानी संग्रह हौद :

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आज भी अच्छी स्थिति में यहाँ पानी जमा करने के लिए बनाए गए तीन बड़े हौद दिखाई देते हैं। इनमें से दो सूखे हैं, जबकि एक में आज भी पानी दिखाई देता है।

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तीसरे हौद में एक छोटा झरना है, जिससे शुद्ध पीने योग्य पानी रिसता रहता है।

शिबंदी (सैनिकों) के लिए बनाई गई इमारतों के अवशेष :

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किले पर काम करने वाले सैनिक और अन्य नौकरों को रहने के लिए दीवारों से सटी हुई कोठरियाँ बनाई गई थीं। इनके अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। कुछ लोग इन्हें कस्टम के सिपाहियों के लिए बनाई गई कोठरियाँ भी बताते हैं।

मस्जिद :

किले के अंदर एक जगह मस्जिद के अवशेष दिखाई देते हैं। संभवतः यह शिबंदी में रहने वाले मुस्लिम सैनिकों को नमाज़ पढ़ने के लिए बनाई गई होगी।

वाड़े और आवासीय इमारतों के अवशेष :

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शिवकालीन तथा बाद के समय में बनी हुई इमारतों के अवशेष यहाँ दिखाई देते हैं। यह किला कस्टम अधिकारियों के ताबे में था, उस समय उनके रहने के लिए भी यहाँ इमारतें बनाई गई थीं।

इन इमारतों की रचना देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ रसोईघर, बाथरूम आदि की सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई थीं।

तोपें :

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पद्मदुर्ग इस किले पर हमें लगभग 38 से 40 तोपें देखने को मिलती हैं। अन्य किलों की तुलना में यहाँ तोपें अधिक दिखाई देती हैं। यह जलदुर्ग होने के कारण समुद्री आक्रमण करने वाले जहाजों का सामना करने के लिए इनको रखा गया था। साथ ही तोपों के गोले भी मिले हैं, जिन्हें पुरातत्त्व विभाग ने अपने कब्जे में लिया है।

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पूर्व द्वार :

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किले के पूर्व दिशा में एक द्वार आज भी सुस्थित दिखाई देता है। उसके ऊपर बने बुर्ज की तोपें उसके पास ही रखी हुई नज़र आती हैं। इसकी बनावट भी पश्चिम द्वार जैसी ही है।

शिवकालीन निर्माण की विशेषता :

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किसी भी कामकाज में बारीकी और ईमानदारी यह शिवकालीन निर्माण में देखने को मिलती है। पद्मदुर्ग किले की प्राचीर पर दिन-रात समुद्री लहरों का प्रहार होता है। खारे पानी की लहरों से पत्थरों का काफी ह्रास हुआ है।

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परंतु दो पत्थरों के बीच का चुना आज भी जस का तस दिखाई देता है। इसकी विशेषता यह है कि यह चुना बनाते समय गुड़, हीरड़ी का पत्ता, चुना, राल और कात्या का उपयोग किया गया था। इस वजह से निर्माण में मजबूती दिखाई देती है। आज भी 350 वर्ष बीत जाने के बावजूद यह मजबूती से खड़ा है।

फर्शबंदी निर्माण :

पद्मदुर्ग किले के एक बुर्ज पर हमें फर्श बिछा हुआ दिखाई देता है। वहाँ बनी जंगियों में तोपें भी दिखाई देती हैं, जो आज भी किले की सुरक्षा के लिए सज्ज प्रतीत होती हैं।

ध्वजस्तंभ :

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पश्चिम द्वार के पास बने पडकोट में कमल की पंखुड़ी आकार के बुर्ज पर ध्वजस्तंभ दिखाई देता है। यहाँ स्वराज्य का भगवा ध्वज लहराया जाता था। अब केवल वहाँ ध्वजस्तंभ का चौथरा देखने को मिलता है।

कुआँ :

पड़कोट में एक चौकोनी कुएँ के अवशेष देखने को मिलते हैं, जिसे पीने के पानी की सुविधा के लिए बनाया गया था।

• पद्मदुर्ग किले से हम जंजीरा किला और मुरुड का किनारी भाग देख सकते हैं।

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पद्मदुर्ग किले से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ :

• पद्मदुर्ग किले का निर्माण ईस्वी सन 1670-72 में छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में शुरू किया गया। यह ईस्वी सन 1675 में पूर्ण हुआ।

• स्वराज्य का समुद्री शत्रु यानी पपाउंदीर समझे जाने वाले जंजीरा के सिद्दी की स्वराज्य विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए पद्मदुर्ग का निर्माण किया गया।

• पद्मदुर्ग का निर्माण करते समय सिद्दियों ने बहुत अटकाव किया, लेकिन उसे नाकाम कर यह जलदुर्ग छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाकर तैयार किया।

• पद्मदुर्ग इस जलदुर्ग का प्रथम किल्लेदार पद पर सुभानजी मोहिते की नियुक्ति की गई।

• स्वराज्य की नौसेना में रहने वाले लाय पाटील कोली ने जंजीरा के सिद्दी के विरुद्ध मोरोपंत प्रधान की सहायता से योजना बनाई। और अपने साथियों के साथ रात के समय जंजीरा पर हमला करके पिछले भाग से किले की दीवार पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने का साहस किया। लेकिन मोरोपंत और लाय पाटील का समय एक साथ नहीं आया, इसलिए उन्हें पीछे हटना पड़ा और प्रयास असफल हो गया। जब छत्रपति शिवाजी महाराज को यह बात पता चली तो यमपुरी यानी जंजीरा पर सीढ़ी लगाकर चढ़ने का साहस करने वाले लाय पाटील को उन्होंने पालखी का सम्मान दिया। परंतु समुद्र में रहने वाले कोलियों को पालखी का क्या उपयोग, इस कारण उन्होंने वह पालखी नम्रतापूर्वक लौटा दी। तब छत्रपति शिवाजी महाराज ने विचार करके एक गलबत (नौका) बनवाकर उसका नाम "पालखी" रखा और लाय पाटील को भेंट दी। साथ ही छत्र, वस्त्र, निशानी तथा समुद्र किनारे की सरपटेलकी भी प्रदान की। इस प्रकार उनका बहुमान किया।

• छत्रपति संभाजी महाराज के राज्यकाल में यह किला स्वराज्य में था।

• राजाराम महाराज के राज्यकाल में जब मुगल आक्रमण स्वराज्य पर हुआ, उस समय यह किला जंजीरा के सिद्दी ने अपने अधिकार में ले लिया।

• ई.स. 2 दिसंबर 1759 को सरखेल कान्होजी आंग्रे के पौत्र राघोजी आंग्रे ने सिद्दियों के कब्जे से इस किले को जीत लिया।

• आगे चलकर ई.स. 1818 के बाद इस किले को अंग्रेजों ने अन्य किलों के साथ अपने कब्जे में ले लिया।

• उसके बाद के समय में इस किले की उपेक्षा हुई।

• आजकल इस स्थान पर केवल थोड़े पर्यटक आते हैं। यहाँ का परिसर काफी हद तक स्वच्छ दिखाई देता है।

• समुद्री ज्वार-भाटा के कारण यहाँ समुद्री रेत, शंख, सीपियाँ दिखाई देती हैं।

• यहाँ अन्य किलों की अपेक्षा अधिक तोपें देखने को मिलती हैं। वे ढली हुई, मजबूत विदेशी तोपें हैं। साथ ही तोपगाड़े भी मौजूद हैं।

ऐसी है पद्मदुर्ग उर्फ कासा किले की जानकारी।

Padmdurg urph kasa kille ke bare me jankari hindi me 

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Padmdurg Fort / kassa Fort information in English

 Padmdurg Fort information in English 

Padmadurg alias Kasa Fort

Padmadurg Fort

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English


“By establishing Padmadurg, another Rajapuri was created upon the chest of Rajapuri.”

This is how Chhatrapati Shivaji Maharaj described Padmadurg, the mighty sea fort that holds a strong place in Maratha history.

Location:

Padmadurg, a sea fort built on a turtle-shaped island near Murud village in Raigad district of Maharashtra, situated along the western coast of India, still stands in good condition today, bearing witness to the history of the Shivaji era.

Height of Padmadurg Fort:

Padmadurg is a sea fort, and its height from sea level is about 500 feet.

Travel routes to reach Padmadurg Fort:

Since Padmadurg is a sea fort, it can be reached only by sea route.

Road Routes:

Alibag – Revdanda – Murud – by sea boat to Padmadurg.

Mumbai – Goa Highway via Indapur – Tala – Bhalgaon – Murud village and from there to Padmadurg.

Mumbai – Goa Highway via Nagothane / Kolad – Roha – Chanere Birwadi – Murud – Rajapuri Road to Eksamba village, and from there by fishermen’s boats to Padmadurg Fort.

• As Padmadurg is a sea fort, the local fishermen (Koli community) take visitors to the fort, considering the tidal conditions and changes in weather.

Another name of Padmadurg Fort is Kasa Fort.

• Earlier, permission from Mumbai Port Trust was required to visit Padmadurg Fort. Nowadays, the customs office there has been shifted. During the daytime, one can reach the fort by motorboats.

Why was Padmadurg Fort built?

Just as a mouse is in the house, so was the Siddi to Swarajya.

The Negroes who came with the Sultan from the continent of East Africa, known locally as Habshi, later came to be called Siddis. They captured the Janjira Fort near Murud and established their own naval power. They were followers of Islam. They used to harass the coastal people, plunder villages, abduct women, and created havoc in the coastal region of Hindavi Swarajya.

To put an end to their menace, and also to check the activities of other maritime enemies like the English, Portuguese, and Dutch, Chhatrapati Shivaji Maharaj established a navy. As part of this effort, Shivaji Maharaj built the Padmadurg Fort to restrain the Siddi of Janjira and to curb his operations.

Places to see at Padmadurg Fort:

• Sea-side Wall:

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English


Near Padmadurg Fort and Padkot, one can see a wall-like structure built in the sea. This defensive wall was constructed so that the strong waves of the sea would not directly hit the fort. It was a part of Padkot. Even today, this wall can be seen standing firm against the sea waves.

Padkot:

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English


When coming from Murud, boats are anchored near Padkot and then one can proceed towards the fort. At present, much of the fortification of Padkot appears to be eroded. Padkot was a small outpost built in front of the main fort for its protection. Its purpose was to examine and check the people before they could enter the main fort area from the coast. It was like a small fort itself. From its ramparts, enemy ships approaching from the sea could be observed. Inside this fortification, one can also see the Balekilla (citadel).

Petal-shaped Lotus Bastion:

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English


Next to the Padkot, there is a bastion located near the western gate of the fort. The side of this bastion has a design resembling the petal of a lotus. If viewed from above with the help of a drone, it appears like a lotus. In Sanskrit, a lotus is called Padma, and hence this fort is named Padmadurg.

Koteshwari Temple:

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Inside the Padkot, one can see a temple dedicated to Goddess Koteshwari. Even today, in its ruined condition, the temple houses weapons kept ready for the protection of the fort.

Western Gate:

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English


When landing on the coastal side of Padmadurg Fort, one can see a strong and grand gateway towards the west. This is the Western Gate. It is the main entrance to the citadel. After entering through this gate, one finds the remains of many structures. The construction of this gate is similar to other forts, and inside the gate, there are guard-rooms built for the watchmen to rest.

Fortifications of Padmadurg:

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English


The fortifications of Padmadurg are seen in a very strong condition. The walls of the fort are very thick, and at several places, steps are provided to climb onto them. From above, one can easily walk or run along the ramparts. Many jangya (loopholes) and phanja (cannon holes) can also be seen.

Jangya:

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These are small holes made in the walls of the fort, through which one could safely aim and fire arrows or bullets at enemies coming from outside.

Phanja:

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These are larger openings, through which cannons were used to target enemies.

Watch Towers (Tehalni Buruj):

All around the fort, one can see watch towers, from which it was possible to keep an eye on the surrounding sea. In these towers, loopholes and cannon holes are also seen in many places.

Water Storage Tanks (Houd):

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Even today, three large water tanks built for water storage can be seen here. Out of them, two are dry, while one still has water.

In the third tank, there is a small natural spring from which pure drinking water continuously seeps.

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Remains of Structures for the Soldiers (Shibandi):

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English


For the soldiers working on the fort as well as for other servants, rooms were built adjoining the fortification walls for their residence. Their remains can still be seen. Some people say that these were built for the residence of the customs soldiers.

Mosque:

Inside the fort, at one place, remains of a mosque can be seen. It must have been built for the Muslim soldiers in the garrison to perform Namaz (prayers).

Wadas and Residential Structures:

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The remains of buildings built during the period of Chhatrapati Shivaji Maharaj as well as those of later periods can be seen here. When the fort was under the control of the Customs Department, buildings for their residence were also constructed here, which are now in dilapidated condition. Looking at the design of those buildings, it can be seen that arrangements such as a kitchen and bathroom were made there.

Cannons:

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On Padmadurg fort, one can see nearly 38 to 40 cannons. Compared to other forts, here the number of cannons is higher. As this is a sea fort, they were placed to counter the attacking ships from the sea. Cannonballs have also been found here, which are now kept under the custody of the Archaeological Department.

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East Gate:

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On the eastern side of the fort, one can still see a well-preserved gate. The cannons on the bastion above it are seen placed nearby. Its construction is also similar to that of the West Gate.

Features of Shivaji-era Architecture:

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Meticulous precision and honesty in workmanship are evident in Shivaji-era constructions. The ramparts of Padmadurg fort constantly face the assault of sea waves day and night. The salty water waves have eroded many of the stones in the structure.

However, the lime between the two stones is still intact. The uniqueness of this lies in the preparation of the lime, which was made by mixing jaggery, hirda leaves, lime, resin, and katya (natural fibrous material). This gave the construction durability. Even after 350 years, it still survives.

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Paved Flooring Construction:

On one of the bastions of Padmadurg fort, one can see flooring laid with stone slabs. Cannons can also be seen in the embrasures there, which even today seem ready to defend the fort.

Flag Post:

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In the outer fort (Padkot) near the West Gate, on the lotus petal-shaped bastion, one can see the flag post. At this place, the saffron flag of Swarajya used to be hoisted. Now only the pedestal of the flag post can be seen there.

Well:

In the outer fort (Padkot), the remains of a square-shaped well can be seen, which was built for drinking water facilities.

• From Padmadurg fort, one can see Janjira fort and the coastal part of Murud.

Historical Events about Padmadurg Fort:

• The construction of Padmadurg Fort was started during the reign of Chhatrapati Shivaji Maharaj between 1670–72 AD and was completed in 1675 AD.

• Padmadurg was built to curb the anti-Swarajya activities of Janjira’s Siddis, who were considered as the mice in the house, i.e., the constant enemies of Swarajya.

• While constructing Padmadurg, the Siddis created a lot of obstacles. But overcoming them, Chhatrapati Shivaji Maharaj successfully built this sea fort.

• Subhanji Mohite was appointed as the first fort commander of this sea fort, Padmadurg.

Lai Patil Koli, who was part of the naval fleet of Swarajya, devised a plan against the Siddis of Janjira with the help of Moropant Peshwa. At night, along with his companions, he bravely attempted to attack Janjira by placing ladders against the rear side of the fort walls to climb up. However, the timing of Moropant and Lai Patil did not match, so they had to retreat, and the attempt failed. When Chhatrapati Shivaji Maharaj came to know about this, he honored Lai Patil, who had dared to climb Janjira (known as Yampuri) with ladders, by granting him the privilege of a palanquin. But the fishermen who lived in the sea had no real use for a palanquin, so he humbly returned it. Then Shivaji Maharaj thoughtfully had a galbat (war vessel) constructed, named it “Palkhi,” and gifted it to Lai Patil. Along with this, he also honored him with an umbrella, robes, insignia, and the post of headman of the coastal region.

Padmdurg Fort / kassa Fort information in English



• During the reign of Chhatrapati Sambhaji Maharaj, this fort remained under Swarajya.

• In the reign of Rajaram Maharaj, when the Mughals invaded Swarajya, the fort was captured by the Siddis of Janjira.

• On 2nd December 1759, Sarkhel Kanhoji Angre’s grandson, Raghoji Angre, recaptured the fort from the Siddis.

• Later, in 1818, this fort was taken over by the British along with other forts.

• In the following period, the fort was neglected.

• Nowadays, only a few tourists visit this place. The surrounding area is observed to be relatively clean.

• Due to the ebb and flow of the sea, one can find marine sand, shells, and conches here.

• Compared to other forts, more cannons can be seen here. These are cast, carved European-style cannons, along with their carriages.

Such is the information about Padmadurg, also known as Kasa Fort.


गुरुवार, ११ सप्टेंबर, २०२५

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)

 सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


किसी भी किले पर लड़ने वाले सैनिकों को युद्ध के लिए आवश्यक शस्त्र और बारूद सुरक्षित रखने के लिए एक सुरक्षित जगह होती है। यह स्थान उस राज्य और उस किले के परिसर में महत्वपूर्ण संरक्षक जिम्मेदारी निभाता है। इसी प्रकार शिवकाल में कोल्हापुर विभाग में रांगणा, भुदरगढ़, पन्हाला, विशालगढ़ को शस्त्र और बारूद पहुँचाने का साधन सामानगढ़ किला (Samangad Fort) था।

छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास स्वामी के पदस्पर्श से पावन हुआ किला सामानगढ़।

प्रतापराव गुजर के पराक्रम की साक्षी देने वाला किला है सामानगढ़।

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत का पहला निशान फहराकर स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले गडकरी सैनिकों के पराक्रम की साक्षी देने वाला किला है सामानगढ़।

भुदरगढ़, रांगणा, विशालगढ़, पन्हाला जैसे किलों को शस्त्र, बारूद और अन्य रसद की आपूर्ति करने वाला किला है सामानगढ़।

📍 सामानगढ़ का स्थान :

भारत देश के महाराष्ट्र राज्य के कोल्हापुर ज़िले में गडहिंग्लज तहसील के नेसरी-गडहिंग्लज रोड पर स्थित चिंचेवाड़ी गाँव के पास सह्याद्री की उप-पहाड़ी श्रृंखला में सामानगढ़ किला बसा हुआ है।


⛰️ ऊँचाई :

सामानगढ़ किले की ऊँचाई समुद्र 

तल से 2972 फुट है।

सामानगढ़ किला – एक पर्यटन मार्गदर्शिका

ऐतिहासिक महत्व

सामानगढ़ किला छत्रपति शिवाजी महाराज, समर्थ रामदास स्वामी और सरसेनापति प्रतापराव गुजर के पराक्रम का साक्षी है। यह किला न केवल शस्त्र और रसद का भंडार था, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का प्रतीक भी बना।

📍 कैसे पहुँचे :

कोल्हापुर से → गडहिंग्लज → नेसरी रोड → चिंचेवाड़ी → यहाँ से पक्की सड़क द्वारा सीधे किले तक। (कुल दूरी लगभग 80 किमी)

नेशनल हाईवे नं. 4 से → संकेश्वर → गडहिंग्लज → नेसरी रोड → चिंचेवाड़ी → सामानगढ़।

गडहिंग्लज से चिंचेवाड़ी → केवल 10 किमी दूरी।

🔎 किले पर दर्शनीय स्थल :

1. दर्शनी बुरुज

2. झेंडा बुरुज

3. वेताळ बुरुज

4. भवानी मंदिर

5. साखर कुआँ (साखर विहीर)

6. सात कमानी कुआँ

7. अंधेरी कोठरी

8. चोरखिंड 

9. भूमिगत हौद

10. मुग़ल टेकड़ी

🌄 आसपास घूमने योग्य स्थल :

हनुमान टेकड़ी मंदिर

भीमसासगिरी टेकड़ी

हनुमान मंदिर

श्रीरामचंद्र रहिवास शिवमंदिर

🗡️ ऐतिहासिक गाथा :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


इस किले से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण घटना प्रतापराव गुजर और बहलोलखान का युद्ध है।

बहलोलखान जब स्वराज्य पर चढ़ाई करने आया, तब प्रतापराव गुजर की सेना ने उसे घेर लिया।

वह शरणागत हो गया और प्रतापराव ने उसे बीजापुर जाने दिया।

यह निर्णय शिवाजी महाराज को अप्रिय लगा और उन्होंने प्रतापराव को कड़ा संदेश भेजा।

प्रतापराव क्रोधित होकर केवल सात वीरों के साथ बहलोलखान पर टूट पड़े और नेसरी की खिंड में वीरगति को प्राप्त हुए।

आज भी इस मार्ग से जब हम किले की ओर चढ़ते हैं, तो सबसे पहले दिखाई देने वाला दर्शनी बुरुज इन वीरों की गाथा को याद दिलाता है।

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ℹ️ यात्रियों के लिए सुझाव :

यात्रा का उचित समय : सर्दी और बरसात के बाद का मौसम (अक्टूबर – फरवरी)।

साथ रखें : पानी, हल्का नाश्ता, टॉर्च (क्योंकि किले में अंधेरी कोठरी और भूमिगत हौद हैं)।

यह स्थान इतिहास, साहस और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम है – इसलिए यहाँ इतिहास प्रेमी, ट्रेकर्स और धार्मिक यात्रियों सभी को आनंद मिलेगा।



झेंडा बुर्ज :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


किले पर आने के बाद जब किले की प्राचीर से आगे बढ़ते हैं तो एक ध्वज स्तंभ दिखाई देता है। यह एक बुर्ज पर स्थित है।

यह स्तंभ अंग्रेजों ने बनाया था, जब उन्होंने इस किले पर कब्ज़ा किया। उसी समय उन्होंने यहाँ यह ध्वज स्तंभ खड़ा किया। जिस स्थान पर यह खड़ा है, उसे झेंडा बुर्ज कहा जाता है।

भूयारी धान्य कोठी :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


झेंडा बुर्ज देखने के बाद जब थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो भूमिगत अनाज भंडार दिखाई देते हैं। सामानगढ़ एक रसद आपूर्ति करने वाला किला होने के कारण यहाँ पर रसद रखने के लिए कई भूमिगत कोठार बनाए गए थे।

वेताळ बुर्ज :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


यह किला सह्याद्री पर्वत की उपश्रेणियों में आता है। इसलिए इसकी सुरक्षा के लिए कई मजबूत बुर्ज बनाए गए। कुल मिलाकर ऐसे दस बुर्ज हैं। इनमें से एक बुर्ज का नाम वेताळ बुर्ज है।

भवानी माता मंदिर :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)

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किले के मध्य भाग में भवानी देवी का मंदिर दिखाई देता है। आजकल इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में सुंदर काले पत्थर से बनी भवानी देवी की मूर्ति देखने को मिलती है।

साखर कुआँ :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


मंदिर के सामने की ओर चौकोर आकार का एक कुआँ दिखाई देता है। इसे साखर कुआँ कहा जाता है। ऐसे एक-दो और कुएँ भी यहाँ पर देखे जा सकते हैं।

सातकमानी कुआँ :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


एक अनोखी शैली में बना हुआ कुआँ यहाँ दिखाई देता है, जो शायद कहीं और नहीं देखा होगा। इसमें एक के पीछे एक सात मेहराब बने हुए हैं। सुंदर सीढ़ियों वाला यह कुआँ किले पर प्यासे लोगों की ज़रूरत पूरी करने के लिए बनाया गया था। इसमें एक के बाद एक खंड हैं और ऊपर मेहराब बने हुए हैं। जैसे-जैसे भीतर उतरते जाते हैं, अंदर की दीवारों पर अलग-अलग जानवरों की नक्काशी दिखाई देती है। इस कुएँ का तल अभी तक नहीं मिला है। यह बहुत गहरा कुआँ है।

अंधार कोठरी :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


सामानगढ़ किले पर एक भूमिगत गुप्त कक्ष दिखाई देता है। इस स्थान पर युद्ध के कैदियों और अपराधियों को बंद करके रखा जाता था।

पूर्व द्वार :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


किले के पूर्व दिशा में खुदाई करते समय हमें किले के पूर्व द्वार के भग्न अवशेष देखने को मिलते हैं। नीचे की चौखट उतनी ही अच्छी स्थिति में है। अवशेषों से इस स्थान पर बने द्वार की मजबूती का अनुमान लगाया जा सकता है।

चोरखिड़की :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


किले की प्राचीर पर घूमते हुए उत्तर दिशा में आने पर हमें वहाँ एक गुप्त मार्ग भी दिखाई देता है। इस स्थान से संकट के समय रसद आपूर्ति की जाती थी। यदि किला शत्रु के कब्जे में चला जाता तो किले पर रह रहे परिवार, कबीले और मावलों को सुरक्षित बाहर निकालने तथा गनिमी कावा युद्धकौशल अपनाने के लिए यह चोर द्वार रखा गया था।

सूंड बुर्ज :

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किला पूर्व दिशा की ओर संकरा होता गया है। इस ओर हाथी की सूंड के आकार जैसा एक बुर्ज दिखाई देता है। इसका नाम सूंड बुर्ज है।

मुगल टेकड़ी :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


सूंड बुर्ज के सामने हमें एक टेकड़ी दिखाई देती है। सामानगढ़ जीतने के लिए उस समय मुगल सेना ने यहाँ श्रमदान कर एक टेकड़ी खड़ी की थी। वह है मुगल टेकड़ी क्षण।

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


• किले की प्राचीर पर जगह-जगह जंग्या दिखाई देती हैं। इनके माध्यम से बाहर की ओर निरीक्षण कर निशाना साधा जाता था। संकट के समय शत्रु को इन्हीं से मार गिराया जाता था।

• सामानगढ़ देख लेने के बाद उसी रास्ते से लौटते समय हमें भीमसासगिरी पहाड़ में हनुमान मंदिर की ओर जाने वाला सीढ़ीदार मार्ग दिखाई देता है। उस मार्ग से आगे चढ़ने पर 65 हेक्टेयर का विस्तृत परिसर दिखाई देता है। यह अत्यंत सुंदर और शांत वातावरण वाला स्थान है।

हनुमान मंदिर :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)

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यह अत्यंत रमणीय परिसर है, जहाँ सुंदर हनुमान मंदिर स्थित है। इस मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ है और अंदर गर्भगृह में सुंदर काले पत्थर की हनुमान प्रतिमा देखने को मिलती है। मंदिर के सामने सुंदर दीपमालाएँ दिखाई देती हैं। यह शांत वातावरण मन को एक अलग ही शांति प्रदान करता है।

शिव मंदिर :

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


हनुमान मंदिर के आगे की ओर गहरी ज़मीन में खोदकर बनाया गया सुंदर शिव मंदिर देखने को मिलता है। यह त्रेतायुग काल का है और इस स्थान पर प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण व माता सीता का निवास था। यह मंदिर किसी वाड़े (महल) जैसा प्रतीत होता है। पहले सीढ़ियों से नीचे उतरकर मंदिर में आने पर एक प्रतीक्षागृह मिलता है। प्रतीक्षागृह के आगे एक छोटा स्तंभ है, जिस पर अनेक शिवलिंग देखने को मिलते हैं। उसके आगे एक तहखाना है। उसमें एक शिवलिंग है और उस तहखाने के ऊपर श्रीराम मंदिर स्थित है।

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


मुख्य मंदिर परिसर में अनेक छोटे-छोटे मंदिर देखने को मिलते हैं। इनमें ज्ञानेश्वर मंदिर है। उसके पास छोटी-छोटी देवालयें हैं, जिनमें बारह ज्योतिर्लिंग की स्थापना की गई है।

• औदुंबर के पेड़ के नीचे दत्त मंदिर है और बारह ज्योतिर्लिंग के पास एक यज्ञकुंड देखने को मिलता है।

सामानगढ़ किला जानकारी (Samangad Fort Information in Hindi)


उसके बाद सामने शनि देवता का मंदिर आता है। उसके बगल में कैलास मंदिर है और इस कैलास मंदिर के पीछे की ओर प्रभु रामचंद्र की बैठक देखने को मिलती है। उसके आगे लक्ष्मण कोठी है। उसके आगे रसोईघर है और उसके पास पीछे प्रभु राम का शयनकक्ष आता है। ऐसा यह शांत और निर्मल परिसर इस स्थान पर देखने को मिलता है। इस पुण्य पावन भूमि पर आने से मन को शांति प्राप्त होती है।

सामानगढ़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :

• त्रेतायुग में इस क्षेत्र में प्रभु रामचंद्र, सीता माता और लक्ष्मण का निवास था।

• उसके बाद शिलाहार राजा भोज द्वितीय के शासनकाल में इस स्थान पर सामानगढ़ का पहला निर्माण किया गया था।

• इसके बाद यह किला बहमनी सुल्तान के शासन में रहा।

• बहमनी सत्ता के विभाजन के बाद यह किला आदिलशाही के अधीन आया।

• सन् 1667 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस किले को स्वराज्य में सम्मिलित किया।

• स्वराज्य के अष्टप्रधान मंडल के अण्णाजी दत्तो सचिव इस दक्षिण सूबे का कामकाज देखते थे। उनके अधीन इस किले की मरम्मत और कुछ निर्माण कार्य करवाए गए, ऐसा माना जाता है।

• सन् 1688 में इस किले को मुगलों ने जीत लिया।

• सन् 1701 में यह किला फिर मराठा राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

• इसके बाद कुछ समय पश्चात शाहजादा बेदार बख्त ने पुनः घेराबंदी करके इस किले को जीत लिया और शहामिर को किलेदार नियुक्त किया।

• सन् 1704 में सामानगढ़ किला फिर से स्वराज्य की सेवा में आया।

• वारणा संधि के बाद यह किला महारानी ताराबाई के करवीर राज्य में सम्मिलित हुआ।

• बाद में यह किला अंग्रेजों के अधीन हो गया।

• सन् 1844 में किले पर हुए गडकरी विद्रोह में सामानगढ़ के गडकरी भी सम्मिलित थे।

• इस विद्रोह का नेतृत्व मुंजप्पा कदम ने किया। उनके साथ 350 गडकरी, 10 तोपें, 100 बंदूकधारी बारवाले और 200 सैनिक थे। इन्होंने एकजुट होकर अंग्रेजों के आक्रमण को दो बार विफल किया।

• अंततः 13 अक्टूबर 1844 को सामानगढ़ अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। गडकरी पुनः विद्रोह न करें, इसीलिए अंग्रेजों ने तोपों की सहायता से पूर्व दरवाज़े तथा किले की प्राचीर (तटबंदी) को तोड़ दिया। वर्तमान में इस किले का पुनर्निर्माण गडहिंग्लज के आमदार बाबासाहेब कुपेकर ने अपने आमदार फंड से कराया है।

• प्रतापराव गुजर जब बहलोल खान के विरुद्ध अभियान पर गए थे, उस समय वे इस स्थान पर ठहरे हुए थे।

ऐसी है सामानगढ़ किले की जानकारी और इतिहास।

Samangad kille ke bare me jankari hindi me 


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